आख़िरी ख़त

सुनो शोना
यह मेरा शायद आख़िरी ख़त है तुम्हारे नाम

मैंने नहीं देखा तुम्हें कभी
हाँ, तुम्हारी आधी-अधूरी तस्वीर देखी है

तुम्हारी आवाज़ सुनने के लिए बार-बार फ़ोन किए हैं तुम्हें
तुम्हारे अलफ़ाज़ पढ़े हैं
संभाल के रखे हैं

एक डायरी से दूसरी तक ट्रांसफर होते रहते हैं
मेरे साथ-साथ चलते हैं
जब भी तुम से बात करने को जी चाहे उन्हें पढ़ लेती हूँ

जब भी किसी सवाल का हल चाहिए उन्हें पढ़ लेती हूँ
जब भी ज़िंदगी की कोई बात तंग करे उन्हें पढ़ लेती हूँ

तुम में मैंने अपना मेहबूब भी देखा, मुर्शिद भी
तुम ही कहते थे न
तुम्हें किसी ख़ास मक़सद के लिए मिलवाया गया है मुझसे

यूँ तो बिना बात के कुछ भी नहीं होता
हर बात का, हर घटना का, हर कर्म का कोई महत्व होता है
हाँ, कई बार देर से पता चलता है

तुम नहीं मिलने आए
आना नहीं चाहते थे या फिर तुम्हें रोका जा रहा था
जैसे कि तुम कहते हो कदम उठते नहीं उठवाए जाते हैं
रुकते नहीं रुकवाए जाते हैं

कई बार consciousness के लेवल पे ही वो बातें करवा ली जाती हैं
जो अगर सच में ज़िदगी में हों तो शायद कोई अनहोनी हो जाए
या फिर जो होना चाहिए था वो न हो

हो सकता है तुम मिलते तो हम ख़्वाबों को हक़ीक़त के तराज़ू में तौलते
हम सब एक से ही तो हैं, डिग्री का ही फ़र्क़ होता है

पर जब किसी एक को देखते हैं अपनी आँखों में लगा के मोहब्बत की बिनाई
तो वो चश्मे बद्दूर, आलमे नूर हो जाता है, सब से अलग, सब से ख़ूबसूरत

सोचती हूँ अगर मिल जाते रांझा और हीर, शीरी और फरहाद तो कैसा होता
क्या पता, मिलते तो दिल पे कुछ खरोंचे लिए हम अलग होते
और फिर ढूँढते रहते अपनी कोई और पूरक प्रणाली

न जाने किस जन्म तक
अब मैं पूर्ण हूँ ख़ुद में
तुम्हारी भी कोई ज़रुरत नहीं
मिलने की, बात करने की, देखने की भी नहीं

होता तो सब अपने ही अंदर है
कोई धोंकनी से सांस फूंकने वाला चाहिए होता है
प्रेम तो हम खुद ही होते हैं
खुदा भी खुद

तुमने मेरी नज़रों को नज़रिया दिया
ढेर सारा रुला कर तुमने मुझे पाक साफ कर दिया
मुझे हील heal किया

प्रेम का तो एक पल ही ट्रांसफोर्मटिव होता है
तुमने मुझे सालों साल प्रेम किया
जब मैं नहीं जानती थी तब भी किया

मुझे इश्क़ कर दिया
मैं आशिक़ हो गई
इश्क़ करने के लिए तो सिर्फ आशिक़ ही चाहिए होता है
इश्क़ कहाँ मांगता है कुछ

चाहे पत्थर को हो जाओ समर्पित और खुदा को पा लो
अच्छा हुआ नहीं मिले, मिलते तो कुछ आम सी बात होती
हो सकता है कुछ ख़ास भी होती
कुछ पल के लिए जन्नत जीते
रूहानी रक्स होता
मीठी सी थाप होती
पर फिर एक चाह होती, फिर, फिर मिलने की

अधूरापन साथ चलता
देह के साथ जुड़े कर्म साथ चलते
अंत में हैं तो हम एक चेतना ही न
चेतना के मिलन ने परिपूर्ण कर दिया
ब्रह्मा सा कर दिया
शिव सा कर दिया

हाँ, तुम्हारे शब्द हैं मेरे लिए बहती हुई नर्मदा में बाणलिंगों के जैसे
अपने इश्क़ से उनका अभिषेक करती रहती हूँ मैं

मेरी यात्रा को उसकी मंज़िल दी है तुमने
मुझे मेरे खुद के अंदर पहुंचाया है
मेरा अंदर प्यार से लबालब है
वही प्यार मुझे दीखता है हर शय में
अंदर की ही तो परछाईं हैं बाहर सब

तुमने कहा था
जब जान जाओगी, समझ जाओगी सब माया है
फिर उसको रियल सा जीना
आंनद ही आनंद होगा
तो शोना, आनंद ही आनंद है

एक बार एक कविता लिखी थी
तुम्हारा शुक्रिया होने के लिए
विधि विधान का शुक्रिया तुम्हें मिलवाने के लिए
तुम मेरे फिलोसोफेर्स स्टोन ही नहीं
patience स्टोन भी हो
मुझे कुंदन भी किया
मेरे सारे दर्द भी तोड़े

लिखते-लिखते सो गई थी
तुम्हारी आवाज़ सुनी
अपने चक्षु खुले रखा करो, जान प्यारी
ऐसे कैसे हो सकता है कोई भी तुम्हारा मेरे लिए ख़त आख़िरी
तुम्हारे और मेरे बीच आख़िरी जैसी कोई चीज़ नहीं है, बावरी
लगता है अभी कुछ और सबक़ बाक़ी है
ऐसे तो न जाने दूँगा

जब सोई थी तो स्नो पड़ रही थी
आँख खुली तो सूर्य ज़ोरों से दमक रहा था
पेड़ों से बर्फ़ छन छन नीचे गिर रही थी
पेव्मेंट्स ख़ुद ब ख़ुद धुल कर साफ़ हो गईं थी
कुछ पेड़ों के शिखर यूँ जैसे हज़ारों ओस की बूँदें मुस्कुरा रही हों

मैं भी मुस्कुरा रही हूँ तब से
बहुत शैतान हो तुम
लव यू टू

तुम्हारी सोनप्रिया

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