फागुन आयो रे

महाभारत युद्ध के पश्चात पांडवों द्वारा अश्वमेध यज्ञ के दिग्विजयी घोड़े को आधुनिक मणिपुर के निकट अर्जुन के पुत्र वभ्रूवाहन ने रोक लिया, अर्जुन अपने पुत्र को पहचान ना पाये और एक भीषण युद्ध मे अपने ही पुत्र द्वारा संधानीत एक विशिष्ट तीर से आहत होकर मृतप्रायः हो गए ।

भीष्म को धोखे से मारने के अपराध में माता गंगा द्वारा अर्जुन श्रापित थे कि एक दिन अपने ही पुत्र के हाथों मारे जाएंगे जैसे भीष्म अपने पौत्र के हाथों धोखे से मारे गए.

निसंदेह परमपवित्र माँ जान्हवी का शब्दादेश अनुपालित होना ही था.

जब यह सूचना वभ्रूवाहन की विमाता एवं शस्त्रगुरु पार्थप्रिया उलूपी तक पहुंची तो वे व्यथित होकर युद्धभूमि की ओर दौड़ पड़ी. वहाँ पहुँचकर अपनी सिद्ध नागमणि एवं मृत संजीवनी औषधि से विलाप करते हुए अर्जुन का उपचार करने लगी.

“हे पार्थ! रहा अभीष्ट सदैव हो संग मेरे भूमिशयन तुम्हारा,
स्तम्भित हूँ देख देख जंघा पर मेरी, ये दुर्जय शीश तुम्हारा..

जग ने देखा कौन्तेय कदाचित गांडीव से शर संधान तुम्हारा,
हे देव! कब दर्शित होगा कुसुमधनुधारी मन्मथ रूप तुम्हारा!

राजीवलोचन, अजानबाहु अरु सुगठित ह्रतदेश बलिहारी,
धिक दैव! हूँ मूर्छित देख विच्छेदित यह सुदर्शन देह तुम्हारी…

सुस्मरण मुझे है पार्थ अभी तक कैसे जीभर तुम्हे निहारा था,
सुड़ौल देह, रमणीय भुजाएं, अमोघ मुस्कान पर मन हारा था…

गंगा की तरंगित धाराओं पर जलक्रीड़ाओं के वो क्षण,
कुमुदिनी की दण्डिका से मेरी कटि पर मधुर आक्रमण…

प्रतिघात में मुझ नागिन की कामक्रोधमयी फुंफकार,
कैसे तत्क्षण अपने करकमलों से तुमने थामे पयोद्वार…

हुई नियंत्रित, तुझपर मोहित, मौन हुई फिर चीत्कार गयी,
हे फाल्गुन क्यों प्राणहीन है वो अंगुलिया आज कालजयी…

गांडीव के प्रियतम यही कराग्र जब मेरी करधनी तनित करे,
उदर पटल पर चलते आँगुल्य केलिशब्द प्रतिध्वनित करें

मेरी देह पर अंकित हस्ताक्षर से, निशदिन सिमरु चुम्बन सारे,
कृष्ण भुजंग ज्यूँ चंदन तरु लिपटे ऐसे सुपाश आलिंगन हमारे…

हे रणवीर, तुम्हारा रणकौशल रतियुद्ध में भी मोहित करे,
नख-दंत प्रहारों के मधुचिन्ह मेरी सकल देह शोभित करे…

हे फाल्गुन ! कैसे पाऊं विपरीत रति का, वो सुदृश्य विहंगम,
आंदोलित मम देह से झंकृत आभूषणों की ध्वनि छम छम…

बद्ध करों पर अवलंबित दोलन से, नृतमग्न मेरे रसकुम्भ विकल,
महारथी को मथती नागमणि ज्यों सागर मंथन करते देव सकल…

हो स्वेदापुरित निश्वास, रति से तुष्ट, देह का मेरी तुझ पर अवरोहण,
हिमराज हिमालय के श्रृंगों पर ज्यो चंचल प्रगलित हिमखंड पतन…

हे देव! कहो कब मैंने इस जीवन मे ऐसा कोई अपकर्म किया,
हूँ व्यथित अति यह सोचके फिर क्यों पार्थ को तुमने पार्थिव किया!

हे मृत्युंजयी महादेव शिवशंकर, अब तुम ही मेरे विधाता हो,
दो प्राणदान इस महाभक्त को, कनगत शोक हर नवराता हो…

हे चिर दाम्पत्य, हो उद्यत, कि शरण तुम्हारे युगलद्वय नत हैं,
बिन फाल्गुन कैसे हो फागुन, कहो प्रश्न मेरा क्या विसंगत है?

नीलकंठ आशुतोष सदाशिव प्रकटे सुनकर करुण पुकार,
कृष्णप्रियम, स्वशिष्य को छूकर किया देह का पुनरुद्धार…

भरकर प्रियवर को अंक में अपने, उलूपी हर्ष से भाव विभोर हुई,
दिए को बाती, चातक को वृष्टि, जैसे चंद्र को प्राप्त चकोर हुई…

इतिगोविंदपुरोहितरचितं उलूपीरार्जुनसंसर्ग स्मरन्नोध्याय सम्पूर्णम ।।

(सम्पूर्ण काल्पनिक, मात्र कुछ अपुष्ट लिखित किवदंतियों के अवलंब पर परिकल्पित रचना ।)

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