फिर मत कहना प्रिया, वॉरियर मोड में क्यों होती हो!

तो बात बढ़ते बढ़ते तलाक तक पहुँच ही चुकी थी! मुल्ला नसरुद्दीन की बीवी चीखी, “तुम्हें मेरी एक चीज़ नहीं पसंद आती, मेरे रिश्तेदारों तक से नफरत है तुम्हें तो!

मुल्ला नसरुद्दीन ने समझाने की कोशिश की, कहा, “बिलकुल नहीं बेगम, बल्कि तुम्हारी सास को तो मैं अपनी सास से कहीं ज्यादा चाहता हूँ!”

“यही, यही तो! किस्म-किस्म के बदमाशी भरे लॉजिकल रीजन्स देकर तुम आदमी लोग बहलाने में लगे रहते हो. क्या ख़ास है भला उस प्रिया वारियर में? निहाल हुए जा रहे हैं सब के सब.”

“अब ये किसने कह दिया कि लोगों को प्रिया वारियर पसंद है? कोई पिटने के डर से चुप है, कोई समझदार हो गया, लोक-लाज का ख़याल रखता है. किसी किसी की याददाश्त बुढ़ापे में कमजोर हो गई है इसलिए बता नहीं पा रहे होंगे. वरना उसमें प्रिया वारियर किसे दिख गई?”

“प्रिया वारियर नहीं तो क्या हेमामालिनी दिख रही है वीडियो में?”

“स्कूल के जमाने की क्रश सरकार, किसी को चेहरे के एक तरफ बाल और एक इयर-रिंग शो ऑफ करती मुस्कुराती सी कोई लड़की याद आई होगी. किसी को वो भरतनाट्यम जैसा गर्दन हिलाना दिखा है. किसी को भौं मटकाती मूंह बिसूरने वाली कोई!”

“अच्छा, उसकी वीडियो के दर्जन भर वेरिएशन तो तुम्हारे फोन में भी पड़े हैं, तुम्हें कौन सी सूझ गई?”

“वाह, जैसे हम तो स्कूल-कॉलेज गए नहीं, नौजवान थे ही नहीं कभी? वो तो आपकी किस्मत है सरकार कि आपको बुड्ढा मिल गया! वैसे लगता क्या है, इति ये उर्दू शायरी क्यों आती होगी?”

“अच्छा जी! समुदाय विशेष की कन्या के चक्कर में उर्दू सीख ली, तो क्या कोई बंगालन होती तो बंग्ला भी आती?”

“टूटी फूटी आती तो है ही ना, चांदी को बंग्ला में रूपा कहते हैं, अक्सर गोरी सी लड़कियों का नाम होता है, यू नो?”

“और चप्पल को चोट्टी, वो भी पता होगा? वैसे बनते तो बड़े साधु हो, और ये लिस्ट सौ पचास की? अच्छा उर्दू सीखने का फायदा भी हुआ कोई?”

“हुआ ना, कम बोलने से काम चल जाता है जैसे धर्मवीर भारती की लम्बी सी बोरिंग कविता सुनाओ किसी को:

रख दिए तुमने नज़र में बादलों को साधकर,
आज माथे पर सरल संगीत से निर्मित अधर,
आरती के दीपकों की झिलमिलाती छाँव में,
बाँसुरी रखी हुई ज्यों भागवत के पृष्ठ पर!

और वो कंफ्यूज हो सुनकर कि ये बात क्या चल रही है? कोई ऐसा है जिसे प्रेम में भी भागवत-बांसुरी जैसे पूजा के बिम्ब दिख रहे हैं या किसी पुजारी को प्रेम हो गया है!”

“तुम्हारे टाइप जीव पर लिखा नहीं लगता ये कुछ-कुछ शेष? कहने को बांसुरी-भागवत और आरती, पर ध्यान कजरारे बादलों से काले नैन और अधरों पर?”

“ह्म्म्म! उर्दू हमेशा यहीं पे होती है, इक तरफ उसका घर, एक तरफ मैकदा कह लो या खुदा ही मिला ना विसाल-ए-सनम! एक लाइन में काम हो गया.”

“हाँ तुम्हारी सी हालत पापी मनुष्य, दूर हटो चलो अब! मैं नहा-धो चुकी तो चली मंदिर, शिवरात्रि है. मेरे लौटने तक नहा लेना, बैठे प्रिया वॉरियर देखते मिले तो मत कहना कि हमेशा वॉरियर मोड में क्यों होती हो!”

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