… तो उसे ज़रूर शिकायत होगी

100 से 150 रुपया प्रति ग्रामीण परिवार की मनरेगा मज़दूरी देकर जिन्होंने देश में तथाकथित रोज़गार पैदा किये हों… उन्हें मेहनतकश हाथों से स्वरोज़गार का पकौड़ा तलना, भीख मांगना लगना ही चाहिए.

पीएचडी हासिल करके सरकारी प्राइमरी मास्टर बन देश की जिन तमाम डिग्रियों ने अपना उच्चतम मूल्यांकन हासिल किया हों… उन्हें आज अचानक डिग्रीशुदा सरकारी नौकरी न मिलना कागज़ी सर्टिफिकेट का अपमान लगना ही चाहिए.

बी.ए.-एम.ए. से लेकर बीटेक-एमबीए की जिन प्रतिभाओं ने देश में सफाईकर्मी, चपरासी भर्ती होने को अवसर माना हो… उन्हें बेरोजगारी भत्तों की सवारी की जगह स्वावलंबी बनाने वाली मुद्रा बैंक योजनाएं, स्टार्टअप, स्टैंडअप इंडिया… की मेहनतकशी बुरी लगनी ही चाहिए.

इस सब बुरे.. नकारात्मक के बीच : आप इस देश में नौकरियों, अवसरों, आगे बढ़ने पर बात करने लगे हैं. आपको इस देश की हर असल समस्या अब बहुत बेहतर ढंग से समझ आनी शुरू हो गयी हैं. क्योंकि आज आपके बीच राष्ट्रीय आर्थिक घोटाले, जनता के आर्थिक संसाधनों की लूट… बहस और चिंता की लिस्ट से गायब है.

अब आप महज पकौड़ों पर खुश और संतुष्ट नहीं हो पा रहे. आपके हौसले उड़ान पर हैं, आप आगे और आगे बढ़ने को तैयार हैं.

आप में बदलाव है और यह बदलाव देख वो जो आपका भारत गांवों में बसता था न!.. वही जिसके बारे में आप बचपन से लिखते आये कि भारत एक कृषि प्रधान देश है : वह उज्ज्वला, हर गांव बिजली, मुद्रा योजना, जनधन, स्वास्थ बीमा, हर घर शौचालय, फसल बीमा जैसी बहुत सी बातों की आहट से खुश और संतुष्ट है.

हां… उसकी आंखें तनिक नम जरूर हो जाया करती हैं : जब आप किसी मेहनतकश को भिखारी कह कर सर्वहारा का मजाक उड़ाते हैं. जब आप उस गांव जिसमें आपके ही मुताबिक… आपका भारत बसता है, के हिस्से खुशहाली जाने पर खुद के लुट जाने का उलाहना देते हैं.

उसे आपके सूट-बूट-टाई के आगे बढ़ते रहने पर कोई शिक़वा नहीं : लेकिन अगर आप उसके लिए मज़बूती से कदम बढ़ाने वाले की राह के कांटे बनते नजर आए… तो उसे ज़रूर शिकायत होगी.

इसलिए याद रखिये.. जो आपने पीढ़ी दर पीढ़ी याद किया है : आपका देश चौक-चौराहों-गांवों में बसता है.

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