महिला दाढ़ी-मूंछ बढ़ा ले तो क्या उससे विवाह करोगे?

पांचवां प्रश्न : क्या कारण है कि सभी संत बाल और दाढ़ी बढ़ाए रहते हैं? अगर वे लोग बाल और दाढ़ी न बढ़ाएं तो क्या संत नहीं कहाएंगे?

मरनाथ सिंह ने पूछा है. अब मुझे पता नहीं कि संत कहाएंगे कि नहीं कहाएंगे. और संतों को क्या पड़ी कि संत कहाते कि नहीं कहाते.

मगर लोगों को बड़ा नुकसान हो जाएगा. बाल-बच्चों को क्या कह कर डराओगे? बाल-बच्चों को डराने का एक ही उपाय है कि बाबाजी आ रहे हैं!

सोचो तुम, क्या बाल-बच्चों को कह कर डराओगे, अगर संत बाल और दाढ़ी न बढ़ाएं? पैंट-कोट और टाई लगा कर घूमें, तो बच्चों को कैसे डराओगे?

बच्चों को डराने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा. अब ये संत कम से कम इतने काम तो आते ही हैं, कि देख अगर गड़बड़ की तो बाबाजी को दे देंगे.

बाबाजी का मतलब समझते हो? बा बाजू! जो इधर से उस तरफ चले गए. उधर ही रहने लगे – बाबाजी.

दाढ़ी और बाल बढ़ाना कुछ अर्थ तो रखता है. मैंने तो कभी कटाए नहीं; हालांकि मैं कोई संत नहीं हूं और संत होना भी नहीं चाहता.

मैं जब विश्वविद्यालय में था तो मेरे वाइस चांसलर को मैं मिलने गया. वे बहुत आधुनिक आदमी थे. सारे विश्व का भ्रमण किया था. कैंब्रिज और ऑक्सफोर्ड में भी पढ़ाया था. कैंब्रिज से ही डी.लिट. थे. तो बिलकुल ही अत्याधुनिक थे.

उन्होंने मेरी दाढ़ी-मूंछ देखी. और मैं तो यूनिवर्सिटी में भी लुंगी पहनता था और एक बड़ा झब्बा, और खड़ाऊं कि आधा मील से लोगों को पता चल जाए कि मैं आ रहा हूं! सो लोग सावधान हो जाएं कि बाबा जी आ रहे हैं! जिनको डरना हो डर जाएं, जिनको भागना हो भाग जाएं, जिनको जो भी इंतजाम करना हो कर लें.

मैं गया था उनसे मिलने कि मुझे स्कॉलरशिप चाहिए. उन्होंने कहा कि स्कॉलरशिप तो पीछे हम बात करेंगे, पहले मैं यह पूछना चाहता हूं कि तुमने बाल और दाढ़ी क्यों बढ़ाए?

मेरे विभाग के जो अध्यक्ष थे, मेरे जो प्रोफेसर थे, मुझे बहुत प्रेम करते थे, जो मेरे साथ गए थे मेरी सिफारिश के लिए कि मुझे निश्चित ही स्कॉलरशिप मिलनी चाहिए – वे मुझे समझा कर ले गए थे कि देखो, किसी विवाद में नहीं पड़ना. रास्ते भर मुझे समझाते रहे कि देखो, मैं तुमसे फिर कहता हूं!

दरवाजे के बाहर भी उन्होंने मुझसे कहा कि देखो, मैं तुमसे फिर कहता हूं, वाद-विवाद नहीं करना. अपने को स्कॉलरशिप लेने से मतलब है. और स्कॉलरशिप तुम्हें मिल जाएगी, मैंने उनसे बात की है, वे राजी हैं, कोई अड़चन नहीं है. लेकिन तुमने अगर कोई वाद-विवाद खड़ा कर लिया तो मुश्किल खड़ी हो जाएगी. तुम जैसे मुझसे वाद-विवाद करते हो, उनसे मत करना.

मैं सुनता रहा. मैंने कहा कि जब उनसे नहीं करना है तो तुमसे भी नहीं कर रहा हूं. मैं बिलकुल चुप हूं. मगर मैं यह भी कहे देता हूं कि अगर उन्होंने कोई बहुत बुनियादी बात छेड़ दी, तो फिर भाड़ में जाए स्कॉलरशिप, मिले कि न मिले.

और उन्होंने ये ही बात छेड़ दी. उन्होंने देख कर ही मुझे कहा कि और सब तो ठीक है, दाढ़ी-मूंछ क्यों बढ़ाई हैं?

