औषधि संपन्न तुम्हारी आंखों में, सर्दियों की आंच-सा आमंत्रण है

सुनो! जाने क्यों मुझे तुम चांद कहते हो,
सांझ सकारे तेरी बातें
आओ तुम्हें ‘आकाश के माधव’ का नाम दूं ।

मैं हूं गर शब्द, तुम मन के व्याकरण
रोई व्यथाऐं, गीला रहा आख्यान
अभिव्यक्ति को बोलो तो, कैसे विराम दूं ।

धरती फिदा है आज हवा की अदाओं पर,
कौन किसे करता है सराबोर इतना प्रेम में
थक गए हो ना तुम! आओ तुम्हें आराम दूं ।

कब तक ताकूं राह उत्सव की,
कहां रास के मधु पलाश हैं
उदासी करती है संक्रमित, कैसे मुस्कान दूं।

“मेरे प्रेम को अहमियत देती हो मुझे नहीं”
ऐसा कहा था ना तुमने तुम्हारा प्रेम तुमसे विलग नहीं
किस बात की जि़द है, चलो मैं वह भी मान लूं ।

देहजीवी नहीं दृष्टिजीवी हैं हम,
समय के स्तूप मांगे रक्त हस्ताक्षर
मैं हूं अभिशप्त सुख दुख में, कैसे नए आयाम दूं ।

चीरकर हृदय की व्यथाएं,
दीप लौ सी पुतलियों में जागी ऋचाएं
स्व की आहुति संविदा में, यज्ञ को कैसे मुकाम दूं ।

औषधि संपन्न तुम्हारी आंखों में
सर्दियों की आंच सा आमंत्रण है
कैसे तुम्हारे प्रेम का प्रेम से मैं प्रतिदान दूं ।

….प्रिय !!!
बोलो तो ,कैसे तुम्हारे प्रेम का
मैं प्रेम से मैं प्रतिदान दूं???

– यामिनी ‘नयन’ गुप्ता

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