स्वरोज़गार : राजघराने, सरदार और शाही खानदान

मेरा परिवार राजवैद्यों का परिवार रहा है. जब ग्वालियर आया तो दादा जी ने सबसे पहले एक बात समझाई घर से बाहर कदम नही रखना और किसी से बात नही करना.

बहुत सख्ती थी, नतीजा ये हुआ कि घर के दोनों तरफ 500 मीटर पर चौराहे हैं और मेरा एक भी दोस्त नहीं या किसी परिवार में आना जाना नहीं था.

जब थोड़ा बड़ा हुआ तो खुद से आना जाना शुरू किया सिर्फ दो परिवारों में, जिनमें एक हैं सिंधिया राज घराने के एक नामी गिरामी सरदार रहे सरदार वाकडे.

कभी उनके घर के दरवाजे पर हाथी बंधा करते थे, घर आज भी इतना बड़ा है कि 4-5 बीघा में फैला है मुख्य सड़क पर, जहां ज़मीन के रेट 15000 स्क्वायर फीट का है.

यानी अरबों की संपत्ति के मालिक हैं, सिर्फ किराये से ही लाखों की इनकम हो सकती है, लेकिन शाही खून रगों में दौड़ता है इसलिए किराये की इनकम मंजूर नहीं.

अपने बल बूते पर मेहनत कर के कमाते खाते हैं. बेहद सभ्य बेहद शालीन परिवार है.

राजघराना खत्म हुआ तो घर के एकमात्र सुपुत्र ने रेलवे में इंजीनियर की नौकरी कर ली. कई अधिकारियों ने बेवजह झुकाने की कोशिश की लेकिन वे नही झुके तो परिणाम स्वरूप एक से एक दुर्गम, दूरस्थ और खराब इलाके में पोस्टिंग पर काम किया.

उनके सुपुत्र वैभव जो मेरे भतीजे हैं कई बार मुझ से बातें करते. वैभव क्रिकेट बहुत अच्छा खेलते थे पर राजनीति ने उन्हें आगे नही बढ़ने दिया.

हाथ-पांव जोड़ कर या पैसे दे कर आगे बढ़ने वाला परिवार नहीं है वैभव का, स्वाभिमानी परिवार है, इसलिए क्रिकेट में आगे नही बढ़ पाए.

बातों बातों में एक दिन मैंने भतीजे वैभव से कहा खाने का काम डाल लो. बात जँच गयी और वैभव ने तिरुपति रिफ्रेशमेंट के नाम से प्रतिष्ठान खोल लिया. बिना किसी शर्म के अपने ही घर में जो कि मेन रोड पर है, सारा काम एक नंबर में है.

उनके पिताजी बोले, “यार सब एक नंबर में होना चाहिए. कोई आ कर उंगली उठाये मुझ से बर्दाश्त नही होगा” (ये खानदानी खून बोल रहा था, जिसे पैसे से ज़्यादा अपनी इज़्ज़त प्यारी है).

वैभव ने मैगी और पोहे से शुरुआत की. पोहा बनाना नहीं आता था तो रोज सुबह 4 बजे भाभी जी उठ कर अपने हाथों से बना कर देती थीं (राजघराने से ताल्लुक रखने वाली सरदारों की बहू की रगों में भी शाही खून दौड़ता है. सब काम खुद करतीं हैं, कोई नौकर नहीं, और घर एकदम चकाचक, ऐसे लोग मुझे बहुत पसंद हैं, सैलूट है भाभी जी को).

पोहे और मैगी से शुरू हुआ कारोबार चल निकला. अब समोसे, कचौड़ी, बेडइ, जलेबी आदि भी मिलती है. मेरे सामने सब कुछ बनता है इसलिए दावे के साथ कह सकता हूँ इस से साफ स्वछ खाने के आइटम शहर में कहीं और नही मिलेंगे.

आज तिरुपति रिफ्रेशमेंट एक जाना पहचाना स्पॉट बन गया है, गूगल मैप्स पर ढूँढ़िये तुरंत मिल जाएगा, Paytm, BHIM से ले कर हर अत्याधुनिक पेमेंट ऑप्शन अवेलेबल है, यानी डिजिटल इंडिया से कदम ताल मिला कर चल रहे हैं.

आज वैभव किसी के नौकर नही हैं, अपने मालिक खुद हैं. शान से अपने पूर्वजों की इज़्ज़त के साथ ठसके से दुकान चलाते हैं. अपने नीचे 4 लोगों को नौकरी दे रखी है, यानी अपना परिवार तो चला ही रहे हैं दूसरों को भी रोज़गार द्दे रहे है, 4 परिवार पाल रहे हैं.

यही है असली मोदी मॉडल, जो कुछ अनपढों को समझ नहीं आया. सच कहूं तो वैभव जैसी हिम्मत तो मुझ में भी नही.

यानी जो कल तक राजघराने के सरदार थे, मंत्री थे वे आज समौसे की दुकान करते हैं. जहां हाथी बंधते थे वहाँ आज समौसे कचौड़ी की कढ़ाई लगी है.

काम कोई छोटा बड़ा नहीं होता. वैभव देश की प्रगति में हाथ बटा रहे हैं. उन्होंने देश की दलाली नहीं की, नेताओं के तलवे नहीं चाटे, स्वाभिमान से समौसे बेचना मंजूर किया पर देश नहीं बेचा.

लानत है उन दलाल लोगों पर जो मेहनतकश लोगों पर उंगली उठाते हैं. आपकी मरसीडीज़ से 100 गुना बेहतर उन लोगों की साईकल है जो मेहनत कर के पैसा कमाते है, आपकी तरह 2 नंबर और देश बेच कर नही.

तो अगली बार जब आपका दोस्त महंगी गाड़ी में आए तो उससे कमाई का स्रोत ज़रूर पूछ लिजियेगा, मेरा वादा है वो आप से नज़रें नही मिला पायेगा.

वैभव ने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाये, सरकार से नौकरी की भीख नहीं मांगी, चौराहे पर खड़े हो कर अड्डेबाजी नहीं की कि मुझे नौकरी नही मिल रही, बल्कि खुद अपना रास्ता बनाया, जो कि बहुत मुश्किल है पर इज़्ज़त भरा है.

वैभव और उनके परिवार पर मुझे फक्र है, नाज़ है, अभिमान है, उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ.

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