मेरे प्रोफेसर जो मेरे पास ही बैठे थे, पैर से मेरे पैर में पैर मारने लगे कि चुप. मैंने उनसे कहा कि देखिए, इसके पहले कि मैं आपसे बात करूं, मेरे प्रोफेसर को कहिए कि मेरी टांग में टांग न मारें.

मेरे प्रोफेसर तो बहुत घबड़ा गए, उनको तो पसीना छूट गया. मैंने कहा कि तुम्हें क्यों पसीना छूट रहा है? स्कॉलरशिप मेरी जा रही है, जाने दो!

और वाइस चांसलर तो बहुत हैरान हुआ कि यह मामला क्या है! उन्होंने कहा कि क्यों टांग में टांग मार रहे हैं?

मैंने कहा : ये मुझे समझाते आ रहे हैं रास्ते भर से कि अगर विवाद किया तो स्कॉलरशिप चली जाएगी. मैंने भी इनसे कह रखा है कि अगर उन्होंने कोई बुनियादी बात छेड़ी तो विवाद होकर रहेगा. आपने बुनियादी बात छेड़ दी! अब ये मेरी टांग में टांग मार रहे हैं. अब मैं स्कॉलरशिप की फिक्र करूं कि अपनी आत्मरक्षा करूं, आप बोलिए?

उन्होंने कहा कि तुम फिक्र छोड़ो, विवाद कर सकते हो. स्कॉलरशिप कहीं नहीं जाएगी.

मैंने कहा : स्कॉलरशिप का मामला पहले निपटा दीजिए, ताकि ये… नहीं तो ये मेरी टांग में टांग मारेंगे.

बात इतनी साफ थी कि उन्होंने पहले मेरी स्कॉलरशिप के फार्म पर दस्तखत किया कि यह खतम, अब बोलो.

मैंने कहा : अब मैं तुमसे यह पूछता हूं कि आपने बाल और दाढ़ी कटाए हैं या मैंने बढ़ाए हैं? ये तो अपने आप बढ़े हैं. आपने कटाए क्यों?

उन्होंने कहा : यह बात ठीक है कि कटाए तो मैंने ही हैं.

मैंने कहा कि तुम मुझसे पूछ रहे हो उलटे. उलटा चोर कोतवाल को डांटे! मैंने बढ़ाए नहीं, अब मैं क्या करूं बढ़ गए! कटाए नहीं, यह बात जरूर है, क्योंकि मैं आज तक तय ही नहीं कर पाया कि कटाऊं कैसे, भगवान बढ़ा रहा है और मैं कटाऊं! अब तुम कल हमसे यह ही कहने लगोगे कि अंगुलियां क्यों नहीं कटाईं? कि टांग क्यों नहीं कटाई? अब यह तो बड़ा मुश्किल हो जाएगा, हम क्या-क्या कटाएं! तुमने क्यों कटाए हैं?

उन्होंने कहा कि मुझे थोड़ा सोचने का समय दो.

कितना समय चाहिए? मैंने कहा : स्कॉलरशिप का मामला तो ख़त्म हो चुका है, अब यह बात चलेगी, इसको मैं छोड़ने वाला नहीं हूं. मैं रोज आ जाया करूंगा. आप सोचें रोज, मैं ठीक ग्यारह बजे आपके दफ्तर पर दस्तक दिया करूंगा. दस्तक देने की वैसे भी जरूरत नहीं है, मेरी खड़ाऊं करीब आधा मील से बजती है.

मैं रोज वहां जाने लगा. वे मुझे देखते ही से कहते कि भाई, अभी नहीं सोच पाया. चौथे दिन मुझसे बोले कि तुम मुझे सोने दोगे कि नहीं? रात भर मैं करवटें बदलता हूं, सोचता हूं कि क्या जवाब देना. कटाए तो मैंने ही हैं, यह बात तो सच है. कसूर मेरा ही है, जो कुछ भी भूल-चूक है, मेरी है. पूछा भी मैंने ही है.

मैंने उनसे पूछा कि थोड़ा सोचो तो, अगर कोई स्त्री दाढ़ी-मूंछ बढ़ा ले तो उसको तुम क्या कहोगे?

उन्होंने कहा : उसको हम पागल कहेंगे.

तो मैंने कहा: और कोई पुरुष दाढ़ी-मूंछ कटा ले, उसको तुम क्या कहोगे? स्त्री बेचारी पागल, क्योंकि दाढ़ी-मूंछ बढ़ा ली!

मैंने उनसे पूछा कि अगर स्त्री दाढ़ी-मूंछ बढ़ा ले, उससे कोई विवाह करेगा?

