किनारे बैठे-बैठे कुछ नहीं होगा, कूद जाओ, नहीं मरोगे

मेरे एक मित्र हैं. जालंधर में रहते हैं. यूँ तो मुझसे आयु में बहुत छोटे हैं पर व्यवहार उनसे मित्रवत ही है.

उनके जीवन का किस्सा भी बड़ा मज़ेदार है. कुछ अजीब भी. सोचने को मजबूर कर देता है.

उनके पिता जी कभी जालंधर शहर की एक जानी मानी हस्ती हुआ करते थे. बड़े बिज़नस मैन थे. बड़ा रसूख था उनका समाज में.

उनकी एक खासियत थी. पैसे से ज़्यादा आदमी कमाने में विश्वास करते थे.

उनके सब भाई उनसे छोटे थे. सो अपने हर एक बिज़नस में एक भाई को बैठा रखा था और खुद सबका supervision करते थे.

Taxation का काम खुद देखते थे. बिज़नस के सारे फैसले खुद लेते थे. छोटे भाइयों के लिए fatherly figure थे. लंबा चौड़ा फैला हुआ व्यापार था.

फिर एक दिन अचानक ही एक silent heart attack में चल बसे… भरी जवानी में… जब उनका देहांत हुआ तो मेरे ये मित्र सिर्फ 7-8 साल के थे.

माँ homemaker थीं. संयुक्त परिवार में और संयुक्त business में कोई समस्या नहीं हुई… जो भाई जहां बैठा था वहां काबिज हो गया. माँ घर की हो के रह गयी… भतीजे का खयाल किसी को न रहा…

धीरे धीरे जब भतीजा सयाना हुआ तो किसी एक चाचा के साथ उनकी दुकान पर लग गया… पर उसकी हैसियत defined नही थी. काम करता था और जब जैसी ज़रूरत होती पैसे ले लेता.

धीरे धीरे उसकी उम्र 30 साल के आसपास हो गयी. शादी हो गयी. बच्चे हो गए. अब उसे ये अहसास होने लगा कि उसकी हैसियत दुकान और परिवार में एक कर्मचारी जैसी ही है जिसका वेतन अन्य salesmen या manager जैसा ही है.

उम्र के इस पड़ाव पर उनसे मेरा परिचय हुआ.

अब अपनी एक आदत है… कोई भी आदमी जो अपने comfort zone में आराम से बैठा हो, मैं उसे छेड़ देता हूँ… शांत पानी मे कंकड़ फेंकना मेरी आदत है…

कुछ न कुछ हलचल तो होनी ही चाहिए जीवन में… तालाब के किनारे ला कर धक्का दे देना मेरी आदत है… या तो डूब जाएगा वरना हाथ पैर मारेगा तो तैर के पार जाएगा…

मुझसे मिले तो मैंने उनके दिमाग में Seed डाला… ख़ाक डालो अपने चचा पर और अलग हो जाओ… छोड़ दो… काम तुमको आता ही है… अपना काम करो… अपने लिए काम करो… ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा? नहीं चलेगा… न चला तो इत्ती बड़ी मार्किट है, किसी की भी नौकरी कर लेना पर इस चचवा कि गुलामी मत करो…

बात तो मैंने उनके मन वाली की थी… पर उनकी हिम्मत न होती थी. हाथ पल्ले कुछ था नही. पूंजी के नाम पर बिल्कुल zero… पर पिता की साख आज तक थी…

मुझे याद है, 4-5 साल तक मैं जब भी उन्हें मिलता, तो उकसाता… छोड़ दे, लात मार साले को… कूद जा, अबे नहीं मरेगा…

उन्ही दिनों एक और लड़का मेरे जीवन मे आया. तब हम Insurance Sector में काम करते थे और हम दोनों मियाँ बीबी जाने माने trainers थे. अव्वल दर्जे के घाघ…

वो लड़का भी searching mode में… था वो भी फकीर… पर मेहनती था. और कुछ करना चाहता था. इत्तेफ़ाक़ से मेरे मित्र और ये लड़का मिल गए.

मैं लगातार motivate कर ही रहा था… फिर एक दिन खबर मिली कि मित्र ने अपने चचा को छोड़ के इस युवक के साथ मिल के अलग दुकान खोल ली है. ये 5 साल पुरानी बात है.

आज, सिर्फ 5 साल बाद, दोनो लड़के zero से शुरू करके बहुत बड़ा मुकाम हासिल कर चुके हैं. दोनो का नकोदर रोड पर designer kitchens और grill, stairs इत्यादि का शोरूम है.

इसके साथ ही वडाला चौक पर अपनी factory है जिसमे वो stainless steel की grills, gates, और अन्य बहुत कुछ बनाते हैं…

दोनों को सिर खुजाने की फुरसत नहीं है… आज दोनो बेहद सफल है और नित नई सफलता अर्जित कर रहे हैं. उन्ही की देखा देखी हमारे ही ग्रुप के एक अन्य मित्र भी इसी line में घुस गए और आज वो भी बहुत सफल हैं.

तालाब के किनारे खड़े रह के कुछ नहीं होगा.

कूद जाओ… या मेरे जैसा कोई खोज लो जो धकिया दे…

अबे कूद जाओ… नहीं मरोगे…

दो-चार बार डूबोगे उतराओगे, बहुत होगा तो दो-चार घूंट पानी गटक जाओगे… हाथ पैर मारोगे तो तैर जाओगे.

कूद जाओ…

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