मैं संन्यासन हो गयी हूँ…

भूल गए हो, चलो, भूल जाओ!
यूँ तो कोई भी भूल सकता है,
तुमने ऐसा कोई असंभव कारनामा नहीं किया
अब लौट कर मत देखना मेरी ओर! मेरे खालीपन की ओर!

मैं भले जैसी भी हूँ, चाहे जैसे भी रहूँ, यह मेरी ज़िन्दगी है!
तुम मेरी ज़िन्दगी पर किसी दिन भी, तरस खाती निगाह मत डालना!

भूल गए हो, चलो, भूल जाओ!
बदले में, अगर मैं तुम्हें न भूलूं, भूल न सकूँ,
यह मेरा निजी मामला है, तुस इस मामले से छेड़छाड़ मत करना

आखिर ये मेरी ज़िन्दगी है!
मैं किसके लिए बहाती हूँ आंसू, किसे गुपचुप प्यार करती हूँ,
यह जानने की कोशिश हरगिज़ मत करना.

भूल जाने के बाद, यही तो होता है, छोड़ जाने के बाद
ऐसा ही तो होता है….
अपनी-अपनी ज़िन्दगी में,अपने-अपने निजी मामले भी,
नितांत निजी हो उठते हैं…

तुम यह हकीक़त बखूबी जानते हो
जानकार भी यह रट लगाये हो,
कि कभी-कभार मैं अपनी खैरियत का हाल-समाचार तुम्हें देती रहूँ

मैं किस हाल में हूँ, इस से तुम्हें क्या फर्क पड़ता है?
फ़र्ज़ करो अगर खबर दे दूँ, मैं खैरियत से नहीं हूँ,
अगर संदेसा भेजूं, तुम्हें देखने का बड़ा मन है,
अगर कहूँ, तुम्हें देखे बिना दिल उदास है,
तन-बदन बेचैन है,
तो तुम भागते हुए, मुझे प्यार करने तो नहीं आओगे न?

फिर हाल-समाचार देने से फायदा?
क्या फायदा यह बताने से कि आखिरकार,
मैं संयासन हो गयी हूँ…!

– तसलीमा नसरीन

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