राफ़ेल का बाज़ीगर

मेरे मित्र हैं, ग्वालियर में वे प्रिंटिंग किंग हैं, कोई आस पास नहीं लगता. आज से 15 साल पहले 8 X 8 फीट की एक छोटी सी दुकान थी जिसमें सिर्फ एक कंप्यूटर था.

मैंने समझाया कुछ बड़ा करो. फिर एक दूसरी दुकान ली. दुकान एक बाड़े के अंदर थी और मार्किट से दूर थी. सब ने मना किया कि मत लेना.

उन्होंने मुझे दुकान दिखाते हुए पूछा, “भैया क्या कहते हैं चलेगी दुकान?”

मैंने पूछा आप बताओ आपके हिसाब से चलेगी? और पूरा ध्यान उनके चेहरे पर केंद्रित कर दिया.

वो बोले चला लूंगा, तो मैंने जवाब दिया चलेगी.

अब सब एक तरफ और मैं और मेरा आत्मविश्वास एक तरफ.

शुरू में दुकान बिल्कुल भी नहीं चली. मैंने कहा चिंता मत करो चलेगी. उसके बाद ऐसी चली कि पीछे मुड़ कर नहीं देखा. आज 80 से ज़्यादा परिवार पलते हैं.

उनकी सफलता का राज़ उनकी कड़ी मेहनत है, मैंने सिर्फ रास्ता दिखाया. हर डील मेरे हाथ से हो कर गुज़रती है. कोई बड़ा फैसला मेरे बिना नहीं होता आज भी.

सभी मशीन की डील मैंने फाइनल की है. एक मशीन के लिए 26 लाख का कोटेशन आया, दुनिया की नंबर 1 कंपनी के साथ सौदा था.

हमारी पहली इतनी बड़ी डील थी. उन्होंने मुझे बुला लिया. टेबल पर बैठे और मैंने शुरुआती बोली 9 लाख से शुरू की.

मेरे मित्र के चेहरे की हवाइयाँ उड़ गयीं. कंपनी वाले उठ कर खड़े हो गए. बोले, सर आपको मशीन लेनी नहीं है.

मैंने कहा मुझे तो लेनी है लेकिन आप बेचना नहीं चाहते, वे दोबारा बैठ गए.

सुबह 10 बजे से शुरू हुई मीटिंग रात 11 बजे बे-नतीजा खत्म हुई (ये पहली बार था जब मैं एक चैम्बर में इतनी देर तक बैठा). अगले दिन भी वही हुआ, सुबह 10:30 से रात 10 बजे तक की बैठक फिर बे-नतीजा.

कंपनी वाले खूबियां गिनाते और मैं कमियां. रोज़ रात और सुबह उठ कर पढ़ता और कमियां ढूंढता. ये साइकोलॉजिकल वॉर था.

मेरे कंधों पर ज़िम्मेदारी थी कि मैं बेस्ट डील फाइनल करूँ. दो दिन बाद मेरे मित्र की हिम्मत जवाब दे गई. बोले, भैया इस से कम नहीं करेगा आप डील फाइनल कर दो.

मैंने कहा आप चिंता ना करो डील हमारे रेट में फाइनल होगी. आप कल सुबह बैंक ड्राफ्ट बनवा लेना.

अगले दिन इधर मीटिंग चालू हुई उधर बिना किसी को बताए बैंक ड्राफ्ट तैयार हो गया. मैंने बातें करते करते परचेज़ ऑर्डर भी बना दिया.

शाम तक सर-मारी करते करते आखिर कंपनी उस रेट पर आ गयी जिसका हमने ड्राफ्ट तैयार किया था. मैंने PO साइन किया और DD पकड़ा दिया.

कंपनी वाले भौचक्के थे, बोले सर ये कैसे?

मैंने कहा तीन दिन में आप सब से बहुत कुछ सीखने को मिला शुक्रिया आपका.

