महाशिवरात्रि विशेष : किसी के विश्वास पर सवाल उठाईए, गाली मत दीजिए

हम भारतवंशी बहुदेव उपासक तो अवश्य हैं किंतु बहुदेववादी नहीं. जहां भी शुचिता, स्वच्छता, आभा, प्रभा, पवित्रता, दिव्यता है वहीं हमारा देव है. पर शंकर देव नहीं देवाधिदेव महादेव हैं. भारत के मन, प्राण आत्मा में शिव का सनातन बसेरा है.

और आश्चर्य कि भारत के ही कुछ विद्वान शिव के ईश्वरत्व को आयातित विचारधारा बताते हैं. कुछ तो उनको देवता भी नहीं बल्कि एलिअन परग्रही जीव मानते हैं. अंतर्जाल पर इस संबंध में ढेरों लिंक्स और वीडियो मौजूद हैं. एक अंग्रेजीदां भारतवंशी आई आई एम से पढ़ेले ने तो ईश्वर अविनाशी शिव के मानवीकरण से संबंधित पूरी तरह से फैंटेसी उपन्यासत्रयी तक लिख मारी है. बाकी रामशरण शर्मा, रोमिला थापर के तो क्या कहने.

अतएव आज फिर शिव की ही बात करते हैं. आप मार्क्सवादियों के ही बड़े प्रख्यात चिंतक डा. रामविलास शर्मा अपनी पुस्तक “भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश” पेज सं 679 में लिखते हैं कि शैव, वैष्णव और बौद्ध सभी मतों का उद्गमस्थल भारत ही है.

शिव निगूढ़तम् रहस्य हैं. महाभारत के भीष्म पर्व में एक प्रसंग है- साक्षात धर्मावतार ज्येष्ठ पाण्डुपुत्र महाराज युधिष्ठिर शरशैय्या पर पड़े उत्तरायण के सूर्य की बाट जोहते वयोवृद्ध कुरुवंशी, नवम वसु के अवतार, परशुराम तक को युद्ध में संतुष्ट करने वाले गंगापुत्र भीष्म के समक्ष एक जिज्ञासा लेकर उपस्थित होते हैं.

युधिष्ठिर कहते हैं कि पितामह इससे पहले कि सूर्य मकर राशि में आए मैं चाहता हूं कि आप शिव तत्व की व्याख्या करें. पितामह हंसते हुए कहते हैं ” समुद्रपर्यंत पृथ्वी पर मेरे ज्ञात इतिहास से लेकर अब तक कृष्ण के अतिरिक्त किसी और में यह सामर्थ्य नहीं कि वह शिव तत्व का परिचय भी दे सके.”

ध्यातव्य रहे कि भीष्म जब यह बात कर रहे थे उस समय पृथ्वी पर कृष्णद्वैपायन व्यास, परमशिव भक्त परशुराम और बाणासुर, किरातवेश में शिव से युद्ध करने वाला नर स्वरूप अर्जुन जीवित थे.

पितामह फिर अर्जुन की तरफ दृष्टि करके कहने लगे “वास्तव में वे ही ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र के भी सर्जक हैं, रूद्र की भक्ति के कारण ही श्रीकृष्ण ने जगत को व्याप्त किया है जिससे इनकी अध्यक्षता में प्रकृति जगत का संचालन करती है”

सत्य आराध्य तो है किंतु वह शिव के साथ संयुक्त होकर ही सुन्दर बन पाता है.. शिवत्व सत्य के प्रिय सुन्दर बन जाने की क्रियाविधि है.

ब्रह्मांड की जो टोटल एटर्नल इंटर्नल एनर्जी है या रैंडमनैस या एंट्रापी है ..आप ग्रे मैटर भी कह लीजिए वही शिव है जिसका सिंबोलिक मैनिफैस्टेशन शिवलिंगम् है. यह भौतिकी है आई आई टी वाले क्यूट बाबू. परंतु यह ऊर्जा दुष्प्राप्य है.

