सेनिटरी पैड्स पर बढ़े टैक्स पर बहस और समाधान

सेनिटरी पैड्स पर बढ़े हुए टैक्स को लेकर एक ओर बहस चल रही है, दूसरी ओर अक्षय कुमार ‘पैडमेन’ लेकर आ रहे हैं. यहां एक तमिळ पुरुष को याद करना प्रासंगिक होगा, जिसने अपनी पत्नी के लिए कई वर्ष जतन करके पैड बनाया और लोक-लाज से डरकर पत्नी उनको छोड़ गई. समाज ने निकाला दे दिया.

बहस का मुख्य आधार है (एक स्टडी के मुताबिक) अभी भी भारतीय आबादी की 70 प्रतिशत महिलाएं पैड (हाइजिन पीरीयड्स) सुविधा से दूर हैं, और कपड़े पर आश्रित हैं. मेरी परेशानी इसी कथन से शुरू होती है कि पैड का मतलब ही क्या हाइजिन है! और कपड़े का मतलब सिर्फ अनहाइजिन?

इस बात में कोई संदेह नहीं कि पैड के मुकाबले कपड़ा कहीं अधिक असुविधाजनक होता है क्योंकि उसे धोना पड़ता है और माहवारी/पीरीयड्स को जाने किस बीमारी से ग्रस्त होकर हमने अशुभ/गंदा मान लिया है. अपने हाथों से गंदा कपड़ा धोना और उसको अगली बार फिर से प्रयोग में लेना ………. सुनकर शायद कइयों को उबकाई आ जाए.

हाईजिन फंडा बहुत आसान है. कोई भी कपड़ा या चीज आपके आंतरिक अंगों से होने वाले स्राव के संपर्क में है तो कुछ समय बाद उसमें जैविक गतिविधियां शुरू हो जाएंगी, जिससे बीमारी फैलने का खतरा है. चूंकि माहवारी में इस्तेमाल किया गया कपड़ा लंबे समय तक शरीर से चिपका रहता है और बाहरी संपर्क में भी रहता है, तो वह अनहाइजिन हो जाता है. उसे अगर ठीक से न धोया जाए और धूप में न सुखाया जाए तो भी वह अनहाइजिन हो जाएगा. तो क्या पैड हाईजिन है?

पहली बार प्रयोग के लिए पैड बिल्कुल हाइजिन है. पर कुछ घंटों के बाद वही स्थिति पैड के साथ भी हो जाएगी. उसे भी लंबे समय से शरीर से चिपकाए रखेंगे तो वह भी अनहाइजिन हो जाएगी. फर्क सिर्फ इतना है कि पैड थोड़ा सुविधाजनक है और उस सुविधा को भोगने के लिए हमे जेब से पैसा खर्च करना पड़ता है और उसे वर्तमान में टैक्स बढ़ाकर थोड़ा सा और महंगा कर दिया गया है.

बात यहीं खत्म नहीं होती, और होनी भी नहीं चाहिए.

क्या आपको मुंबई में आई महानगरीय बाढ़ याद है? उस बाढ़ का बहुत बड़ा कारण ये सेनिटरी पैड्स थे. आज भी महानगरों की नालियों के जाम होने का कारण प्लास्टिक ही है, और उस प्लास्टिक में बहुत बड़ा हिस्सा इन सेनिटरी पैड्स का है.

आज लगभग हर महानगर, नगर और कस्बों में मध्यमवर्गीय और उच्च वर्गीय महिलाएं पैड्स का इस्तेमाल कर रही हैं. आप थोड़ा सा अंदाज लगाइए, औसतन एक घर में दो महिलाएं (मां-बेटी) भी हैं तो उनके घर से एक माह में निकलने वाले पैड्स की संख्या 20 होगी (पैड्स कंपनियां दिन में दो पैड्स इस्तेमाल करने की सलाह देती हैं और यह माहवारी का क्रम पांच दिन औसतन चलता है.) प्रत्येक घर से प्रतिमाह 20 पैड्स तो शहर/नगर/महानगर से कितने एक माह में निकलेंगे? थोड़ा गणित लगाइए……

