परंपराओं की चॉकलेट

समाज में कोई गलत/ अनैतिक परंपरा किस तरह शुरू हो जाती है और समर्थन पा जाती है, इसके कई उदाहरण दिए जा सकते हैं. पत्रकारिता में, फिल्मों में, सोशल मीडिया में ऐसे तमाम उदाहरण बिखरे पड़े हैं.

पिछले छह माह में सोशल मीडिया शतरंज के घोड़े की तरह ढाई घर की अबूझ चाल चलने लगा है. इस उद्देश्यहीन ट्रेफिक में ‘राष्ट्रवादी गाड़ी’ फंसती दिखाई दे रही है.

कई परंपराएं समाज के बल और समर्थन से शुरू होती है लेकिन बाद में पता चलता है कि हमने अपना ‘बोझ’ बढ़ा लिया है.

1. जिस समय पोर्न स्टार सनी लिओन ने भारतीय फिल्मों में प्रवेश किया था तब मेरे समेत कई लोगों ने इस ‘परंपरा’ का विरोध किया था लेकिन कुछ प्रगतिशील लोगों ने कहा था ‘वह गंगा के घाट पर आई है, निर्मल हो जाएगी’.

वे निर्मल हुई या नहीं, पता नहीं लेकिन एक पोर्न स्टार के भारतीय फिल्मों में आने की ‘परंपरा’ अब निर्बाध चलती रहेगी क्योंकि समाज ने उसे समर्थन दे दिया है.

राम गोपाल वर्मा की अगली फिल्म में ‘मिया मालकोवा’ नामक नई पोर्न स्टार का आगमन हो रहा है. उसके बाद कोई और आएगी, उसके बाद कोई और. गंगा का घाट दुनियाभर की गंदगी धोएगा.

2. सन 2006 तक भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया अपनी नई पहचान बना रहा था. उस समय आज जैसी टीवी बहस देखने को नहीं मिलती थी. कुल मिलाकर मीडिया उस समय कच्ची मिटटी के समान था, जो आकार लेने लगी थी.

ऐसे नाजुक वक्त में प्रसिद्ध एंकर अर्णब गोस्वामी ने एनडीटीवी छोड़कर टाइम्स नाउ का दामन थाम लिया. उनके शो News Hour ने एक नई ‘परंपरा’ शुरू की, जिसका सनी लिओन की तरह ही स्वागत किया गया.

लगभग चिल्लाकर बात करने वाला ये एंकर नेताओं को जूते पर रखता था. राजनेताओं से त्रस्त जनता को ये शो देखकर आनंद आने लगा. शो की टीआरपी बढ़ने लगी. आरोपियों को स्टूडियो में ही ‘दोषी’ बनाया जाने लगा.

इस नई ‘परंपरा’ ने कच्ची मिटटी से ‘कलम’ की जगह ‘गंडासा’ बना दिया, जो हमेशा मारकाट में ही लगा रहता है. अमिश देवगन को आप अर्नब का ‘उग्र एडिशन’ कह सकते हैं.

अंजना ओम कश्यप, रुबिका लियाकत आदि उसी ‘परंपरा’ का अनुसरण कर रहे हैं, जो अर्नब ने शुरू की. एक अच्छी दिखाई दे रही परंपरा कुछ ही साल में कितनी घातक हो गई है. पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ.

3. सोशल मीडिया पर तेज़-तर्रार राजनीतिक लेख बहुत पसंद किये जाते हैं. सम-सामयिक विषयों पर लिखने वालों ने इसमें और मिर्च-मसाला झोंकते हुए सुस्वादु गालियों का मिश्रण डालना शुरू कर दिया.

शुरू में तो गालियां लेखों में आवश्यकता के अनुसार दी जाती थी लेकिन अब तो लोग बड़ी शान से गालियों वाली विशेष पोस्ट अपनी वॉल पर सजाने लगे हैं.

महिला मित्रों ने भी पहले तो इसका विरोध किया लेकिन बाद में स्वीकार कर लिया. ‘परंपरा’ चल पड़ी. अब असंसदीय शब्द न हमें पीड़ा देते हैं, न हैरान करते हैं. क्या इस परंपरा को ख़त्म किया जा सकेगा?

4. कई बार बचपन में दोस्त कहता था ‘मैंने शोले बीस बार देखी है’ तो हम उसे कहते थे ‘क्यों कल शोले की परीक्षा देने जाना है क्या.’

किसी चीज़ का दोहराव आपको कितना आनंद दे सकता है, ये आपकी चेतना और जागरूकता पर निर्भर करता है. एक भेड़चाल चल पड़ी है फेसबुक पर. एक ने प्रिया प्रकाश को वॉल पर उतारा है तो दूसरे को भी ऐसा करना ही है. उसकी वॉल मेरी वॉल से रंगीन कैसे.

आप सोशल मीडिया के जागरूक पत्रकार हैं कि पान की दुकान पर खड़े छिछोरे हैं. आज यदि सोशल मीडिया को मान्यता नहीं मिल पा रही तो उसका कारण यही उटपटांग फेसबुकिये हैं.

हम यहाँ एक उद्देश्य के लिए हैं न कि प्रिया की आँख मारती फोटो लगाने के लिए. मनोरंजन होना चाहिए इसमें कोई समस्या नहीं है लेकिन छिछोरापन अब सीमा लांघ रहा है. ये समझ ले कि हम ‘छिछोरेपन की रेड लाइन’ पर खड़े हैं.

‘गलत परंपराएं हमेशा ‘चॉकलेट’ के रूप में आती हैं, जिसका हम दिल खोलकर स्वागत करते हैं. सनी लिओन से लेकर अर्णब और अर्णब से लेकर फेसबुक के वीरों तक बार-बार ये बात साबित हुई है.

खिलजी, रतनसिंह से ज्यादा वीर था और भारत-पाकिस्तान के झंडे साथ लहराए जा सकते हैं, ये वाली नई परंपराओं की चॉकलेट हम खा चुके हैं. इसके बाद हम नवरात्रि को ‘लवरात्रि’ कहने की परंपरा भी शुरू करने वाले हैं. ये परंपराओं का देश है.

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