क्या है एक सच्चे लीडर की पहचान?

रह रह कर मन में एक प्रश्न आता है कि इस बजट में प्रधानमंत्री ने मध्यम वर्ग की अपेक्षाओं के अनुरूप आयकर में ढील क्यों नहीं दी?

और तो और, शेयर बाजार से होने वाली एक लाख से अधिक की आय पर कैपिटल गेन टैक्स भी लगा दिया.

आखिर क्या बात है कि प्रधानमंत्री को चुनाव के एक वर्ष पूर्व ऐसे निर्णय लेने की लेने का साहस मिला (वित्त मंत्री अरुण जेटली बिना प्रधानमंत्री की अनुमति के ऐसा निर्णय नहीं ले सकते थे. अतः उन को दोष मत दीजिए).

क्या यह आत्महत्या जैसा कदम उठाना नहीं हुआ? ऊपर से तुर्रा यह कि नोटबंदी भी कर दी और जीएसटी भी लगा दिया. अपने ही समर्थको पर एक तरह से चोट कर दी.

मैं कई बार यह सोचता हूँ कि ऐसी क्या सोच थी प्रधानमंत्री मोदी जी की, जब उन्होंने यह निर्णय लिया. क्या विचार थे उनके, जब उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक का निर्णय लिया?

अब इसके जवाब में यह कहना तो बहुत आसान है कि प्रधानमंत्री जी दूरदर्शी है, देश के हित की सोचते है, सभी 125 करोड़ भारतीयों की भलाई के बारे में सोचते है.

लेकिन क्या पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश के हित में निर्णय नहीं लेते थे? क्या मुख्यमंत्री केजरीवाल और बनर्जी दूरदर्शी नहीं हैं?

इसको एक अन्य दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करते है.

सोचिये कि एक व्यस्त सड़क पर एक साँड़ उत्पात मचा रहा है. उस सड़क के निवासी आप को कहते है कि अगर आप उस साँड़ को काबू में कर लेंगे तो आपको बीस हज़ार रुपये मिलेंगे. लेकिन अगर आप उस साँड़ को ना पकड़ पाए तो आपसे दस हज़ार रुपये ले लिए जायेंगे.

तब आप क्या करेंगे?

अब आप को बीस हज़ार का लालच तो है, लेकिन आप दस हज़ार बिना किसी बात के खोना भी नहीं चाहते. ऐसे सोचने वाले आप अकेले नहीं है. हम सभी मूलतः loss averse या नुकसान से हिचकते है. यही सोच अधिकतर नेताओ की होती है.

अब सोचिये कि आप स्वयं प्रधानमंत्री मोदी है. आपको पता है कि वह साँड़ – जिसका नाम भीषण गरीबी है – आपके सामने खुल्लम-खुल्ला घूम रहा है.

अगर आप उसको कंट्रोल में करने का प्रयास करते है, तो आपका इनाम सत्तर वर्षो बाद गरीबी मुक्त देश है. अगर उस प्रयास में आप ना सफल हो पाए तो चुनाव में हार.

क्या आप उस साँड़ को एक बार – एक बार ही सही – काबू में करने का प्रयास करेगे? नहीं? आप अपनी कार का काला शीशा ऊपर करेंगे, और विदेश में नए साल की छुट्टी मनाएंगे.

यह बात अर्थशास्त्र में नोबेल प्राइज़ विजेता प्रोफेसर Daniel Kahneman ने अपनी पुस्तक “Thinking Fast And Slow” में लिखी है.

वे लिखते है कि जिंदगी में बहुत से पड़ाव ऐसे आते है कि जिसमें नुकसान का खतरा होता है और लाभ के अवसर की सम्भावना भी होती है. एक सच्चे लीडर की पहचान इसमें है कि वह उन लाभ के अवसर को पहचाने, और उन पर कार्य करे. ना कि चुनाव में हारने की संभावना के कारण निर्णय ही ना ले.

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