Exam Warriors : आओ मिटाएं परीक्षा का हौआ

फ़रवरी आ गई है और हर साल की तरह थोड़े ही दिनों में इस साल भी परीक्षाओं की तारीखों का शोर होगा. इसके साथ ही अख़बारों में दिखने लगेंगे, कम नंबर आने के डर से या फिर परीक्षा खराब जाने की वजह से आत्महत्या करने वाले बच्चों की दर्दनाक कहानियां.

पसंद हों या ना हों, ये होता तो हर साल है! सवाल है कि माँ-बाप का समाज का अच्छी यूनिवर्सिटी में जाने, एक मोटी तनख्वाह वाली नौकरी की संभावनाएं बनाने का कैसा दबाव है जो अखबारी भाषा में बच्चों को ये “अंतिम विकल्प” चुनने पर मजबूर करता है? बतौर एक समाज हमने किया क्या है इस दिशा में?

कोई फांसी के फंदे पर बस इसलिए झूल जाना चाहता है क्योंकि उसे अंग्रेजी नहीं आती या फिर वो गणित में कमजोर है? हाल में ही पटना के एक इंजीनियरिंग के छात्र ने हॉस्टल की छत से सिर्फ इसलिए छलांग लगा ली क्योंकि उसे छह लाख सालाना का पैकेज मिला था. सूरत में एक छात्र ने फांसी लगा ली या इलाहाबाद में कोई ट्रेन के आगे कूद गया जैसी ख़बरें अब अजीब नहीं लगती.

परीक्षाओं का आना, छात्रों के आत्महत्या की घटनाओं के अखबार में न्यूज़ चैनल पर आने का मौसम भी हो गया है. ऐसा ही चलता रहा तो हो सकता है इसे दूसरी राष्ट्रीय आपदाओं की श्रेणी में डाला जाए, बाढ़, भूकंप जैसा ही परीक्षा भी हो!

अख़बारों के जरिये ही 2006 का सरकारी आंकड़ा भी मिल जाता है, जब 5857 छात्रों ने आत्महत्या की, अब तो दस साल में ये गिनती शायद दोगुनी भी हो गई होगी. इतने पर ये हिसाब हर रोज़ सोलह बच्चों की मौत का बनता है. जहाँ देश की आबादी करीब आधी ही युवाओं की हो, वहां इतनी बड़ी संख्या पर ध्यान कैसे नहीं गया ये भी एक आश्चर्य है. बच्चों को कैसी प्रतिस्पर्धा झेलनी पड़ती है वो आम आदमी को पता ना हो ऐसा भी नहीं. दिल्ली के ज्यादातर नामी-गिरामी कॉलेज 98% से ऊपर नंबर पर एडमिशन ले रहे हैं, ये भी एक खबर है जो हर साल सबने सुनी भी होती है.

आई.आई.टी. और आई.आई.एम. जैसे दर्जन भर के लगभग संस्थान और सभी नामचीन कॉलेज एक साथ मिला लें तो वो पचास हज़ार बच्चों का भी दाखिला नहीं ले सकते. इस से दस गुना बच्चे तो हर साल स्कूल से ही निकलते हैं. कस्बों के छोटे कॉलेज जोड़ लें तो गिनती और बढ़ जायेगी. दस साल पहले तक जहाँ बोर्ड की परीक्षा में 80-85 फीसदी पर राज्य भर के टॉप्पर होते थे, आज 90-95% बड़ी ही आम बात लगती है. 90 फीसदी लाने वाले बच्चे के माँ-बाप सकुचाते हुए बताएँगे कि फलां विषय में बच्चे ने कम मेहनत की, बस वहीँ मार खा गया. थोड़ी मेहनत की होती तो और आते जी !

इस से अपराधों को भी बढ़ावा मिलता है. केन्द्रीय बोर्ड (सी.बी.एस.सी. या आई.सी.एस.सी.) जहाँ बड़े आराम से 90% देते हैं, वहीँ राज्य के बोर्ड में 65% पार करना भी मुश्किल है. आश्चर्य नहीं कि हरियाणा से लेकर यू.पी. और बिहार तक अभिभावक खिड़कियों से लटक लटक कर छात्रों को चोरी-नक़ल करने में सहयोग करते पाए जाते हैं.

बिहार का पिछले वर्षों का टॉपर घोटाला अभी याददाश्त से गया नहीं होगा. जिस लड़की के पास लाखों की रकम देने के ना तो आर्थिक स्रोत थे ना जान-पहचान वो जेल में है. कदाचार और भ्रष्ट व्यवस्था के पोषक अभी फिर मोटा माल कमाने का मौसम आने पर मुदित हो रहे होंगे.

प्रोफेसर यशपाल की समिति की पतली दुबली सी पच्चीस-तीस पन्नों की रिपोर्ट धरी रह गई और छात्रों की आत्महत्या की घटनाएँ बढ़ती रही. हम आखिर कब ध्यान देंगे इसपर? ध्यान देने लायक है कि कम नंबर आने पर आत्महत्या करने वाली छात्राओं की गिनती लड़कों से कहीं ज्यादा है.

किस शिक्षाविद और मनोचिकित्सक ये मान लेंगे कि लड़कियों पर कम नंबर लाने पर शादी कर दिए जाने का दबाव भी रहता है. पढ़ने में अच्छी नहीं तो शादी करवा दो, जैसे शादी कोई जेल हो, सजा सुनाई गई हो. बिहार के मुख्यमंत्री जो बाल विवाह के खिलाफ अभियान चला रहे हैं उनका बाल विवाह के इस अनोखे कारण पर ध्यान गया या नहीं पता नहीं.

कम नंबर लाने वाले छात्र-छात्राओं को अक्सर प्राइवेट संस्थानों से पढ़ाई करनी पड़ती है जो कि महंगे भी है और कई बार मान्यता प्राप्त नहीं होते. अच्छे नंबर ना हुए और आर्थिक रूप से कमजोर हैं तो पढ़ाई छूट जायेगी का डर, या फिर दो-चार साल पढ़ने के बाद पता चलना कि उनकी डिग्री का नौकरी के बाजार में कोई मोल ही नहीं, ये भी बच्चों के आत्महत्या का एक बड़ा कारण होता है.

हाल के दौर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार जैसे नेता, राजनीति से इतर, सामाजिक मुद्दों पर भी चर्चा करने लगे हैं. अच्छा है कि उनके बोलने से सामाजिक सरोकार, अखबार के पहले पन्ने पर आ गए.

इसी साल (तीन फ़रवरी, 2018) को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक किताब जो कि परीक्षाओं से सम्बंधित बच्चों के तनाव पर है, आई है. उम्मीद है कि जो बच्चे आज वोट नहीं देते और नेताओं के लिए या व्यापार, समाज की दृष्टि से उतने मूल्यवान नहीं दिखते थे, उनकी बात भी अब होगी. हमारे बच्चे हमारा भविष्य हैं, उनकी चर्चा हमारी पहली चर्चा होनी भी चाहिए.

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