क्या होनी चाहिए भारत की टैक्स पॉलिसी?

क्योंकि मैं स्वयं अर्थशास्त्र का छात्र नहीं रहा हूं और रूचि के कारण इस विषय को जिंदगी में बहुत देर में पढ़ना शुरू किया. अतः इसे सरल शब्दों में समझाने का प्रयास करूंगा.

कर नीति – किसी भी तरह से आप देख लें – एक त्रुटिपूर्ण कार्रवाई है. कोई भी नागरिक स्वेच्छा से टैक्स नहीं देना चाहता.

इस स्थिति में कोई भी सरकार कैसे एक ऐसी कर नीति बनाएं जिससे नागरिकों से टैक्स ले सकें, सरकार का काम चला सके, अपने कर्तव्यों का वहन कर सके, आर्थिक प्रगति को बढ़ा सकें, साथ में ही असमानता को घटा सकें.

सरकार दो तरीके से कर जुटाती है.

प्रत्यक्ष यानी कि इनकम टैक्स और प्रॉपर्टी टैक्स, और अप्रत्यक्ष जैसे एक्साइज़, जीएसटी, वैट इत्यादि.

अगर आय पर कर लगता है तो केवल वही व्यक्ति कर देंगे जिनकी इनकम एक स्तर से ऊपर हो रही हो. अतः गरीब मज़दूर, मोची, धोबी, रिक्शेवाले, ठेलेवाले इत्यादि को आयकर नहीं देना पड़ता.

लेकिन जब आप सरसों का तेल, माचिस, चाय की पत्ती, चीनी, पेट्रोल इत्यादि खरीदते हैं तो उस पर GST या अन्य कर लगता है जो अप्रत्यक्ष है.

करोड़पति भी उतना ही अप्रत्यक्ष कर देगा जितना एक रिक्शा चलाने वाला या एक मज़दूर जो आपके घर के बाहर बैठकर गिट्टी तोड़ रही हो, या फिर मुसहर समाज के लोग, जो गरीबी रेखा के नीचे अभिशप्त जीवन व्यतीत कर रहे हैं.

यह एक कठिन प्रश्न है कि कौन सा टैक्स और टैक्स की दर करदाता को स्वीकार होगी?

कैसे उस टैक्स की दर से सरकार अपने राजस्व की आवश्यकता तथा आर्थिक उन्नति के लक्ष्य को पूरा करेगी?

कैसे और कौन से ऐसे टैक्स और टैक्स के स्तर हैं जो विकास को प्रभावित कर सकते हैं?

क्या कोई ऐसी सही टैक्स पॉलिसी है जो विकास की समस्या को सुलझा सके, निकट भविष्य की परिस्थितियों को सुलझाए, साथ ही दीर्घकालिक समय पर भी कारगर साबित हो?

क्या सर पर ईंट उठा के हमारा घर, मेट्रो, सड़क बनाने वाली महिला को चीनी खरीदते समय वही GST देना चाहिए जो एक छोटा दुकानदार, बढ़ई, फैक्ट्री में कपड़ा सिलने वाली महिला, किसी कॉल सेंटर में 6 से 8 हजार कमाने वाली छात्रा को देना चाहिए?

या फिर हमारे सांसद, विधायक, करोड़पति, मॉल में बैठे दुकानदार, मारुति की सबसे छोटी या सबसे बड़ी कार में चलने वाला व्यक्ति या उससे जीवनयापन करने वाला ड्राइवर, या स्कूटर, मोटरसाइकिल चलाने वाले नवयुवक और नवयुवतियां – क्या उन्हें भी वही टैक्स देना चाहिए?

क्या इसका कोई आसान उपाय है?

सातवें पे कमीशन और वन रैंक वन रैंक वन पेंशन की योजना लागू करने के बाद भी सरकार ने अपनी वित्तीय व्यवस्था को मजबूत किया है.

उपग्रह से मिला डेटा इंगित करता है कि बेंगलुरु और जयपुर संभावित संपत्ति करों का केवल 5% से 20% के बीच जमा करते हैं.

जिनके पास संपत्ति है, क्या उनसे संपत्ति कर नहीं वसूलना चाहिए?