कालिदास के कुमार संभव में तपश्चर्यारत् पार्वती को एक पंडित जी खूब भड़काते हैं कि कहाँ तुम कोमलांगी सुकुमारी रूपगर्विता और कहाँ वह औघड़ संन्यासी? कहाँ चुनरिया और कहां बाघम्बर?

गौरी ने उत्तर दिया “विश्वकूर्तैखाधार्त्रते वपु”
और ऐसे बहुरूपिया शंकर जब पार्वती के समक्ष प्रकट होते हैं तो कहते हैं “त्वस्मि दासः – दास हूं तुम्हारा”.

शिव सोमप्रिय हैं, ऋगवैदिक ऋषियों का दुलारा वनस्पतियों का राजा सोम (“सोमं पिब सोमं, सोमं पिबतु वृत्रहा”), सोम=चंद्रमा- चंद्रशेखर, सोमपा सोमेश्वर.

आगम तंत्रों में पार्वती प्रश्नाकुल जिज्ञासु हैं तो शिव समाधानकर्ता. विज्ञानभैरव तंत्र को देखिए-ब्रह्मांड की स्थिति और संवेग ध्वन्यात्मक हैं= “नादाधीनां जगत्सर्वं=सकलब्रह्मांडशब्दमयी. शिव जो ध्वनि है उससे शक्ति ईकार हटा लीजिए शिव शव हो जाएगा.

शिव में ‘शि’ की जो ध्वनि है वह ऊर्जा है. मजेदार बात कि अंग्रेजी में भी स्त्री के लिए ‘शी(she)’ का उच्चारण है. ऊर्जा अतिरेक न हो इसलिए शि के साथ व है, व अर्थात वाम माने कि दिशा और प्रवीणता.

ओशो विवादास्पद हो सकते हैं लेकिन उनकी बातें गहरी हैं देखिए-

“शिव नहीं बताते कि मैं कौन हूँ, वे एक विधि भर बताते हैं. वे कहते हैं : यह करो और तुम जान जाओगे. तंत्र के लिए करना ही जानना है. तुम एक प्रश्न पूछते हो और दर्शन एक उत्तर दे देता है, उससे तुम चाहे संतुष्ट.”

तंत्र के सभी ग्रंथ शिव और देवी के बीच संवाद हैं. देवी पूछती हैं और शिव जवाब देते हैं. सभी तंत्र-ग्रंथ ऐसे ही शुरू होते हैं. क्यों? यह ढंग क्यों? यह बहुत अर्थपूर्ण है. यह संवाद किन्हीं गुरु और शिष्य के मध्य नहीं घटित हुए बल्कि प्रेमालापरत् दो अद्भुत प्रेमियों के बीच हुए.

शिव के ये वचन अति संक्षिप्त हैं, सूत्र रूप में हैं. लेकिन, शिव का प्रत्येक सूत्र एक वेद की, एक बाइबिल की, एक कुरान की हैसियत का है.

विज्ञान भैरव तंत्र, 5 हजार वर्ष पुराना है. उसमें कुछ भी नहीं जोड़ा जा सकता, कुछ जोड़ने की गुंजाइश ही नहीं है. यह सर्वांगीण है, संपूर्ण है, अंतिम है. यह सबसे प्राचीन है और साथ ही सबसे आधुनिक, सबसे नवीन.

दूसरी बात कि जब तुम किसी चीज को नहीं समझते हो, तुम उसे गाली देने लगते हो. यह इसलिए कि यह तुम्हें अपमानजनक लगता है. तुम सोचते हो, मैं और नहीं समझूँ, यह असंभव है. तीसरी बात कि तंत्र द्वैत के पार जाता है.

किसी के विश्वास पर सवाल उठाईए, गाली मत दीजिए.
ॐ अघोरेभ्योSथ घोरेभ्यो घोर घोर तरेभ्य: सर्वेभ्य : सर्व सर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्य :

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