स्वरोजगार : मोदी सरकार मौका दे रही, क्या कुछ नहीं कर सकते, अगर इरादा हो

बात पकौड़ा प्रकरण से कई साल पहले की है… न मोदी सरकार, न मनमोहन, न वाजपेयी, न देवेगौड़ा-गुजराल बल्कि परम विद्वान् और चाणक्य कहे जा सकने वाले पी वी नरसिंहराव सरकार के दौर की.

मुझसे उम्र में कोई छः-सात साल छोटा लड़का चौराहे पर पान-गुटखा की गुमटी लगाता था. उससे सटी दूसरी गुमटी में उसका पिता चाय की दुकान चलाता था. बेहद गरीब लोग… लड़के की बड़ी बहन की शादी हो चुकी थी जबकि वह खुद और छोटी बहन अविवाहित थे.

पिता बीमार पड़ा और चल बसा. 13 दिन के मातम के बाद जब दुकान (गुमटी) खोली तो समस्या ये कि दूसरी (चाय वाली) कौन संभाले? कुछ दिन उसने दोनों संभालने की कोशिश की पर ये संभव नहीं था…

कभी पान-गुटखा लेने वाला ग्राहक इंतज़ार करे, तो कभी चाय का तलबगार… चौराहे पर ऎसी गुमटियों की कोई कमी तो थी नहीं, सो ग्राहक दूसरों की तरफ बढ़ जाते.

अपन इस बालक की दुकान के लंबे अरसे से ग्राहक थे… दिन में 3-4 घंटे वहीं बीतते थे यानी बाबा के प्रवचन वहीं हुआ करते थे… नियमित श्रोता भी एकत्रित हो जाते… ट्रांसपोर्ट एरिया था, सो ट्रक ड्राइवर्स, खलासी, हम्माल, ऑटो चालक, रिक्शा वाले…

मैंने बालक की परेशानी देखी और समझी तो सुझाव दिया कि देख यार, चाय तू अच्छी बनाता है जो अगल-बगल वालों से बहुत बेहतर है… गुटखा-पान-सिगरेट-बीड़ी तो हर गुमटी में एक जैसी ही मिलती है… तो इसे तो बंद कर और पूरा ध्यान चाय बनाने में लगा.

एक सुझाव और दिया कि चालू चाय बाज़ार भाव से अठन्नी (50 पैसे) और स्पेशल चाय एक रूपए महंगी कर दे…

शुरुआती झिझक के बाद लड़का मान गया… चाय के दाम बढ़ाते ही ग्राहक बिदके और दूसरे चायवालों की तरफ बढ़ लिए, लेकिन बमुश्किल एकाध हफ्ते के लिए… ज़बान पर इसकी चाय का स्वाद जो चढ़ा था.

मामला जम गया, और ऐसा जमा कि ट्रांसपोर्ट कार्यालयों में चाय पहुंचाने के लिए और ग्लास धोने के लिए एक लड़का रखना पड़ा.

पर कुछ ही दिन में फिर वो हैरान परेशान दिखने लगा… कभी शक्कर ख़त्म, कभी दूध ख़त्म और खरीदने के लिए पास में पूंजी नहीं… गुमटी से होने वाली बिक्री से आने वाला पैसा रोज़मर्रा के खर्चों के लिए पूरा न पड़े… और कार्यालयों में जाने वाली चाय का हिसाब साप्ताहिक यानी शनिवार के शनिवार हो.

तब मैंने उसे प्रस्ताव दिया कि मैं रास्ता निकालता हूँ पर शर्त ये कि पूरा वित्तीय प्रबंधन मेरे हाथ में रहेगा… यानी कर्मचारी छोकरे की साप्ताहिक तनख्वाह, दूधवाले का रोजाना बिल, शक्कर-चायपत्ती-अदरक का रोज़ का भुगतान मैं करूंगा…

इतना ही नहीं, तुझे किसी काम को पैसे चाहिए तो वो भी मैं ही दूंगा… बस रोज़ की सारी बिक्री हर शाम मेरे हाथ में रखना होगी… और शनिवार शाम कार्यालयों से होने वाला भुगतान भी मेरे पास रहेगा.