उन्होंने कहा कि भाई, मुश्किल है उससे कोई विवाह करे.

मैंने कहा : आप विवाह करोगे?

वे बोले : मैं तो कतई नहीं करूंगा. दाढ़ी-मूंछ वाली स्त्री से कौन विवाह करे!

तो मैंने कहा कि और जिस स्त्री ने आपसे विवाह किया है, उसे चुल्लू भर पानी में डूब कर मर जाना चाहिए. उसने दाढ़ी-मूंछ-रहित पुरुष से विवाह कर लिया! यह क्या अन्याय? यह कैसा मापदंड है? दोहरे मापदंड चल रहे हैं!

पांचवें दिन उन्होंने मुझसे कहा : मैं हाथ जोड़ता हूं. प्रश्न तो मुझे और भी पूछने थे, मतलब खड़ाऊं के संबंध में, और यह चोगा, और यह लुंगी, मगर मैं कुछ नहीं पूछता भैया. मुझे पूछना ही नहीं प्रश्न. मैं हार गया! मैं अपना प्रश्न वापस लेता हूं. और अब मैं समझा कि तुम्हारा प्रोफेसर क्यों तुम्हारे पैर में टांग मार रहा था. अरे वह मेरी टांग में टांग मारता तो ठीक था. उसे मुझे सावधान करना था, तुम्हें क्या सावधान करना!

फिर दो साल मेरे उनसे संबंध रहे, उन्होंने कभी कोई प्रश्न नहीं उठाए – इस तरह का कोई प्रश्न नहीं. चाहे वे देख भी लें कि मैं कुछ ठीक नहीं कर रहा हूं जो कि यूनिवर्सिटी के स्नातक को करना चाहिए, मगर अगर मैं ऊंट पर भी सवार होकर पहुंच जाता तो भी वे मुझसे नहीं पूछ सकते थे कि तुम ऊंट पर सवार क्यों हो? क्योंकि पता नहीं इसमें से क्या मामला निकले, फिर पीछे झंझट खड़ी हो!

तुम पूछ रहे हो अमरनाथ सिंह, कि संत बाल और दाढ़ी क्यों बढ़ाए रहते हैं?

संत बेचारे सहज स्वाभाविक लोग, जो परमात्मा करता है, करने देते हैं, बाधा नहीं डालते कि बैठे हैं उस्तरा लिए और बाधा डाल रहे हैं. परमात्मा जो करता है, उसे सहज स्वीकार करते हैं.

और यह पुरुष का लक्षण है. यह पुरुष के शरीर का हिस्सा है. यह बिलकुल नैसर्गिक है. यह तो बिलकुल पागलपन है कि दाढ़ी-मूंछ साफ़ करके बैठे हुए हो. यह शोभा नहीं देता. इससे तुम्हारे पुरुषत्व में थोड़ी सी कमी पड़ जाती है.

तुम्हारे चेहरों में और स्त्रियों के चेहरों में जितना फासला हो उतना अच्छा, जितना भेद हो उतना अच्छा, उतना आकर्षण होता है. लेकिन पीछे कारण हैं कि लोगों ने क्यों दाढ़ी-मूंछ कटानी शुरू की.

पुरुष को स्त्री का चेहरा सुंदर लगता है, सो उसने सोचा कि इसी तरह का चेहरा मैं बना लूं तो सुंदर लगेगा. यह गलत बात है.

स्त्रियों से भी तो पूछो कि तुम्हें कौन का चेहरा सुंदर लगता है! स्त्रियों को स्त्रियों के चेहरे सुंदर लगते हैं? स्त्रियों को तो हैरानी होती है यह सोच कर कि पुरुष मरे जाते हैं स्त्रियों पर, किसलिए? पुरुषों का चेहरा सुंदर लगता है.

और तुमने देखा, दाढ़ी-मूंछ के साथ पुरुष के चेहरे पर एक गरिमा आ जाती है, भराव आ जाता है, एक व्यक्तित्व आ जाता है! दाढ़ी-मूंछ से रहित पुरुष के चेहरे से कुछ खो जाता है, कुछ खालीपन हो जाता है, कुछ रिक्त हो जाता है.

अच्छी दुनिया होगी और लोग सहज स्वाभाविक जीएंगे, तो यह बिलकुल स्वाभाविक होगा कि लोग दाढ़ी-मूंछ बढ़ाएं. इसमें कुछ आध्यात्मिक रहस्य खोजने की कोशिश न करो. मगर लोग हर चीज में कुछ न कुछ आध्यात्मिक रहस्य खोजने में लगे रहते हैं.

– ओशो, रहिमन धागा प्रेम का

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