और मूर्धन्य ज्योतिषी केएन राव साहब की दलीलों के सामने टिक न पाए वकील

कल मावलंकर हॉल में ज्योतिष पर एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें देश भर से सैंकड़ों ज्योतिषी इस विशाल कार्यक्रम का हिस्सा बनने आये थे. मैं ऐसे कार्यक्रमों में नहीं जाना चाहता हूँ, लेकिन कल मुझे इसमें जाना पड़ा.

इसका कारण यह था कि भाजपा के एक बड़े नेता जी को इस कार्यक्रम में पुरस्कार वितरण के लिए ससम्मान बुलाया गया था और वे मुझे भी उस कार्यक्रम में साथ ले जाना चाहते थे.

परसों त्रिमूर्ति भवन में नरेन्द्र मोदी जी द्वारा लिखित पुस्तक “एग्जाम वारियर्स” के हिन्दी रूप का योगी आदित्यनाथ जी के हाथों से लोकार्पण होना था. मैं उसी कार्यक्रम में भाग लेने जा रहा था तभी नेता जी का फोन आया कि कल के ज्योतिष के कार्यक्रम में बोलने के लिए मैं उन्हें कुछ प्वाइंट्स बता दूं.

मैं रास्ते में था और नया कुछ भी लिखने का मेरे पास बिलकुल वक्त नहीं था. इस कारण जल्दी में, मैंने अपनी ज्योतिष पर लिखी पहली पोस्ट उन्हें सेंड कर दी. उनका आग्रह था कि मैं भी उस कार्यक्रम में आऊं. मैं भी देखने चला गया कि देखूँ कि इनकी डायलॉग डिलीवरी कैसी है?

नेता जी तो बहुत ही जबरदस्त वक्ता निकलें. जब उन्होंने सैकड़ों ज्योतिषियों के बीच मेरे उस पोस्ट का, भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को विराट रूप दिखाना और उसमें अर्जुन द्वारा अपने पुत्र अभिमन्यु की मृत्यु को न देख पाने का प्रसंग सुनाया तो पूरा मावलंकर हॉल तालियों से गूंज उठा. इतनी तालियाँ वहाँ उपस्थित किसी ज्योतिषी को भी नसीब नहीं हुई थी.

उनके बाद गोरखपुर से आये एक महान ज्योतिषाचार्य जी को बोलना था. वे भी बहुत अच्छा वक्ता माने जाते हैं. बेचारे पर दबाव रहा होगा कि नेता जी से भी अधिक तालियाँ बटोरनी है. वे लगे स्वामी रामदेव को गरियाने कि रामदेव ज्योतिष को पाखंड कहते हैं, अगर उनमें दम है तो मुझसे शास्त्रार्थ करें. यहाँ तक तो ठीक था, इसके बाद उन्होंने मूर्धन्य ज्योतिषी के.एन. राव साहब पर हमला बोल दिया. वे अपनी बात सही साबित करने के लिए उलजुलूल तर्क देने लगे.

राव साहब अक्सर कहते हैं कि अगर कोई नियम साठ प्रतिशत या इससे अधिक कुण्डलियों पर सही साबित होता है तो हमें ज्योतिष के उस सूत्र को वैज्ञानिक मानना पड़ेगा. जैसे कुण्डली में अगर तृतीयेश एकादश भाव में हो या एकादशेश तृतीय भाव में हो, तो साठ प्रतिशत कुण्डलियों में यह पाया गया है कि जातक अपने सहोदर भाई-बहनों में या तो सबसे बड़ा होगा या सबसे छोटा.

उनकी इसी प्रकार की वैज्ञानिक तर्कों को बिलकुल न समझते हुए वो गोरखपुर वाले ज्योतिषी महाराज कह रहे थे कि राव साहब साठ प्रतिशत ही ज्योतिष को सत्य मानते हैं जबकि ज्योतिष सौ प्रतिशत सही है.