उनकी सालों की ट्रेनिंग का निचोड़ उन 3 दिनों में मुझे मिला. डील इस शर्त के साथ फाइनल हुई कि ये रेट किसी को नहीं बताए जाएंगे. हमने मंजूर कर लिया.

डील फाइनल होने के बाद मैंने कंपनी वालों से पूछा क्या मैंने अब तक कि सबसे सस्ती मशीन ली है? चिंता ना करें डील फाइनल हो चुकी है मुझे बस अपना कैलिबर टेस्ट करना है.

तब उन्होंने बताया, नहीं सबसे सस्ती तो नहीं, लेकिन दूसरी सबसे सस्ती मशीन ली है आपने.

मुझे झटका लगा कि मैं अब भी पारंगत नहीं हुआ हूँ. धीरे धीरे मैंने अपने मित्र को निगोशिएट करना सिखाया और independent negotiation करने दिए.

कई बार बताता कि देखो आपने महँगा माल खरीद लिया, इसमे अभी और मार्जिन था.

अब बारी आई दूसरी और भी बड़ी मशीन की. इस बार कोटेशन 70 लाख का था. मैं डील के लिए नहीं गया और अपने मित्र को बोला आप डील फाइनल करोगे.

वो बोला, असंभव आपके बिना नहीं करूँगा.

मैंने कहा, कल मैं नहीं रहूंगा तब क्या करोगे? चलो डील क्लोज़ करो.

दो दिन में डील फाइनल हो गयी, ज़बरदस्त कम रेट्स में. अब मैं बीच में कूद पड़ा और डील 3-4 बार अलग अलग मौकों पर कैंसिल कर दी.

एक साल नाटक चलता रहा इधर हम सरकारी स्कीम्स और सब्सिडी की जुगाड़ करते रहे. मेरा मित्र भड़भड़ा गया. बोला, भैया अपन को मशीन लेनी है कि नहीं? (मेरी रज़ामंदी के बिना वो एक इंच भी नहीं बढ़ता).

मैंने कोई जवाब नहीं दिया और मुस्कुरा दिया. इसके बाद आखिरी बार डील फाइनल हुई मैंने फिर भांजी मार दी, और बीच डील में कूद पड़ा. घिस घिसा कर फाइनल हुए रेट में मैंने 3 लाख और कम करवा दिए.

मेरे मित्र को इसकी हवा तब लगी जब मैंने PO साइन किया और निकल लिया. इस बार सिर्फ 2 घंटे लगे.

इस बार भी वही कंडीशन थी कि यह रेट आप किसी को नहीं बताओगे और ना ही मेंटेनेन्स एग्रीमेंट. हम ने फिर हामी भर दी.

इस मशीन को सरकारी स्कीम में सस्ते दरों पर फाइनेंस करवाया और दबा कर सब्सिडी भी उठा ली. बाकी के लोग अब मेरे चक्कर लगाते हैं कि सर हमें भी बता दीजिये कैसे किया ये सब. मैं किसी को कुछ नहीं बताता.

बहुत सारे कॉम्पिटीटर जिन्हें यही मशीन लगाने की इच्छा है, कहते हैं भाईसाहब महंगी ले ली आपने मशीन, कितने की ली?? और मैं कहता हूँ मुझे जानकारी नहीं है.

मोदी जी ने भी कुछ ऐसा ही किया. राफ़ेल की फाइनल हुई हवाई डील में भांजी मार दी, और पैसे कम करवा दिए. किसी को भनक तक नहीं लगने दी.

हमने टाइम का इस्तेमाल सब्सिडी लेने में किया, उन्होंने राफ़ेल में राकेट लॉन्चर, मिसाइल लॉन्चर, आर्टिलरी गन फिटिंग करवाने में, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी ले डाला.

कंपनी से बेहद सस्ते में राफ़ेल फाइटर जेट खरीद लिए, अब पाकिस्तान और दूसरे देश विपक्ष के ज़रिए कीमत जानना चाहते हैं और मोदी जी मुस्कुरा देते हैं, कहते हैं मालूम नही.

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