भगत तो था ही बालक… मान गया… एक पुरानी डायरी लेकर हिसाब किताब शुरू किया गया, पूंजी के नाम पर उस ज़माने में मैंने करीब 800 या साढ़े आठ सौ रूपए उसमें लिखे और उस दिन का कारोबार शुरू करवाया.

लिखत-पढ़त में हिसाब आ जाने के कारण उसे भी दिखने लगा कि पैसा जा कहाँ रहा है, कितना जा रहा है, कहाँ अटका है, किसको देना, किससे लेना है…

सिर्फ तीन महीने ये क्रम चला और फिर मैंने हाथ खींच लिए… कारण??? न सिर्फ उसने मेरे आठ सौ-साढ़े आठ सौ रूपए ही लौटा दिए, बल्कि सारे खर्चे काटकर शुद्ध लाभ के सात हज़ार रूपए भी बचा लिए.

लड़का होशियार था, जल्द ही गुमटी पर बिस्किट्स, टोस्ट भी सज गए…

और फिर लगभग साल भर बाद वो मेरे घर आया, साथ में दो लोग और थे… बोला कि सौदा पटवा दो भैया, इन्हें अपना लोडिंग ऑटो बेचना है… पैसे आधे हैं मेरे पास… आधे छः महीने में चुका दूंगा.

उन लोगों से बात की, मामला सेट हुआ, विक्रय पत्र भी मैंने बना कर दिया… और इस तरह चाय वाला ऑटो मालिक बन गया.

लेकिन परेशानियां ख़त्म नहीं हुईं… जब ये ऑटो में माल लादकर कहीं पहुंचाने जाए, तब कोई दूसरा ग्राहक ठीये पर इसे न पाकर किसी दूसरे ऑटो वाले को ले जाए… ज़्यादा तब अखरती थी जब इसकी गैरहाजिरी में ग्राहक दूसरे को लेकर निकले और दो-चार मिनट बाद ये लौट कर आए और अफ़सोस जताए…

हाँ, एक बात बताना रह गई, तब मोबाइल युग शुरू नहीं हुआ था… और जब हुआ तब भी आम लोगों के लिए आउटगोइंग के साथ इनकमिंग कॉल पर लगने वाली कीमत देना आसान न था…

खैर, फिर हिसाब किताब लगाया गया कि दिन में ऐसे कितने ग्राहक लौटते हैं और कितने का नुकसान होता है… अंत में इस नतीजे पर पहुंचे कि रोज़ जितना नुकसान होता है, उससे कम में तो एक ड्राईवर की रोज़ की सैलरी निकल आएगी. तो ये निर्णय लिया गया कि वापस चाय की दुकान शुरू की जाए… चाय बेचने के साथ ऑटो के लिए आने वाले ग्राहकों को भी डील किया जाए.

और विवरण में तो लेख बहुत लंबा हो जाएगा सो सीधे अंत पर पहुंचते हैं कि इस प्रयोग में शुरुआती झटकों, धोखों के बाद आज स्थिति ये है कि यह बालक, जो अब प्रौढ़ हो गया है, अपनी चाय की दुकान चलाता है, दो ऑटो के लिए दो ड्राइवर्स हैं… कैश और कस्टमर डीलिंग खुद करता है, शाम को ड्राइवर्स को तनख्वाह देता है.

इस बीच अपनी छोटी बहन की शादी कर चुका है, खुद भी शादी कर ली, बिटिया कॉलेज में और बेटा कॉमर्स से 12वीं करने के बाद किसी टैक्स कंसल्टेंट के दफ्तर में नौकरी करने लगा है.

मकान की बात तो बता ही दी थी न मैंने? ओह, रह गई… सरकार की तरफ से बीपीएल रेट्स पर मिलने वाला प्लाट खरीदकर पहले दो कमरे का घर बनाया, जो अब पांच कमरों का हो गया है और ऊपर दो कमरे निकाल कर किराए पर दे दिए हैं…

ये उस दौर की कहानी है जब देश में न मुद्रा योजना थी, न स्टार्टअप इंडिया और न थे बैंक के जनधन खाते…. आज जब ये सब मोदी सरकार ने दिया है तो करने वाले क्या कुछ नहीं कर सकते… अगर इरादा हो तो…

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