ढाई आखर प्रेम के

वो प्रेम नगर का सबसे सुन्दर राजकुमार है
उसके प्रेम महल में विद्वानों की आवाजाही है
जो उसके दरबार में कभी प्रेम पर कविता सुनाते हैं
तो कभी कहानी

काशी के साधु गंगा के पवित्र जल के साथ
लाते हैं प्रेम की कथाएँ
हिमालय के तपस्वी
दे जाते हैं प्रेम के चमत्कारी मंत्र

उसके नगर में सभी युवा हैं
जो दिन रात प्रेम की बगिया में
बरसाते रहते हैं
एक दूसरे पर प्रेम भरे स्पर्श
उनकी देह में गुलाब और बातों में
चन्दन की महक होती हैं…

उसकी नगरी में बहती नदिया के जल पर
जलपरियाँ नृत्य करती हैं
तो आकाश में काम-रति

उसके नगर में प्रचलित प्रेमग्रंथ में
देवी देवताओं की कथाएँ हैं
जिसमें राधा-कृष्ण, राम-जानकी
और शिव शक्ति के आध्यात्मिक प्रेम
का वर्णन है

मैं अपनी कुटिया में
साग पकाती हूँ
तो प्रयास करती हूँ
छौंक की महक
उसके महल तक ना पहुंचे
कहीं छींक से उसे फिर ज़ुकाम न हो जाए

हाथ से थापती हूँ
ज्वार की रोटी तो
प्रयास रहता है
चूल्हे का धुंआ
उसके महल की दीवारों को
काला न कर दे

झाडू बुहारते हुए बहुत
सतर्क रहती हूँ
कि धूल अधिक न उड़े

मैं उसके महल के करीब भी नहीं जाती
कि दिन रात पसीने में तर
मेरे देह की गन्ध से
उसकी साँसे दूषित न हो जाए

उसके महल से आती हवा से भी
मैं घूंघट कर लेती हूँ
कि कहीं उस तक ‘मेरे-जैसी’ के होने की
खबर न पहुंचे

प्रेम नगर का राजकुमार जो है
सो बड़े जतन से पला है और बहुत कोमल है
उसका प्रेम पावन, अद्भुत और आध्यात्मिक है
प्रेम नगर का राजकुमार बहुत विद्वान और सुन्दर है
और मैं कुरूप, अल्हड़ और अनपढ़ हूँ
तो कभी प्रेम का ढाई आखर भी ना पढ़ पाई…

इसलिए उसको प्रकृति द्वारा हर रूप में प्रेम का आशीर्वाद प्राप्त है
और मैं मात्र दर्शन की क्षुद्र अभिलाषी प्रतीक्षा के श्राप को भोगती रही….

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