सैनिकों के बच्चों की याचिका, पत्थरबाज़ों के मानवाधिकार तो सैनिकों के क्यों नहीं?

नई दिल्ली. दो सैन्य अधिकारियों के बच्चों ने मानवाधिकार आयोग में जम्मू कश्मीर के शोपियां में हाल ही में सैनिकोंपर दर्ज एफआईआर और पत्थरबाजों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिए जाने को लेकर एक याचिका लगाई है.

याचिका में इन बच्चों ने आयोग से सवाल किया है कि सैनिकों द्वारा आत्मरक्षा में गोली चलाए जाने पर एफआईआर दर्ज कर ली गई लेकिन उन पत्थरबाजों पर क्यों एफआईआर दर्ज नहीं हुई जो उन पर पत्थर से हमला कर रहे थे.

इस याचिका में ये भी सवाल किया गया कि क्या आयोग की जवानों के मानवाधिकारों के प्रति उनकी कोई जिम्मेदारी या सहानुभूति नहीं है.

इन बच्चों ने आयोग से विनती की कि सेना के जवानों पर रोज पथराव से हो रहे उनके मानवाधिकारों के हनन की ओर ध्यान देते हुए उन्हें सुरक्षा दी जाए.

याचिका में अन्य देशों का उदाहरण देते हुए कहा गया कि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में पत्थरबाजी करने को लेकर कड़े कानून हैं. अमेरिका में इसके लिए जहां उम्रकैद की सजा तक हो सकती है तो वहीं, इजरायल में 20 साल, न्यूजीलैंड में 14 साल, ऑस्ट्रेलिया में 5 साल और इंग्लैण्ड में 3 से पांच साल की सजा का प्रावधान है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रिटायर्ड कर्नल और एक रिटायर्ड नायब सूबेदार के बच्चे प्रीति, काजल और प्रभव ने एनएचआरसी (राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग) के मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू को अपनी शिकायत याचिका सौंपी है.

याचिका में उन्होंने मानवाधिकार आयोग की तारीफ करते हुए लिखा कि जम्मू कश्मीर के तनाव प्रभावित क्षेत्र में भी आयोग डटकर लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा करता है.

उन्होंने आगे लिखा कि लेकिन ये स्थिति वहां तैनात सैनिकों के मामले में नजर नहीं आती. बच्चों ने सवाल किया कि जवानों पर रोज पत्थरबाजों के हमले को लेकर आखिर क्यों आंखें मूंद ली जाती हैं.

उन्होंने कहा कि, स्वतंत्रता के बाद जम्मू-कश्मीर में उत्पन्न हुई स्थिति और ‘असफल राज्य मशीनरी’ की सहायता के लिए सरकारों द्वारा निर्णय लेते हुए सुरक्षा के लिए आर्मी की तैनाती की गई.

याचिका में लिखा गया कि जम्मू-कश्मीर में राज्य की मशीनरी के कानून-व्यवस्था बनाए रख पाने में असमर्थ होने के कारण सेना की तैनाती की गई. लेकिन हैरानी की बात ये है कि जो आर्मी के जवान लगातार प्रशासन का सहयोग करते रहते हैं उन्हीं के अधिकार यहां सुरक्षित नहीं हैं.

मानवाधिकार आयोग से हस्तक्षेप की मांग करते हुए सवाल किया गया कि क्या, मानवाधिकारों पर लगातार चोट सह रहे जवानों के प्रति मानवाधिकारों के संरक्षकों की कोई जिम्मेदारी या सहानुभूति नहीं है. युवा नागरिक और देश के नागरिक साथ ही सैनिकों के बच्चे होने के नाते हमें राज्य में तैनात जवानों की स्थिति को लेकर चिंता है.

शोपियां मामले का जिक्र करते हुए याचिका में सवाल किया गया कि पत्थरबाजों से अपनी सुरक्षा के लिए बचाव में जवानों ने फायरिंग की जिसके बाद उन पर एफआईआर दर्ज कर ली गई. लेकिन हमला करने वाले पत्थरबाजों पर मामला क्यों दर्ज नहीं किया गया.

याचिका में कहा गया कि शोपियां एक अकेला ऐसा मामला नहीं है. राज्य में पहले भी ऐसी कई घटनाएं हुईं जहां आतंकियों या पत्थरबाजों से क्षेत्र को सुरक्षित करने पहुंचे जवानों पर हमला किया गया, लेकिन जवाबी कार्रवाई करने पर उल्टा उन पर ही मामला दर्ज कर लिया गया.

बच्चों ने कहा, न तो राज्य और न ही केंद्र सरकार ने उन्हें बचाने के लिए कोई कदम उठाया. एक ओर सेना को गैर-कानूनी और क्षेत्र सुरक्षा के लिए भेजा जाता है, दूसरी ओर उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी जिंदगी का बचाव करने के मानवाधिकार को भूलकर खुद पर हुए हमलों को सहते रहें.

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