हमारी शिक्षा व्यवस्था : आखिर कैसे बदलेगी बाबू बनने की मानसिकता

अजीत सिंह के शिक्षा के बारे में लेख पढ़ें. उदयन से संबंधित उनकी पहल को, उनकी मेहनत और उनकी सोच को मेरा नमन.

भारत में यह बहुत ही दुर्लभ है कि शिक्षा को बच्चे के आमूल चूल मानसिक विकास से जोड़कर देखा जाए.

लगभग सभी संस्थानों में बच्चों को कुछ बताओ, कुछ पीटो, और एग्ज़ाम में पास करा दो.

इसके अलावा छोटे बच्चो को हिंदी फिल्मों के उन गानों पर ठुमका लगवा दो जिनको एक सामान्य भारतीय परिवार अश्लील या भद्दा मानेगा.

छोटी मोटी प्रतियोगिताओं में कुछ इनाम जीत लिये, किसी एक परीक्षा में प्रथम, द्वितीय या तृतीय स्थान आ गया और पूरे परिवार, खानदान, मोहल्ले में उसे मेधावी मान लिया गया.

अब उस बच्चे से बहुत आशाएं हैं कि वह सीधे कलेक्टर बन जाएगा. और कुछ नहीं तो चपरासी. लेकिन कहीं ना कहीं, किसी सरकारी महकमे में किसी भी पद पर लग जाएगा.

और वह होता नहीं, क्योंकि सरकारी नौकरियां कम है. हर वर्ष रोजगार के बाजार में एक करोड़ से ज्यादा नवयुवक और नवयुवतियां आ रहे हैं.

कई बार मैं लिखना चाहता था, पर लिखा नहीं क्योंकि आज के छात्रों और उनके माता-पिता को कष्ट होगा.

लेकिन यह हकीकत है कि भारत के अधिकांश विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे छात्रों का ज्ञान और जानकारी, चाहे वे किसी भी विषय को पढ़ रहे हो, दोयम दर्जे की है.

मेरी भी यही हालत थी इलाहाबाद और जेएनयू से पढ़ने के बावजूद. इसमें उनका नहीं, बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था का दोष है.

मेरे पास अमेरिका या यूरोप में MA कर रहे छात्र इंटर्नशिप के लिए आते हैं. तर्क करने की उनकी क्षमता, विषयों का विश्लेषण करने का उनका कौशल, तथा समसामयिक विषयों पर उनकी पकड़, अच्छे-अच्छे छात्र उनका मुकाबला नहीं कर पाएंगे.

एक साधारण सी एप्लीकेशन भी भारतीय छात्रों को लिखना नहीं आता. मेरे एक सहयोगी बता रहे थे कि उन्हें भारत के एक पोस्टग्रेजुएट छात्र की एप्लीकेशन इंटर्नशिप के लिए मिली. पूरी एप्लीकेशन स्माल लेटर में लिखी गई थी. कहीं भी उन्होंने कैपिटल शब्द का प्रयोग नहीं किया था. क्या ऐसे छात्र की एप्लीकेशन कोई देखेगा?

खराब शिक्षा का असर यह हुआ कि अधिकतर लोग किसी बात को सही मानते है क्योंकि वह उनको सही ‘लगती’ है, जबकि आंकड़े, तथ्य और एविडेंस कुछ और कह रहे है.

मैंने आंकड़े दिए, एविडेंस दिए, लेकिन उसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. बात गोल-गोल घूमकर एक ही जगह अटकी रहती है, आगे बढ़ती ही नहीं.

भारतीय शिक्षा पद्धति को दो पहलुओं से देखा जाना चाहिए. पहले, तो शिक्षा का उद्देश्य. आधुनिक शिक्षा पद्धति की नीव अंग्रेज़ों ने डाली थी, भारत में जूनियर नौकरशाहों की फ़ौज तैयार करने के लिए, जिससे की अंग्रेज़ों का प्रशासन चलता रहे.

वे नहीं चाहते थे कि शिक्षा व्यवस्था किसी इनोवेशन या उद्यमों को बढ़ावा दे, क्योंकि ऐसे भारतीयों से इंग्लैंड के उद्योगों और अर्थव्यवस्था को खतरा हो सकता था, चुनौती मिल सकती थी.

आज़ादी के बाद इस शिक्षा पद्धति का दुरूपयोग भारतीय अभिजात्य वर्ग ने किया, अपने शासन को बनाये रखने के लिए, क्योकि उस समय के ज़मींदार, उद्योगपतियों को ‘कल के छोकरे’ अपना उद्योग लगा के चुनौती न दे सकें.

यही शिक्षा पद्धति अभी भी चल रही है. हम और हमारे बच्चे पढ़ें, कहीं किसी नौकरी पर लग जाएं. कुछ नया करने की, कोई नया उद्यम खड़ा करने की, कुछ बदल डालने की हमारी इच्छाशक्ति को कुचल दिया गया है.

बच्चों को प्रश्न पूछने से हतोत्साहित किया जाता है. सिर्फ रटिये, प्रतियोगी परीक्षा पास करिये और पूरी जिंदगी अपने सुपीरियर की जी-हजूरी करिये. बस…!

दूसरा पहलू माता-पिता का है. वे भी अपने बच्चों को रिस्क नहीं लेने देते, चाहते हैं कि बस कोई डिग्री हासिल करो, नौकरी पर लगो और रिटायरमेंट के बाद पेंशन.

आप पूछेंगे कि सिर्फ भारतीय छात्र यूरोप और अमेरिका में इतना नाम क्यों कमा रहे हैं?

सीधा सा जवाब है. वह उन देशों के विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करते हैं. फिर से बेसिक्स को सीखते हैं. तर्क वितर्क या inductive और deductive reasoning की क्षमता प्राप्त करते है. फिर वह अपनी मेहनत और बुद्धिमता के बल पर प्रगति करते हैं.

हम इस उहापोह से बाहर निकल सकते है इंटरनेट की बदौलत. इंटरनेट को एक जानकारी के स्रोत के रूप में इस्तेमाल करें, विश्व की टॉप यूनिवर्सिटी के कोर्स फ्री में उपलब्ध है, और उस जानकारी के द्वारा उद्यमों के बारे में सोंचे.

इसी तरफ वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने भी इशारा किया था जब उन्होंने कहा कि “एक दशक पहले की स्थिति के ठीक विपरीत अब भारत के प्रतिभाशाली युवा महज ज्यादा तनख्वाह वाली नौकरियों के पीछे नहीं भाग रहे हैं. इसके बजाय इन युवाओं ने अब जोखिम उठाना शुरू कर दिया है और वे उद्यमी बनने को तरजीह दे रहे हैं”.

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