गूलर पर पारिजात का बरसना

प्रेम ईश्वर की बगिया का नन्हा सा फूल है
जिसे बहुत कोमलता से सहेजना होता है
जैसे एक माँ सहेजती है
गर्भ में पल रहे शिशु को

जैसे रस्सी पर चलता नट संभाले रहता है
संतुलन अपनी लाठी से
और बहुरुपिया सारे मुखौटे के साथ
अपना वास्तविक चरित्र

मध्यमवर्गीय संभाले रखता है नौकरी
अमीर अपना खोता सुख चैन
और गरीब सहेज लेता है रोटी
बच्चों के लिए

रात सहेजे रहती है घटते बढ़ते चाँद को
दिन जलते आसमान को
जैसे नदी सहेजे रखती है दूधिया साड़ी की
दोनों तरफ की गेरुआ किनारी

क्षितिज संभाले रहता है
धरती और गगन दोनों को
सूर्य की नोंक पर

कविता संभाल लेती है
शब्दों में बिखरते भाव
संगीत सहेज लेता है
सुर और ताल

फ़कीर संभाले रखता है अपनी झोली
साधक अपनी साधना
शिष्य गुरु का प्रकोप और आशीर्वाद
घाव अपनी पीड़ा और मवाद

ईश्वर व्यस्त है सृष्टि संभालने में
शिव व्यस्त है शक्ति में
कान्हा को फुर्सत नहीं
राधा और गोपियों से
राम को अपनी मर्यादा से

ऐसे में कौन करता तुम्हारी तीमारी
तो मैंने संभाल लिया तुम्हारा स्वास्थ्य
सहेज ली जावित्री सी महकती साँसें
और सिगरेट सी बुझती साँसों में
डाल दी है देह की अगन
बातों में काली मिर्च का तीखापन
गुड़ सी मिठास गाली में

धरती सा धैर्य सहेजे हूँ हृदय में
गगन की विशालता बाहों में
आँखों में प्रतीक्षा तो स्वत: ही
सहेजी हुई है सनातन काल से

रोज़ देह के रोमकूप में उग आते हैं पारिजात
और चेतना महकती है रातभर रातरानी सी
कि जब किसी दिन तुम भरी दोपहर
गूलर के नीचे प्रतीक्षारत मुझे पुकारोगे
मैं ईश्वर की बगिया के उस नन्हे से फूल को
सबके सिर से वार के तुम्हारी नज़र उतारूंगी
और अपनी आँखों में काजल बनाकर कस लूंगी
इसके पहले कि तुम गूलर का फूल हो जाओ

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