समस्या अभी प्रथम पड़ाव में ही पहुंची हैं. पैड्स की ऊंची दर ही पहली समस्या नहीं है, बल्कि उसका निस्तारण है. आप सभी जानते हैं कि हम भारतीयों में इतनी अक्ल / संसाधन / सुविधा अभी तक नहीं आई है कि प्लास्टिक कचरा हम जैविक कचरे से अलग रखें और अगर आधुनिक और पर्यावरण प्रेमी बनकर रख भी दिया तो उसका निस्तारण किस प्रकार हो रहा है, की सुध ले सके.

अधिकांश नगरों, कस्बों में ये साधारण कचरे के साथ फेंके जाते हैं, माने की बीमारियों को खुला न्यौता. कस्बों और गांवों में इनको नालियों, जलस्रोतों और बंद कुओं में फेंका जा रहा है. प्लास्टिक का यह सर्वसुलभ साधन पर्यावरण के लिए कितना खतरनाक होगा, समय ही बताएगा. खैर,

कपड़े की बात करते हैं. भारतीय मौसम और ऋतुएं ऐसी हैं कि यहां सूती वस्त्र का चलन सर्वाधिक है. उन्हीं पुराने सूती कपड़ों का प्रयोग माहवारी के समय महिलाएं करती हैं. ये कपड़े भी उतने ही हाइजिन हो सकते हैं, जितना की नया पैड, अगर उनको सही से धोया जाए और धूप में सुखाया जाए.

भारत में ऐसी कोई जगह नहीं जहां कड़ी धूप नहीं पड़ती हो. उसे आसानी से जीवाणु रहित किया जा सकता है. उसे साफ धोना सिखाना हमारी प्राथमिकता हो तो एक बड़े नुकसान से भी बचा जा सकता है.

तो कम से कम मुझे इतना ही लगता है कि हमें वर्तमान में पैड्स को इतना प्रचारित करने और हाईजिन से उसे जोड़ने की उतनी आवश्यकता नहीं, जितनी कि इस बात की है कि हम हमारी बच्चियों को माहवारी से शर्मिंदा होना रोकना सिखाएं.

हम उनको माहवारी के बारे में खुलकर जानकारी दें. हम उन्हें माहवारी के समय पैड्स या कपड़े का सही इस्तेमाल सिखाएं और पैड्स का पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्परिणामों के बारे में भी जागरूक करें. अशिक्षित / कम शिक्षित ग्रामीण महिलाओं को कपड़ा इस्तेमाल के बारे में सजग करने की बहुत जरूरत है.

(यहां एक बात अंडरलाइन करना चाहूंगी, पैड्स या कप जैसी जो भी आधुनिक सुविधाएं हैं, अपने साथ गंभीर शारीरिक परेशानियां लेकर आ सकती हैं, जिनके बारे में ये कंपनियां खुलकर नहीं बताती. एक वाट्सएप मैसेज बहुत प्रचारित हुआ था जिसमें प्लास्टिक पैड्स से यूट्रस कैंसर का खतरा बताया गया था.)

हर माह की माहवारी, महिलाओं के लिए कम विकल्प और जागरूकता के अभाव में हो सकता है कि पैड कंपनियां ठगी ही कर रही हों, पर इन सबको टालने का सही उपाय है जागरूकता एवं जानकारी क्योंकि माहवारी रोकी नहीं जा सकती. मैं स्वागत करती हूं कुछ स्वयं सेवी संगठनों का, जो लोगों को जागरूक करने का काम कर रहे हैं.

हमें स्वागत करना चाहिए कुछ नवाचारों का, जहां लोग केले के पत्तों से इको फ्रेंडली पैड्स बना रहे हैं. कपड़े के फिर से प्रयोग में ले सकने वाले पैड्स बना रहे हैं. लंबी दौड़ में ये न केवल किफायती होंगे, बल्कि पर्यावरण के हितकारी भी होंगे.

– अर्पिता शर्मा

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