जगजीत सिंह : नज़र आती है आपकी आवाज़

Jagjeet Singh

दौर था 70 के दशक का. हिन्दुस्तान में ग़ज़ल गायकी दम तोड़ती सी लग रही रही थी.

उस ज़माने में ग़ज़ल, हिन्दुस्तानी परंपरा में कोठों और महफिलों की विधा मानी जाती थी.

उर्दू-फ़ारसी की क्लिष्टता के कारण यह अभिजात्य वर्ग तक ही सीमित थी. यही इसके विलोप होते जाने का मुख्य कारण भी था.

बेगम अख्तर, नूरजहां, मेहदी हसन, तलत महमूद की तत्कालीन शैली भी ग़ज़ल गायकी को आम श्रोता के दिलों में ज़गह नहीं दिलवा पाई थी. इनकी शास्त्रीयता हमेशा श्रोता और इनके बीच अवरोध बन जाती थी.

बेशक बेगम अख्तर और मेहदी हसन का दर्जा ग़ज़ल गायकी में बहुत ऊँचा था, लेकिन लोक में उनकी व्याप्ति नहीं थी. रसिकों की नब्ज़ इनके हाथ से कहीं छूटती जा रही थी.

तब आये जगजीत सिंह. उन्होंने इसी नब्ज़ को पकड़ने की कोशिश की. जगजीत ने ग़ज़ल गायकी को आमजन के बीच पहुंचा दिया.

जगजीत की गायकी का लोगों को बेसब्री से इंतज़ार रहने लगा. एक एलबम आता और लोग अगले एलबम की गुहार लगाने लगते.

किसी महफिल में कोई गाने-बजाने का प्रोग्राम बनता तो लोग जगजीत सिंह की ग़ज़लों को ही गाते.

उदासी, अकेलेपन और अपनी जड़ों से कटने की तकलीफ पर इस दौर की ग़ज़लें जैसे फाहे का काम करने लगीं.

जगजीत सिंह छोटे-छोटे कमरों और नए ठिकानों में नई पहचान खोज रहे लोगों के दोस्त होते चले गए.

‘हम तो हैं परदेस मे, देस में निकला होगा चांद’ और ऐसे ढेर सारे दूसरे गीत इसलिए भी लोगों के दिलों में उतर गए कि वे उन्हें उनके छूटे हुए घरों, छतों, आंगनों, नीम के पेड़ और बगीचों तक पहुंचाते थे.

इसी तरह शहर के अकेलेपन के बीच अपनेपन की राहत या दोस्ती की चाहत या अनजानी सी मोहब्बत की ढेर सारी बारीक और कोमल अभिव्यक्तियां जगजीत की रेशमी आवाज़ में घुलती हुई एक साथ कई पीढ़ियों के अनुभव-संसार को सहलाती रहीं.

लगातार बढ़ती स्मृतिशिथिलता के दौर में जगजीत हमारी स्मृति, हमारी संवेदना बचाते रहे.

मंगलेश डबराल की कविता ‘छुपम-छुपाई’ की एक पंक्ति है – ‘आवाज़ भी एक ज़गह है, जहां छुपा जा सकता है…’

जगजीत सिंह आज हमारे बीच नहीं है. लेकिन यह पंक्ति लगातार ज़हन में बनी हुई है.

लगातार ये लगता रहा है कि जगजीत अपनी ही आवाज़ के पीछे कहीं छुप गए हैं. लेकिन उनके करोड़ों प्रशंसक अब उन्हें उनकी आवाज़ में तलाशते हैं.

वैसे जगजीत को तलाशना इतना मुश्किल भी नहीं है. इतनी पारदर्शी आवाज़ के पीछे कोई छुप सकता है भला!

जगजीत की खनकदार आवाज़ और निर्दोष बच्चे-सी उनकी हँसी, अपने छुपने के सारे निशान खुद छोड़ जाती है.

आज के दिन यानी 8 फरवरी 1941 को ही जगजीत सिंह का जन्म राजस्थान के श्रीगंगानगर में हुआ था. उनके जन्मदिन पर उस पुनीत आत्मा को नमन.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY