आपके लक्ष्य की प्राप्ति आपको विद्या से ही होगी, आपको विवेकशील और विनम्र वही बनाएगी!

ma jivan shaifaly jyotirmay books making india

इशावास्योपनिषद का एक श्लोकांश है ‘विद्ययामृतमश्नुते’. संयोग से, इस वाक्यांश को अपने ध्येय वाक्य के रूप में स्वीकारने वाले काशी हिन्दू विश्वाविद्यालय की संस्थापना 4 फरवरी के दिन हुई थी.

हममें से अधिकतर लोग ये जानते हैं कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना बसंत-पंचमी के दिन हुई थी. मगर कम लोगों को ही ये ज्ञात होगा कि वर्ष 1916 में 4 फरवरी की तारीख को, अर्थात जिस दिन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय कि संस्थापना हुई थी, उस दिन बसंत-पंचमी नहीं थी.

मालवीय जी अपना हर शुभ कार्य बसंत-पंचमी से ही शुरू करते थे. विश्वविद्यालय के संस्थापना के लिए भी उन्होंने यही दिन चुना था. उस वर्ष बसंत-पंचमी 8 फरवरी को थी. मगर तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने 4 फरवरी का ही समय दिया था, वो अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में थे और व्यस्तता के कारण बसंत-पंचमी के दिन आने में अक्षम थे.

धुन के पक्के महामना मालवीय ने तब समारोह को एक हफ्ते तक चलाने का फैसला किया और इस प्रकार 8 फरवरी का दिन भी समारोह का हिस्सा बन गया. कहा जाता है कि उस दौर में भी समारोह इतना वृहद था कि तमाम संसाधनों के बाद भी शताब्दी वर्ष समारोह के तमाम धूमधाम उसके समक्ष बौने थें. मालवीय जी भारत के उत्सवधर्मिता को मानने वालों में थे.

‘विद्ययामृतमश्नुते’ का अर्थ है कि विद्या से अमरत्व की प्राप्ति होती है. अमरत्व स्थूल रूप में शायद ही संभव है. इस स्वरूप में अमरत्व का सच्चा अर्थ आत्मा के परमात्मा से मिलन से है. कई अर्थों में इसे मोक्ष के रूप में भी प्रयोग किया जाता है.

जन्म-मरण के इस बंधन से मुक्त हो अमर हो जाना ही मोक्ष है. इस प्रकार मोक्ष का आशय उस परम-तत्व के प्राप्ति से भी है जो परम-ज्ञान के माध्यम से सिद्ध किया जा सकता है. उस परम ज्ञान का साधन ही विद्या है. विद्या हमें उस शुद्ध चैतन्य से मिला देती है जिसकी हम कल्पना मात्र ही कर सकते हैं.

अक्सर भारतीय विद्याओं को पोंगापंथी कहकर नकार दिया जाता है, जबकि उनके मूल को समझने की कोशिश हम नहीं करते. उपनिषदों को वेदांत भी कहा गया है. ये भारतीय ज्ञान परंपरा की वो पद्धति हैं जिसमें अध्यात्म, दैवीय व लौकिक का मिश्रण होता है इसलिए आम भाषा में इसके उपदेश कई बार बनावटी सी लग सकती हैं.

मगर भारतीय परंपरा में एक ही बात को कई तरह से कहने का चलन है. उदाहरण के लिए महर्षि पतंजलि के अष्टांगयोग में समाधि की चर्चा है. वर्तमान में भारतीय दर्शनों में योग सबसे अधिक स्वीकार्य है. योग का आखिरी आयाम समाधि है. ये समाधि भी मोक्ष का ही एक स्वरुप है.

इसी प्रकार श्रीमद्भागवद्गीता में भी उस परम-तत्व को प्राप्त करने के तीन मार्ग बताए गए हैं; ज्ञानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग. ज्ञानयोग का अर्थ विद्या, सुविद्या से है. जब ज्ञान बढ़ेगा तो आप क्रोध करने के बजाय विनम्र होते चले जाएंगे. मानव जीवन में विनम्रता से अधिक हासिल क्या हो सकता है… ?

फिर विद्या का ध्येय सिर्फ नौकरी या लौकिक सफलता ही नहीं है, जीवन के नए आयामों से दृष्टिगोचर होना और मूल्यों को सीखना भी इसी का हिस्सा है. इतनी समान्य चीजें तो बताते हैं हमारे प्राचीन साहित्य… एक बार उनका रुख तो करिए… क्योंकि ये ध्यान रखिए, आपके लक्ष्य की प्राप्ति आपको विद्या से ही होगी… आपको विवेकशील और विनम्र भी वही बनाएगी!

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY