कीर्तिमुख : जो घर बारे आपना, सो चले हमारे साथ

ये कहानी शिव पुराण में आती है और शायद जालंधर नाम के असुर की है. ध्यान रहे, असुर बताया गया है राक्षस नहीं था, कम से कम इस कहानी तक तो नहीं.

शक्ति-सामर्थ्य में अक्सर असुर, देवों यानि सुरों से ऊपर ही होते थे. असुर ने भी थोड़े ही समय में इन्द्रासन कब्ज़ा लिया और जैसा कि आसुरी प्रवृत्ति होती है वैसे ही उसने भी सोचा कि अब मैं सबसे महान हूँ, तो सभी सबसे अच्छी चीज़ों पर मेरा अधिकार है.

इसी मद में असुर पहुंचा कैलाश पर और शिव के साथ पार्वती को देखकर कहा, सबसे सुन्दर स्त्री पर मेरा अधिकार है, तो लाओ इसे मेरे हवाले करो!

आम तौर पर कहा जाता है कि भगवान कभी आपका नुकसान नहीं करते. वो सिर्फ आपकी मति भ्रष्ट कर देते हैं, फिर आप अपने शत्रु स्वयं हैं, भगवान को आपका नुकसान करने की जरूरत नहीं.

भगवान शिव ने भी असुर के साथ यही किया. असुर की भूख को पलटा कर उस पर छोड़ दिया!

भगवान शिव से प्रकट हुई वो प्रचंड क्षुधा रास्ते की सभी चीज़ों को निगलती असुर की ओर बढ़ी तो उसने पहले तो इस शक्ति का अपनी शक्तियों से प्रतिकार करने का प्रयास किया. लेकिन उन सभी प्रतिरोधों को निगलता वो जब असुर को लीलने को हुआ तो बेचारा असुर भागा.

यहाँ-वहां कहीं शरण नहीं मिलने पर बेचारा असुर अपनी मूर्खता पर पछताता आखिर भगवान शिव की ही शरण में पहुंचा और लगा प्राणों की भीख मांगने.

भगवान शिव ने जैसे ही उसे क्षमा करके सबकुछ निगलते पीछे ही आ रही शक्ति को रुकने कहा तो वो दैवी शक्ति बोली भगवान एक तो मुझे इसे ही खाने के लिए ऐसी भूख बना कर पैदा किया! अब आप मेरा आहार ही छीन रहे हैं? मैं अब क्या खाऊं?

भगवान ने एक क्षण सोचा और कहा, ऐसा करो स्वयं को ही खा जाओ! आदेश पाते ही उसने पूँछ की ओर से खुद को खाना शुरू किया और अंत में केवल उसका मुख ही बचा. अक्सर हिन्दुओं के मंदिरों के द्वार पर यही मुख दिखता है.

भगवान शिव ने आदेश पालन के लिए स्वयं को खा लेने की उसकी क्षमता के लिए उसके मुख को ‘कीर्तिमुख’ नाम दिया था. उसे देवताओं से भी ऊपर स्थान मिला था.

कहानियां केवल प्रतीक होती हैं और ये कहानी भी खुद को ‘मैं’ को खा जाने की कहानी है. प्रतीक के माध्यम से ये वही कहा गया है जो काफी बाद के दोहे में ‘जो घर बारे आपना, सो चले हमारे साथ’ में कहा गया है.

अपने अहंकार को खा जाने का ये आदेश कई बार कई ग्रंथों में कई साधु देते रहे हैं. ये अहंकार का अभाव सबसे आसानी से छोटे बच्चों में दिखेगा, इसीलिए बच्चों के रूप को शिव के पर्यायवाची की तरह भी इस्तेमाल किया जाना दिख जाएगा. दिगंबर, भोले जैसे नाम इसीलिए इस्तेमाल होते हैं.

इसी बच्चों वाले तरीके का इस्तेमाल कई जाने माने विद्वान अभी हाल में Sanskrit Appreciation Hour में करते हुए भी दिखे हैं. वो लोग पञ्च-चामर छन्द में रचित शिवताण्डवस्तोत्र सीखने-सिखाने के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे थे.

