शौक-ए-दीदार हो तो नज़र पैदा कर : बदल रही है भारत की तस्वीर

मैं इनको बस यूं ही प्रेस्टीट्यूट नहीं कहता हूँ. मेरे पास पर्याप्त आधार है, तथ्य हैं ये सिद्ध करने के लिए कि इन्होंने चैनल नहीं कोठा खोला है.

आज सुबह से स्टोरी चला रहे हैं कि मोदी सरकार की उज्ज्वला योजना फेल हो गयी. कनेक्शन तो दे दिया मोदी ने पर रीफिल नहीं हो रहे. योजना फेल हो गयी. सिलिंडर चूल्हा सफेद हाथी बन के रह गए हैं.

ड्राइंग रूम पत्रकारिता इसी को कहते हैं. जब आपके ज़मीनी सरोकार नहीं होते तो आप ऐसी ही छिछली राजनीति और छिछली पत्रकारिता करते हैं.

मेरे गांव में LPG का चलन 94-95 के आसपास हुआ. अगल बगल कोई गैस एजेंसी नहीं थी. पर हाईवे के किनारे रहने वाले लोग अपने खाली सिलिंडर सड़क किनारे रख देते थे. ये निशानी होती कि इसे रीफिल कराना है.

LPG के सिलिंडर ढोने वाले ट्रक इसे देख रुकते और 200 या 300 रुपार ब्लैक में रीफिल कर देते. उन दिनों आम जनता के सिलिंडर में 14 kg की जगह 10 kg गैस मिलना आम बात थी. कई बार तो सिलिंडर में 4 लीटर पानी तक भर देते थे भाई लोग.

शुरुआती दौर में गांवों में सम्पन्न घरों में खाना तो चूल्हे पर बनता था पर इमरजेंसी वाले काम जैसे चाय बनाना, बच्चे का दूध गर्म करना या खाना गर्म करने जैसे काम LPG पर होते थे.

ऐसे में एक सिलिंडर 6-6 महीने चल जाता था. लकड़ी और उपलों पर खाना बनाना हमारी हज़ारों साल पुरानी परंपरा है. ये रातों रात आखिर छूट भी कैसे जाती?

पर धीरे धीरे, जैसे जैसे संपन्नता आयी और LPG की उपलब्धता सुधरी, चूल्हे का प्रयोग कमतर होता गया और LPG की खपत बढ़ती गयी. एक दौर ये भी आया कि लड़कियां अपने दहेज़ में चूल्हा सिलिंडर लाने लगीं.

सम्पन्न घरों में तो LPG आ गयी. पर एक बहुत बड़ा वर्ग पीछे छूट गया.

मोदी जी ने उसी वर्ग को छुआ है.

मुझे विद्या बालन वाली ‘डर्टी पिक्चर’ का वो डायलॉग याद आता है… ‘Touch तो बहुतों ने किया पर छुआ आज तक किसी ने नहीं…’ मोदी जी ने छुआ है…

रसोई में LPG आने का क्या मतलब है इसे NDTV का कमाल खान सोच ही नहीं सकता.

गरीब आदमी आज अगर साल में सिर्फ दो सिलिंडर रीफिल करा रहा है तो बहुत जल्दी ये 3-4 होता हुआ 6-8 भी होगा.

गरीब के घर में उज्ज्वला का LPG, शौचालय, और प्रधान मंत्री आवास योजना में दो कमरे का घर… 2022 तक हर गरीब को घर… ये एक ऐसी परियोजना है जो गेम चेंजर होगी.

मोदी गरीबों के मसीहा रॉबिनहुड बन के उभरेंगे.

मोदी ने नई राजनीति शुरू की है. जातीय राजनीति से ऊपर उठ के गरीब गुरबा की राजनीति.

भारत की तस्वीर बदल रही है.

शौक-ए-दीदार हो तो नज़र पैदा कर.

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