राव साहब ज्योतिष की नहीं बल्कि अपनी सीमाएं बता रहे हैं कि उनको साठ प्रतिशत ही ज्योतिष का ज्ञान है. ऐसी बातें लोगों को खूब आनन्दित करती हैं, लोगों ने जी भरकर तालियां बजाईं.

इन ज्योतिषी महाराज का लग्न वृष है और नीच का शनि इनके बारहवें घर में बैठकर इनके दूसरे वाणी के घर को देख रहा है. बिलकुल यही स्थिति अरविंद केजरीवाल की भी है. उसका भी लग्न वृष है और नीच का शनि बारहवें घर में बैठकर उसके दूसरे वाणी के घर को देख रहा है.

ये जनता से झूठ बोल-बोल कर ही मुख्यमंत्री बन गया और सबसे बड़ी बात की लोगों ने इसकी झूठ पर अंधविश्वास किया क्योंकि वृष लग्न के लिए शनि प्रबल राजयोगकारक होकर अति बलवान है.

ज्योतिषी महाराज भी अपने ग्रहों की इसी विशेष स्थिति का लुत्फ उठा रहे थे. इन्हें अहसास ही नहीं है कि इनके जिन बकवास की तर्कों पर जनता ताली बजा रही है, वो तर्क न्यायालय में फूँक के उड़ा दिये जायेंगे. वहाँ राव साहब के साठ प्रतिशत वाले विनम्र तर्कों की ओट में ही ज्योतिष को बचाया जा सकता है.

अब जरा हमलोग राव साहब के ज्योतिष में योगदान पर विचार कर लें. पिछली एनडीए की जब केंद्र में सरकार थी तब डॉ. मुरली मनोहर जोशी मानव संसाधन विकास मंत्री थे, तभी यूजीसी में ज्योतिष को शामिल किया गया था.

यूजीसी के इस निर्णय के खिलाफ छद्म सेक्युलर, छद्म साइन्टिस्ट, मीडिया सभी हमलावर हो गए थे. मद्रास हाई कोर्ट में यूजीसी के इस निर्णय के खिलाफ केस किया गया, जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया. इसी विषय पर आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में विख्यात वैज्ञानिक पद्मनभैया ने केस किया, जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया.

इसके बाद पद्मनभैया ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की. उस समय के प्रभावशाली वकील शांति भूषण ने सर्वोच्च न्यायालय में मेरिट के बेस पर केस की सुनवाई करवाने में सफलता हासिल कर ली.

राव साहब उस समय बहुत अस्वस्थ चल रहे थे, वे न्यायालय की कार्यवाही में घण्टों बैठने की स्थिति में नहीं थे. उन्होंने देशभर के ज्योतिषियों का आह्वान किया कि वे सर्वोच्च न्यायालय में ज्योतिष विषय के पक्ष में लड़ें. बीस ज्योतिषियों ने उन्हें आश्वासन भी दिया कि वे ऐसा करेंगे, पर न्यायालय में सुनवाई के दिन राव साहब एकमात्र याचिकाकर्ता थे जो इसका बचाव कर रहे थे.

बचाव के लिए याचिकाकर्ता बनना तो दूर, कोई ज्योतिषी वृद्ध और बीमार राव साहब के साथ न्यायालय में खड़ा होने भी नहीं आया. राव साहब ने आर्त भाव से ईश्वर से प्रार्थना की कि हे प्रभु ! मुझे शक्ति दो कि मैं इस केस को लड़ पाऊँ.

शांति भूषण जैसे घाघ वकील के कुटिल तर्कों की राव साहब ने वैज्ञानिक आधार पर धज्जियाँ उड़ा दी. उनके इस प्रयास का ही परिणाम है कि 4 नवम्बर , 2004 को सर्वोच्च न्यायालय ने राव साहब के अकाट्य तर्कों को 22 मिनट तक सुना और उसके बाद ज्योतिष के पक्ष में निर्णय दे दिया कि जो विश्वविद्यालय इस विषय को अपने पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहते हैं, वह उसे अपने पाठ्यक्रम में शामिल कर सकते हैं.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY