सिनेमा के बहाने : हमारे समय को टटोलती इस साल के विदेशी भाषा के ऑस्कर में नामित फ़िल्में

बीती जनवरी की 23 तारीख़ को नब्बे वें ऑस्कर पुरस्कारों के नोमिनेशन्स की घोषणा हुई. ऑस्कर पुरस्कारों पर दुनिया भर के सिनेमा प्रेमियों की नज़र रहती है. इस साल के ऑस्कर (एकेडमी) पुरस्कार 4 मार्च को कैलिफोर्निया के लॉस एंजेल्स में दिये जाएँगे.

हॉलीवुड को स्तरीय सिनेमा के लिए दुनिया भर में माना जाता है और समीक्षक से लेकर सिनेमा प्रेमी इन फ़िल्मों को (और ख़ासतौर पर नामांकित तथा जीतने वाली) अलग नज़र से देखते हैं.

शुरुआती समय से ही ऑस्कर पुरस्कार ने अपनी साख बना कर रखी है और ब्रांडिंग-मार्केटिंग के इस युग में ऑस्कर को उत्कृष्टता का दर्जा हासिल है. हॉलीवुड के इस पुरस्कार में दुनिया के सिनेमा के लिए केवल एक कैटेगरी ‘बेस्ट फॉरेन लैंगवेज फ़िल्म’ की है और बाक़ी के सारे पुरस्कार अमेरिकन फ़िल्मों के लिए ही हैं.

विश्व सिनेमा के ख़ज़ाने में हॉलीवुड का बड़ा हिस्सा है और यह लगातार समृद्ध हो रहा है. बहरहाल, इस साल चयनित फ़िल्मों का बड़ा हल्ला है और स्टीवन स्पीलबर्ग, मेरिल स्ट्रीप, क्रिस्टोफर नोलान, डैनियल डे लुईस, पॉल थॉमस एंडरसन, सैली हॉकिन्स, डेंजेल वाशिंगटन, फ़्रांसेस मैकडोरमंड, तिमोथी चेलमेट, ग्रेटा गरविग जैसे नामों की धूम है.

मैक्सिकन मूल के निर्देशक गिलर्मो डेल तोरो की फ़िल्म ‘द शेप ऑफ वाटर’ सबसे ज़्यादा 13 श्रेणियों के लिए नामांकित हुई है उसके बाद क्रिस्टोफ़र नोलान की ‘डनकर्क’ को 8 श्रेणियों में नामांकित किया है. ‘लेडी बर्ड’ के लिए बतौर श्रेष्ठ निर्देशक नामित ग्रेटा गरविग ऑस्कर के इतिहास में केवल पाँचवी महिला निर्देशक हैं.

वहीं छ: श्रेणियों के लिए नामित ‘फैन्टम थ्रेड’ दिग्गज अभिनेता डैनियल डे लुईस की आखरी फ़िल्म है जिसके बाद वे अभिनय से संन्यास लेने की घोषणा कर चुके हैं. वाशिंगटन पोस्ट अखबार द्वारा पेंटागन हाउस के दस्तावेज़ लीक करने और 70’ के वियतनाम युद्ध में अमेरिका के शामिल होने की ख़बर वाली स्पीलबर्ग की फ़िल्म ‘द पोस्ट’ दुनिया भर में देखी जा रही है.

वहीं क्रिस्टोफ़र नोलान के अप्रैल माह में भारत आने की ख़बर भी सुर्खियां बटोर रही हैं. विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए भारत की आधिकारिक तौर पर भेजी गई फ़िल्म एक बार फिर चयनित नहीं हो सकी. इसके पीछे के कारण, तर्क, बहस आदि पर फिर कभी बात होगी.

विदेशी भाषा की नामित इस सूची की पाँच में से चार फ़िल्में ‘ऑन बॉडी एंड सोल’ (हंगरी), ‘ए फैन्टास्टिक वूमन’ (चिली), ‘लवलेस’ (रूस) और ‘द स्क्वेयर’ (स्वीडन) मैंने गोवा इफ़ी में देखी थीं. लेबनान की फ़िल्म ‘द इन्सल्ट’ के साथ यह सूची पूरी होती है.

इस तरह अमेरिका, यूरोप और एशिया का प्रतिनिधित्व इस साल के ऑस्कर में होता है. हालांकि, भारतीय मानसिकता के हिसाब से ‘ए फैन्टास्टिक वूमन’ का माहौल अलग तरह का है जहां एक ट्रांसजेंडर बनी मरिना अपने अस्तित्व और समाज से जूझ रही है.

एक गायिका के रूप में अपने सपनों की खोज कर रही मरिना को उम्र में तीस वर्ष बड़े व्यवसायी ओर्लेन से प्रेम हो जाता है. अपने जीवन के सपनों को बुनते हुए प्रेम के क्षणों में ही ओर्लेन की तबीयत खराब हो जाती है और अस्पताल में उसे मृत घोषित कर दिया जाता है.

मरिना का संघर्ष यहाँ से शुरू होता है जब ओर्लेन की पहली पत्नी, बच्चे और बाक़ी लोग उस पर ओर्लेन की हत्या का शक करते हैं. मरिना के ज़रिये हम उस मानसिकता की भावुकता में जाते हैं जहां ख़ुद मरिना के अपने आप से भी सवाल हैं, अपने अस्तित्व से भी और ज़िंदगी से भी. हंगरी की इलदिको एनयेदी निर्देशित ‘ऑन बॉडी एंड सोल’ विज़ुयल ट्रीट के साथ-साथ विचार के स्तर पर भी अनूठी कृति है. इस फ़िल्म में ठहराव के साथ मधुर पार्श्व संगीत चलता रहता है.

इनयेदी एक सोचने वाली फ़िल्मकार हैं और उनकी बरसों पहले की कमाल की श्वेत-श्याम फ़िल्म ‘माय ट्वेंटीथ सेंचुरी’ से उनकी ख्याति है. उनकी फ़िल्मों के विषय जीवन की उन परतों को उधेड़ते हैं जिन्हें सामान्य तौर पर भागदौड़ भरी ज़िंदगी में अनदेखा ही किया जाता है.

मनोवैज्ञानिक पक्षों को हास्य के साथ प्रस्तुत करना उनकी ख़ासियत है पर ‘ऑन बॉडी एंड सोल’ हास्य के साथ भावनात्मक मनोविज्ञान को टटोलती है. बुडापेस्ट के शहरी वातवरण से दूर बने बूचड़खाने में दो अपने में गुम इंसान एन्द्रे और मारिया तब एक दूसरे के क़रीब आते हैं जब उन्हें पता चलता है कि दोनों एक जैसे सपने देखते हैं.

सपने में वे दोनों हिरण बन जाते हैं. यह एक कमाल के अहसास दिलाने वाली फ़िल्म है जब रूह और शरीर के बीच इस तरह के संपर्कों और सवालों के ज़रिये प्रेम को खोजने और उसे जीने की कोशिश दो इंसान कर रहे हैं. कई अर्थों और दृश्यों में यह रूहानी फ़िल्म है. जिसे बेहतरीन कैमरा वर्क के साथ दर्शाया गया है.

पर रूस की फ़िल्म ‘लवलेस’ और स्वीडन की फ़िल्म ‘द स्क्वेयर’ के चर्चे कुछ ज़्यादा ही हैं. आंद्रे व्याग्निस्तेव की ‘लवलेस’ विशुद्ध रूप से शेक्सपीरियन ड्रामा वाली संवाद आधारित फ़िल्म है. जब मैंने इसे गोवा कला अकादमी में देखा था तो मुझे बर्गमैन की फ़िल्म ‘सीन्स फ्रॉम ए मैरिज’ याद आई थी. बाद में ‘लवलेस’ के बारे में पढ़ने पर व्याग्निस्तेव के साक्षात्कार में यह पुख्ता भी हुआ कि इसके कई हिस्सों में बर्गमैन की फ़िल्म का प्रभाव है.

बर्गमैन की वह फ़िल्म भी एक आपसी रिश्तों में घुटन को जी रहे दंपत्ति की कहानी है पर उसका प्रभाव मुख्य रूप से कैमरे का वह कमाल है जब लगभग पूरी ही फ़िल्म में क्लोज़-अप और टाइट फ़्रेम है और लॉन्ग शॉट का बिलकुल इस्तेमाल नहीं है (केवल एक दृश्य को छोड़कर). यह तनाव फ़िल्म देखते वक़्त दर्शक को भी महसूस होता है. बाद में गोविंद निहलानी ने ‘रुक्मावती की हवेली’ में भी यही प्रभाव दोहराया था.

‘लवलेस’ को देखने के बाद नीरसता का ही अनुभव हो रहा था. यह एक ऐसे दंपत्ति के अलगाव और रिश्ते में ‘कोल्डनेस’ के साथ नफ़रत की कहानी है जिनकी टकराहट का प्रभाव उनके बारह वर्षीय बच्चे अल्योशा पर पड़ता है. अल्योशा के स्कूल से वापस लौटकर रास्ते में गुम हो जाने और बाद में नहीं लौटने के बाद उसकी खोज में कुछ समय ज़रूर यह दंपत्ति (बोरिस और जेन्या) साथ होते हैं पर उनका टूट चुका रिश्ता और उसकी ख़त्म हो चुकी सांसें ज़रूर सुनी-देखी-महसूस की जा सकती हैं. इस महानगरीय जीवनशैली का यह सिनेमाई दस्तावेज बहुत कुछ सोचने पर विवश करता है.

इन सबके बीच सिनेमा के मनोरंजन, कला के यथार्थ, ज़िंदगी की काल्पनिकता और उसके सम्पूर्ण प्रभाव वाली रूबेन ऑसलैंड निर्देशित ‘द स्क्वेयर’ कमाल का व्यंग्य है. अपने सम्पूर्ण प्रभाव में यह फ़िल्म एक दार्शनिकता का अहसास देती है जब जीवन की हैरानी भरी हकीकत हास्य और नाटकीयता के साथ हम तक पहुँचती है. स्टॉकहोम के म्यूज़िम का क्यूरेटर क्रिस्टीयान अपने होने वाले शो ‘स्क्वेयर’ की सफलता के प्रचार का जो तरीका अपनाता है उससे म्यूजियम की छवि को धक्का पहुंचता है.

वह इस्तीफ़ा देता है पर इसी बीच उसकी ज़िंदगी उस उथल-पुथल से गुज़र रही जब अपने साथ एक रात हमबिस्तर हुई लड़की को भी वह पहचान नहीं पाता. साथ ही पर्स चोरी हो जाने और मिल जाने की जिस घटना के बाद वह उस लड़की से मिला था, वह घटना भी उसके मानसिक पर दबाव डालती है जिसके कारण एक बच्चे पर चोरी का इल्ज़ाम लगा था.

दरअसल यह सारी फ़िल्में हमारे आसपास के समय और हमारी जीवन शैली को ही किसी न किसी बहाने इंगित कर रही हैं. हम चलते-चलते कहाँ पहुँच गए हैं, यही सवाल है और उस का हासिल ही इन फ़िल्मों का अनुभव. हम खुद पर हँस रहे हैं, और दुखी हो रहे हैं. इस लिस्ट में ‘द स्क्वेयर’ पर निगाहें हैं जो ऑस्कर की दौड़ में सबसे आगे दिख रही है.

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