जैसे बच्चे किसी चीज़ को पहचाने, समझने के लिए उसे उल्टा पलटा कर, तोड़ कर खोल कर देखने लगते हैं बिलकुल वही तरीका इसपर भी इस्तेमाल किया गया था.

चर्चा अंग्रेजी में थी तो उनके तरीके को हमने सिर्फ हिंदी में कर देने की कोशिश की है. अगर पञ्च-चामर छन्द फ़ौरन याद ना आये तो बचपन में पढ़ी कविता याद कर लीजिये :

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती.
स्वयंप्रभा समुज्वला स्वतंत्रता पुकारती.
अमर्त्य वीर पुत्र हो दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो.
प्रशस्त पुण्य पंथ हैं – बढ़े चलो बढ़े चलो.
– जय शंकर प्रसाद

ये चार चरणों का वर्णिका छन्द होता है.

अब शिव ताण्डव का पहला श्लोक:
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्.
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्..१..

‘जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले’ से स्थले का मतलब स्थान, जगह होगा, ‘जल-प्रवाह-पावित’ का अर्थ पवित्र जल का बहना, प्रवाह होगा (शुद्ध, स्वच्छ और पवित्र तीनों अलग अर्थ के शब्द हैं ध्यान रखिये).

‘जटा-अटवी-गलत्’ यानि जटाओं के वन से बहती हुई, घनी जटाओं की तुलना वन से की गई जो कि अंग्रेजी के simily जैसा अलंकार है.

अटवी का सही अर्थ विहार करने योग्य स्थान होता है, जो अट् धातु से बना है, इसी अट् से पर्यटन बनता है जिसका मतलब घूमने देखने के उद्देश्य से कहीं जाना होता है.

यहाँ ‘गलत्’ सन्धि में जल से मिलकर ‘गलज्’ हो जाता है. ये वर्तमान कृदन्त है जो वर्तमान काल में चल रही क्रिया का बोध कराता है.

‘गले ऽवलम्ब्य’ यानि गले से लटकता हुआ, ‘भुजङ्ग-तुङ्ग-मालिकाम्’ भव्य साँपों की माला, और ‘लम्बिताम्’ एक विशेषण है जो माला के लिए इस्तेमाल किया गया है, जैसे हम लोग अभी भी किसी काम के अटके पड़े होने के लिए लटका हुआ या लम्बित कहते हैं.

अगले वाक्य में फिर पीछे से ‘अयम्’ यानि ये ‘डमरु’ जो ‘निनादवत्’ अपनी ध्वनि यानि ‘डमड् डमड् डमड् डमड्’ से पहचाना जा रहा है.

अब यहीं ‘निनादवत्’ के अंत में ‘वत्’ आ रहा है लेकिन सन्धि होते ही वो ‘न्निनादवड्डमर्वयं’ हो जाता है. ये बिलकुल वैसा ही है जैसे भागवत गीता एक साथ जोड़ते ही भगवद्गीता हो जाती है, ‘त’ का ‘द’ जैसा हो जाना.

अब इसमें जितना एक श्लोक के साथ सिखाया गया है उतने के लिए हमें पांच-छह बार तो किताबें पलटनी ही पड़ेंगी, लेकिन अच्छी चीज़ ये है कि किसी भी समय में अगर आप कुछ सीखना चाहते हैं तो सीख लेना आसान ही है.

पहला कदम होता है अहंकार को खा जाना. मैं नहीं जानता ये स्वीकारना मुश्किल काम है, लेकिन नामुमकिन बिलकुल नहीं है.

अंतिम वाक्य के ‘चकार’ का अर्थ वो कर चुके जैसा होगा, क्या किया वो खुद देखने की कोशिश कीजिये. बाकी शिवरात्रि शिव से जुड़ने के लिए योगियों को प्रिय रही है, अपनी उन्नति के साथ-साथ आप ज्ञान को एक पीढ़ी आगे भी बढ़ा रहे होंगे. अगर आप एक स्तोत्र भी सीखते हैं तो ये संयोग भी उत्पन्न होगा. प्रयास कीजिये!

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