मैं अब गर्भवती रहूँगी जीवन भर

प्रेम अँधा होता होगा
लेकिन मेरा प्रेम देखना चाहता है
उस सूरत को
जो मैंने अपने हाथों से गढ़ी है
जिसे रंग दिया है आकाश का
और सूरत धरती सी

जिसकी आँखों में बहती नदी के किनारों पर
मैं बोकर आई थी कुछ सपने
जिस पर ऊग आए होंगे फूल
और प्रतीक्षा करते होंगे मेरी
कि एक दिन मैं अपने स्पर्श से
उनका होना सार्थक कर दूंगी

प्रेम बहरा भी होता होगा
लेकिन मेरा प्रेम सुनना चाहता है
वो आवाज़ जो श्रापित है मौन रहने को
मेरे कानों के उसके होठों तक पहुँचने तक

कुछ ध्वनि तरंगे
प्रतीक्षा में है मेरी
कि मैं उन्हें सुन सकूं
उसे देखते हुए…

प्रेम अपाहिज भी होता होगा…
हाँ… शायद अपाहिज ही है…
उसका एक पैर उसका अहम खा गया
दूसरा मेरा भाग्य….

इसलिए आने के सारे रास्ते बंद करके
वो निमंत्रण दिया करता है
सच्ची सूरत पर अजनबियत ओढ़कर
मुखौटे के मुंह से प्रेम पर प्रवचन दिया करता है

उसका प्रेम वास्तव में बहुत महान है…
रूहानी, आध्यात्मिक, परमात्मा के समकक्ष
मैं ही देह से बड़ी न हो सकी…
मैंने एक यात्रा देह के भीतर शुरू कर दी है
जो मेरे गर्भनाल से जोड़ती है मुझे
हाँ मैं अब गर्भवती रहूँगी जीवन भर
मेरा प्रेम मेरी देह में पलता रहेगा
लेकिन कभी जन्म नहीं लेगा तुम्हारी रूहानी दुनिया में…

– जीवन

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