आवश्यक नहीं है वैराग्य, शिवमय होने के लिए

अभिनव गुप्त की दार्शनिक पहुंच को समझने के लिए हमें पहले वसुगुप्त की भूमिका को समझने का प्रयास करना चाहिए. लगभग 800 ईस्वी में वसुगुप्त को शिव सूत्र का बोध हुआ.

कुछ अनुयायियों की मान्यता है कि यह बोघ वसुगुप्त को सीधे शिव से ही हुआ था. वसुगुप्त ने शिव सूत्र के ही आधार पर शिव और शक्ति की असाधारण धारणा को प्रतिपादित किया. अपनी स्पंद कारिका में उन्होंने शिव और शक्ति के अंतर को स्पष्ट किया.

अनंत और शुद्ध ज्ञान का नाम ही शिव या ईश्वर है और इस अनंत क्षमता का आभास और उसे कार्यान्वित करने को ही शक्ति कहते हैं. शिव शांत, स्थिर, अनंत और चैतन्य है तो शक्ति उसका क्रिया रूप है. वसुगुप्त मानते थे कि अनंत शिव को तब तक नहीं पाया जा सकता है जब तक हम उसके द्वारा रचे इस विश्व, ब्रह्माण्ड को उसी के रूप में स्वीकार न करें. वे जगत को नकारने के रास्ते को स्वीकार नहीं करते थे.

उस युग में वसुगुप्त के सूत्रों को समझने वाले बहुत नहीं थे. लेकिन उन्होंने योग्य शिष्यों की एक लम्बी परंपरा तैयार की जिन्होंने उनके विचारों को आगे बढ़ाया. लेकिन उस समय के सभी आचार्यों द्वारा प्रतिपादित दार्शनिक मतों को एक सूत्र में बांध कर एक समग्र शैव दर्शन का रूप देने का काम अभिनव गुप्त ने ही किया.

अभिनव गुप्त असाधारण प्रतिभा के धनी थे इसलिए उन्होंने उन सभी आयामों का गहन अध्ययन किया जो उस समय प्रचलित थे. ईश्वर शुद्ध चेतना है यह तो बहुत पहले से ही वेदांत कहता आया था. लेकिन योग सूत्र यह भी मानते हैं कि जो विश्व हमारे चारों और व्याप्त है वह इस महेश्वर से बाहर एक अवास्तविक आभास मात्र है, माया है जो सच नहीं मिथ्या है.

लेकिन अभिनव गुप्त इसे स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि वे मानते हैं कि जो कुछ है भले ही माया हो, आभास मात्र हो, शिव की ही रची लीला है और इसलिए शिव का ही रूप है. केवल मैं शिव का रूप नहीं हूं, मेरे चारों ओर का विश्व भी शिव रूप ही है.

यदि ऐसा नहीं होता तो शांतचित्त ब्रह्म को विश्व की रचना करनी ही क्यों पड़ी? मनुष्य भीतर से उसी आत्मन् का रूप है, शुद्ध है, लेकिन बाहर वह हर प्रकार की क्रिया में रत है, क्रियाशील है और वह विभिन्न प्रकार के अनुभवों को महसूस करता है, वैसे ही ईश्वर भी अपनी क्रियाशीलता के कारण अपने रचे प्रपंच या सृष्टि का अनुभव करता है. उसकी यह सृष्टि मिथ्या कैसे हो सकती है?

शिव चैतन्य है जो अपने चारों ओर होने वाली गतिविधि को शांत और अकर्मण्य भाव से हीं नहीं देखता रहता है अपितु उसमें सम्मिलित होता है, क्योंकि वह भी उसी का काम है. शिव अपनी चैतन्य अवस्था में नितांत शांत रहता हो तो भी वह अपने क्रिया रूप में, शक्ति रूप में सक्रिय होता है.

