देवदत्त पटनायक का फ्रॉड दर्शन

सुबह-सुबह मित्र राज शेखर तिवारी जी की पोस्ट पढ़ी, देवदत्त पटनायक पर.

इसमें कोई शक नहीं की देवदत्त की बातें सतही और हल्की होती हैं, जबकि सनातन जीवन दर्शन उतना ही गहरा है, अनंत भी कह सकते हैं, क्योंकि इसे जितना समझो उतना कम है.

ख़ूबसूरती इतनी कि ऋषि स्वयं ‘नेति नेति’ कह गए. इति ना इति! अर्थात आप जो समझ रहे हैं वो भी अंतिम नहीं है.

यह जितना अनुभव किया जाए उतना इसे विस्तार मिलता है. जिन्होंने वेद-पुराण-उपनिषद को रचा वे स्वयं अपने अनुभव को सम्पूर्ण नहीं मानते तो ये पटनायक क्या है.

बहरहाल, मैं भी अपनी आने वाली रचनाओं के लिए वेद पुराण का अध्ययन कर रहा हूँ तो पाता हूँ कि ये देवदत्त पटनायक जैसे लोग कितनी अधूरी और भ्रमित व्याख्या करते हैं.

मगर इसके लिए किसे दोष दिया जाए? हम ही इसके कसूरवार हैं, जब हम ही अपने समृद्ध ग्रंथों को नहीं पढ़ेंगे तो ये ज्ञान के दलाल तो बीच में खेल खराब करेंगे ही, जिससे इनकी दुकान चलती रहे.

जहां तक रही बात इस पोस्ट के संदर्भ में, तो जो हम आँखों से देख सकते हैं उससे कहीं अधिक है सृष्टि में, जिसे हम देख नहीं पाते.

उस अनदेखे को ही देखने के लिए आँखे बंद कर ध्यान करना होता है. जो बाहर है, वही भीतर है क्योंकि मैं ही तो ब्रह्म हूँ. और यहां मैं तुम भी हो.

पटनायक जैसों के लिए यह सब समझना कठिन है वैसे भी उसके मतानुसार सब कुछ सिर्फ मिथ है, जिस की सोच के मूल में ही मिथ्या है उससे कैसी अपेक्षा करना?

देवदत्त पटनायक का फ्रॉड दर्शन

आज एक विचित्र घटना मेरे साथ घटी. मेरे पत्नी के एक ऑफ़िस के जूनियर सहयोगी है (IIT/ IIM वाले हैं), सपरिवार घर पर आए.

कुछ देर राजनैतिक, साहित्यिक चर्चा होती रही, फिर चर्चा धर्म पर पहुँच गई. तो, उन भाई ने बताया कि वे देवदत्त पटनायक के बहुत बड़े पंखे (फैन) हैं.

मैं बात टालना चाह रहा था, फिर वे अपने फ़ोटो देवदत्त पटनायक के साथ के दिखलाने लगे. बात यदि, यहीं रुक गई होती तब भी कुछ नहीं होता. पर बंदे ने एक ऐसी बात बोल दी कि मेरा सब्र टूट गया.

उसने कहा कि आप लोग जब मंदिर जाते हैं तो दर्शन के लिए कहा जाता है तो आप लोग आँख बंद क्यों कर लेते हैं? और देवदत्त पटनायक का वीडियो दिखाने लग गया. बोलने लगा कि देवदत्त कहता है कि दर्शन के स्थान पर हिन्दू आँख मूँद लेता है.

मैने उस बंदे को बोला कि तुम बंदर हो. ही सेड, “हाऊ डेयर यू?” फिर मैंने बोला, देवदत्त पटनायक भी बंदर है. हालाँकि वामपंथी को बंदर कहना बंदर को ही गाली है.

उसको मैने ब्रह्म सूत्र के द्वारा समझाया कि वेद हमें अंतर्मुखी होने को कहते हैं. मूर्ति को भी देखने के बाद उसे ध्यान के द्वारा हृदय में स्थापित किया जाता है.

फिर भी बंदा सुनने को तैयार नहीं. बोला उदाहरण दीजिए रामायण या किसी ग्रंथ जो आँख मूँदने के लिये कहता हो.

मैं बोला, आपको बंदर मैने इसीलिए बोला था कि आपका कुतर्क का स्वभाव है.

फिर मैने प्रसंग बताया कि जब बंदर, सीता जी का पता लगा रहे थे और एक महीने बीत गए और स्वयंप्रभा मिली तो उसने पूछा, “कैसे ढूँढ रहे हो शक्ति को. आँख खोलकर कि आँख बंद करके.”

बंदर (देवदत्त टाइप) कूद कर बोले, “अरे नहीं, हम आँख खोलकर ढूँढ रहे है और हमें दर्शन भी करना है.”

तेहिं सब आपनि कथा सुनाई। मैं अब जाब जहाँ रघुराई॥

तब स्वयंप्रभा बोलती हैं, “मूर्खो, जगतजननी का दर्शन आँख मूँद कर होता है.”

मूदहु नयन बिबर तजि जाहू। पैहहु सीतहि जनि पछिताहू॥
नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा। ठाढ़े सकल सिंधु के तीरा॥

भाई, थोड़ा झेपें और जल्दी ही निकल लिए.

देवदत्त पटनायक एक वामपंथी फ्रॉड है.

राम की भक्ति आँख खोलकर भी होती है और आँख मूँद करके भी होती है.

दर्शन के लिए, ध्यान के लिए, भक्ति के लिये, योग के लिए और समाधि के लिए, आँखे बंद करके अंतर्मुखी हुआ जाता है.

बाकी, फ्रॉड देवदत्त पटनायक जैसों को आँख खोलकर देखते रहिए.

हर हर महादेव.

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