जम्मू-कश्मीर में अल्पसंख्यक कौन, मुस्लिम या हिन्दू-बौद्ध?

गाँधी और नेहरू के सम्मिलित निरंतर प्रयासों से, चरखा चलाने से हमें 1947 में आज़ादी मिल गयी. लेकिन नेहरू की ज़िम्मेदारी आज़ादी दिलाने से खत्म नहीं हुई.

अभी तो नेहरू को भारत में लोकतंत्र की स्थापना करनी थी इसलिए सरदार पटेल को हटा कर उन्हें प्रधानमंत्री बनना पड़ा.

दरअसल सरदार पटेल थोड़ा निर्मम कठोर और लौह पुरुष थे. उनके मन में अल्पसंख्यकों के लिए श्रद्धा आदर सम्मान कम था.

नेहरू के मन में बहुत था. उनका तो मानना ही था कि लोकतंत्र की बुनियाद माइनॉरिटी वेलफेयर पर है. माइनॉरिटी सुरक्षित तो देश सुरक्षित.

इसीलिए जब भारत का संविधान बना तो उसमें विशेष व्यवस्था माइनॉरिटीज़ के लिए की गयी.

मुस्लिम, सिख, पारसी, जैन, बौद्ध आदि समुदाय नेशनल लेवल पर माइनॉरिटी घोषित कर दिए गए. बिना इस बात की चिंता किये कि भारत में ढेरों ऐसे प्रदेश हैं जहाँ कहीं मुस्लिम मेजॉरिटी में हैं, जैसे लक्षद्वीप, जम्मू-कश्मीर, ईसाई मेघालय, अरुणाचल, मिजोरम में मेजॉरिटी में हैं. और 6 प्रदेशों में हिन्दू माइनॉरिटी में हैं.

नैतिक रूप से किसी भी लोकतंत्र के लिए अपने माइनॉरिटीज़ की विशेष देखभाल ज़रूरी है ताकि देश, जनता का समग्र विकास हो. खासतौर पर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के क्षेत्र में

लेकिन हमारी महान कांग्रेस ट्रू सेन्स में माइनॉरिटीज़ का भला नहीं चाहती थी, वो राजनीति, वोट बैंक के लिए सिर्फ एक धर्म का भला चाहती थी.

आज तक सेक्युलर, लिबरल, कम्युनिस्ट, कांग्रेसी राजनीति ने माइनॉरिटीज़ का अर्थ मुस्लिम बना रखा है.

केंद्र हो या प्रदेश, कोई भी दल की सरकार माइनॉरिटी मिनिस्टर हमेशा मुस्लिम ही चुनती है. जैसे सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध इन्हें किसी सरकारी मदद की ज़रूरत ही न हो.

सिद्धांतः माइनॉरिटी डिफाइन करने का अधिकार एक प्रदेश को होना चाहिए था, न कि केंद्र को. ताकि एक स्टेट अपने डेमोग्राफी के आधार पर अपनी माइनॉरिटी चुन सके. उसके अनुसार उनके लिए वेलफेयर स्कीम चला सके.

अब जम्मू कश्मीर में मुस्लिम मेजॉरिटी में हैं. सरकार भी हमेशा मुस्लिम ही बनती है, जैसा पिछले चुनाव में गुलाम नबी आज़ाद ने कहा था कि मुख्यमंत्री का पद सिर्फ एक मुस्लिम को ही मिल सकता है.

जम्मू कश्मीर में धारा 370 भी है. जिसके हिसाब से केंद्र का कोई कानून राज्य में बिना विधानसभा द्वारा पारित किये लागू नहीं हो सकता है.

भारत सरकार ने 1992 में नेशनल कमीशन फॉर माइनॉरिटीज़ एक्ट पास किया. जिसे सभी प्रदेशों ने लागू किया लेकिन जम्मू कश्मीर में नहीं.

पिछले एक-डेढ़ साल से सुप्रीम कोर्ट में एक मुकदमा चल रहा है, राज्य और केंद्र सरकार के खिलाफ.

इसमें पेटिशनर ने कहा है कि जम्मू कश्मीर में मुस्लिम मेजॉरिटी में हैं. और हिन्दू, बौद्ध माइनॉरिटी में. लेकिन राज्य सरकार द्वारा चलायी गयी माइनॉरिटी वेलफेयर स्कीम का सारा लाभ मुस्लिम ले रहे हैं.

ऐसा भी प्रोविज़न होता है कि किसी प्रदेश में किसी माइनॉरिटी (मुस्लिम) पर जुल्म हो तो राज्य अल्पसंख्यक आयोग कूद कर पहुँचता है और पुलिस व राज्य सरकार पर दबाव बनाता है.

पर जम्मू कश्मीर में ऐसा नहीं होता. क्योंकि वहां अल्पसंख्यक आयोग ही नहीं है.

और पिटीशनर ने अदालत में यही मांग रखी है. सरकार स्टेट माइनॉरिटी कमीशन बनाए. मुस्लिम को नहीं बल्कि धर्म और भाषा के आधार पर अल्पसंख्यक परिभाषित हों.

जैसा कि होता आया है, सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर सरकार से उसका जवाब माँगा.

जम्मू कश्मीर सरकार ने कोर्ट से कहा कि स्टेट माइनॉरिटी कमीशन की कोई ज़रूरत नहीं. हमारे पास स्पेशल पावर्स हैं जो धारा 370 ने संविधान से दी हैं. हम माइनॉरिटी के लिए स्वयं पॉलिसी बना सकते हैं.

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रूख अपनाया. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से कहा कि वो जॉइंट कमिटी बनायें और स्टेट माइनॉरिटी कमीशन बनाये जाने पर अपना अपना रूख स्पष्ट करें.

केंद्र सरकार ने बहुत कोशिश की कि राज्य सरकार से सहमति बन सके लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

राज्य सरकार ने पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट से साफ़ कहा कि जब समय आएगा, राज्य सरकार उचित समझेगी वो माइनॉरिटी कमीशन का गठन कर देगी.

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में फिर सुनवाई है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय दूरगामी प्रभाव वाला रहेगा. चाहे किसी के भी पक्ष में आये.

सलाम अंकुर शर्मा को जो जम्मू के निवासी हैं और वकालत करते हैं. सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने ही पेटिशन दायर की है.

इस लेख पर श्रीनिवास शंकर राय जी का गलत तथ्य पर महत्वपूर्ण कमेंट –

बिल्कुल सही पेटीशन है. बस एक बात आपकी पोस्ट में है जो कहती है कि संविधान ने मुस्लिम बौद्ध जैन आदि को माइनॉरिटी का दर्जा दे दिया. ऐसा नही है – संविधान सिर्फ भाषायी और सांस्कृतिक आधार पर माइनॉरिटीज़ के लिए खास उपबंध करता है. लेकिन माइनॉरिटी घोषित होने की क्राइटेरिया क्या होगी वह संसद व सरकारों के लिए छोङ दिया था.

सरकारों व संसद ने आज तक माइनॉरिटी की परिभाषा व स्वरूप पर कोई चीज़ तय ही नही की. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दशक मे यह ज़रूर सिद्धांत निकाला है कि माइनॉरिटी का आंकलन स्टेट के स्तर पर किया जाएगा न कि नेशनल लेवल पर. परंतु आज भी तय नहीं है कि कौन किस आधार पर माइनॉरिटी माना जाएगा.

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