इसलिए जो हो रहा है उसमें भी वही विद्यमान है. शिव का आत्म चैतन्य असीम आनंद का स्रोत है और यही आनंद क्रिया का स्रोत है. यह ब्रह्माण्ड तभी विकसित होता है जब शिव अपनी अनुभूति का विस्तार करता है या अपना ही फैलाव करता है जिसमें हम मानव उन्हीं के अंशमात्र इस जगत में विचरण करने लगते हैं. जब शिव अपने विस्तार को समेट लेता है तो विश्व का अंत होता है. वैसे ही जैसे हमारा मन गहन निद्रा में पूर्ण शांति को प्राप्त होता है.

अपने भीतर शिव को देखने का मार्ग अवरोधों से भरा होता है. चैतन्य कई परदों अथवा कंचुकाओं में लिपटा होता है. अवरोधों को पार करके ही हम शिव अथवा परम चैतन्य के साथ एकाकार हो सकते हैं.

शिव के साथ एकाकार होने के लिए पांच प्रकार के उपायों का सुझाव दिया गया है. ये वास्तव में आरोहन की सीढिय़ां ही है. पहला क्रिया उपाय कहलाता है. पूजा, प्राणायाम, आसन आदि इस उपाय के रूप हैं.

दूसरा उपाय है शाक्त उपाय अथवा मानसिक ऊर्जा का साधन. इसमें शरीर से अधिक मन पर केंद्रित साधनों का उपयोग किया जाता है.

तीसरा उपाय है शम्भवा अथवा इच्छा शक्ति से चैतन्य को लक्ष्य करके आगे बढऩा. हम जागृति, सुसुप्त या स्वप्न अवस्थाओं से आगे निकल कर तुरीया अवस्था में पहुंच जाते हैं.

अंतिम सीढ़ी है अनुपाय है जहां किसी उपाय की आवश्यकता ही नहीं रहती. मनुष्य धीरे धीरे शिवमय होने लगता है और उसे ऐसे लगता है कि वह स्वयं समस्त ब्रम्हांड में ही लय हो गया है. यही चैतन्य अवस्था है.

अपनी असाधारण प्रतिभा के दम पर अभिनव गुप्त न केवल तब के सभी आचार्यों के मतों और दृष्टिकोणों को एक तर्कसंगत दर्शन में बांधने में सफल हुए बल्कि उनकी प्रतिभा की झलक ज्ञान के अन्य कई आयामों में भी दिखाई पड़ती है.

अपने विश्वकोशीय आकार और विस्तार के ग्रंथ तंत्रालोक के अतिरिक्त उन्होंने काव्य और नाटक आदि पर भी भाष्य लिखे. उनकी उपलब्धि कश्मीर में शैव दर्शन को सशक्त आधार और तर्कसंगत धरातल पर खड़ा करने में है.

जिस समय अभिनव गुप्त कश्मीर में शैव मत का अध्ययन कर रहे थे, उस समय शैव दर्शन की चार पद्धतियां प्रचलित थीं. क्रम, कुल, स्पंद और प्रतिभिज्ञान. इनमें से दो तो वसुगुप्त से भी पहले से प्रचलित पद्धतियां थीं. कौल पद्धति और प्रतिभिज्ञान शाखा क्रमश: सुमतिनाथ और सोमानंद के नाम से जानी जाती थी.

स्पंद पद्धति का श्रेय तो वसु गुप्त को ही दिया जाता है. लेकिन अभिनव गुप्त ने इन चारों को इस तरह एक दूसरे के साथ पिरोया कि वे अलग न रह कर एक विराट दर्शन के विभिन्न आयाम ही दिखते है. अभिनव गुप्त का लौकिक अंत एक रहस्यमय ढ़ंग से हुआ जब 1016 ई के आसपास कृष्ण पक्ष की रात में वे श्रीनगर के पास ही एक गुफा में अपने अनेक शिष्यों के साथ प्रवेश कर के शिवमय हो गए.

– साभार जवाहर लाल कौल

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