क्या फुटपाथ और निर्माण स्थल पर सोने वाले बिना छत वाली महिलाओं, पुरुषो और किशोरों का ही दायित्व है जब भी वे तेल, चीनी, नमक, चाय की पत्ती. दवा खरीदे तो टैक्स दे, जबकि आप – चाहे आपका पक्का घर 500 फुट का हो या 500 या 5000 गज का, बिना संपत्ति कर दिए बच जाए?

शेयरों की बिक्री से होने वाले एक लाख रुपये से अधिक लंबी अवधि के पूंजीगत लाभ पर 10 प्रतिशत कर पर होने वाले शोर को देखकर ऐसा लगता है कि मेरे सभी मित्रों ने शेयर मार्केट में इतना अधिक निवेश किया हुआ है कि उन शेयरों को बेचने पर एक लाख रुपये से अधिक का लाभ होगा. इसका मतलब यह है कि अधिकतर लोगों के पास दस लाख रुपए से अधिक के शेयर हैं. तो फिर वह गरीब कहां हुए.

फिर सोचिए, अगर आप शेयर पर एक लाख कमा रहे हैं, तो जो अरबपति हैं और जिन्होंने 10 करोड़ का निवेश किया हुआ है वह एक करोड़ कमा रहे हैं.

इसी को कहते हैं पैसे से पैसा खींचना. क्या सरकार को इस कमाई पर टैक्स नहीं लेना चाहिए? अगर आप ऐसे पैसों पर टैक्स नहीं लेंगे तो अमीर और अमीर होता जाएगा, गरीब और गरीब.

पेट्रोलियम उत्पादों पर ही इतना टैक्स क्यों? क्योंकि लगभग 90% पेट्रोलियम उत्पाद भारत विदेशों से आयात करता है. क्या हमें इस आयात पर कंट्रोल नहीं रखना चाहिए?

क्या आपने कभी सोचा है कि किन देशों से तेल आयात होता है? क्या रही है उन देशों की नीतियां हमारे देश की शांति और सुरक्षा की तरफ? क्या आप चाहेंगे कि आपका अधिक से अधिक पैसा उन देशों की तरफ जाए?

क्या सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों का प्रयोग कम करने की दिशा में प्रयास नहीं करना चाहिए? क्लाइमेट चेंज एग्रीमेंट के द्वारा क्या सरकार ग्रीन हाउस गैस को कम करने के लिए प्रतिबद्ध नहीं है? कैसे ग्रीन हाउस गैस का उत्पाद कम होगा जब हम ज़मीन के नीचे मिलने वाले ईंधन का इस्तेमाल करेंगे?

क्या यह लक्ष्य सरकार की नीतियों का हिस्सा नहीं होना चाहिए और अगर हो तो कैसे उन लक्ष्यों को पूरा किया जाए?

चलिए आपका तर्क माना कि टैक्स कम कर देना चाहिए. फिर आप ही बतलाइए अपने राजस्व को मेंटेन करने के लिए सरकार किन और उत्पादों पर टैक्स लगाएं और बढ़ाये?

सरकार को तब तक अप्रत्यक्ष करों का सहारा लेना पड़ेगा, जब तक देश की जनता आय कर को ईमानदारी से भरना ना शुरू कर दे.

प्रत्यक्ष करों के द्वारा ही सरकार यह सुनिश्चित कर सकती है कि धन का ट्रांसफर अमीर लोगों से गरीब लोगों की तरफ किया जा सके और समाज में असमानता कम की जा सके.

अंत में, पिछले वर्ष के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में हर 100 मतदाताओं में से केवल 7 करदाता हैं, जबकि नॉर्वे में 100 मतदाताओं में से 100 के 100 करदाता हैं.

भारत में कुल राष्ट्रीय आय का केवल 15.5 फीसदी ही टैक्स अधिकारियों को रिपोर्ट होती है. यूरोप में कुल करों का लगभग 70 प्रतिशत भाग प्रत्यक्ष कर का है.

हमारे देश में राजनीतिक लोकतंत्र तो है, लेकिन वित्तीय लोकतंत्र किस मुकाम पर है?

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