राष्ट्रवाद बनाम जातिवाद

बीते साल पर मुड़कर नजर डालेंगे, तो कई अजीब से आन्दोलनों पर भी नजर जरूर जायेगी. ये सभी के सभी जातिवादी आन्दोलन थे, और सबके सब राष्ट्रवाद के विरोध में भी खड़े दिखे.

राष्ट्रवाद के विरोध में जातिवाद को उतारना कोई नयी बात नहीं है. भारत में इसका इतिहास कम से कम सौ साल पुराना तो है ही.

सौ साल पहले इसका इस्तेमाल राष्ट्रवाद के ज्वर को तोड़ने के लिए कैसे किया गया था इसकी चर्चा काफी कम होती है. इसकी एक मुख्य वजह ये है कि जैसे आज गुजरात चुनाव की हार को कांग्रेस अपनी ‘नैतिक जीत’ बताती है वैसा पहले भी करती रही है.

अपनी हार को जीत घोषित करने का ये तरीका शायद एक मज़हब (जो काफी हद तक राजनैतिक विचारधारा भी है), से कांग्रेसियों ने सीख लिया था.

चूँकि ये कांग्रेस के आन्दोलन का एक हारा हुआ मोर्चा था इसलिए इसका ज़िक्र दबा दिया गया.

किस्सा करीब 1920 के आस पास का है जब कोल्हापुर के महाराजा पुणे में शिवाजी की एक प्रतिमा की स्थापना करवाना चाहते थे. मूर्ति के तैयार होने, कागज़ी कार्यवाही वगैरह में कुछ समय लगा और मूर्ति पुणे में लगाने की तैयारी हुई.

लगभग उसी दौर में प्रिंस ऑफ़ वेल्स भारत आने वाले थे और गाँधी ने असहयोग आन्दोलन भी छेड़ा था.

अब की मुंबई और तब की बम्बई में प्रिंस ऑफ़ वेल्स का व्यापक विरोध हुआ और इन प्रदर्शनों में कई लोग मारे भी गए.

अब कांग्रेस मुंबई के पास ही पुणे में भी प्रिंस ऑफ़ वेल्स के विरोध में प्रदर्शन करना चाहते थे.

अगर ये प्रदर्शन होता तो प्रिंस ऑफ़ वेल्स वहां शिवाजी की प्रतिमा का अनावरण नहीं कर पाते. राजा साहब के लिए कठिन समस्या थी, कांग्रेसी मानने को तैयार नहीं थे.

आखिर राजा साहब ने आस पास के इलाकों के पटेलों को संदेशा भिजवाया. शिवाजी मराठा शौर्य के प्रतीक थे और कांग्रेस में ज्यादातर ब्राह्मण ही थे.

कांग्रेस के ब्राह्मण जब प्रिंस ऑफ़ वेल्स के विरोध में प्रदर्शन करने पहुंचे तो मुट्ठी भर कांग्रेसियों के विरोध का विरोध करने के लिए हज़ारों की तादाद में आस पास के मराठा और पटेल (जो अधिकतर गावों के मुखिया भी होते हैं) जुट आये थे.

कांग्रेस का राष्ट्रवाद इस जातिवाद के सामने फुस्स हो गया!

प्रतिमा का अनावरण प्रिंस ऑफ़ वेल्स ने ही किया था. भारत में राष्ट्रवाद के उदय का काल, आम तौर पर शताब्दी का दूसरा दशक ही होता है. ये ज्वर पचासवें साल के आस पास तक रहता है.

इस लिहाज से 1920 की इस घटना में कांग्रेस ने शायद पहली बार राष्ट्रवाद के ज्वर को जातिवाद से हराना देखा होगा.

उस दौर के राजाओं को जैसा शासन चलाने का अनुभव था, करीब करीब वैसा ही पीढ़ियों का अनुभव आज के कई कांग्रेसियों को है. ऐसे में जब वो भी राष्ट्रवाद का सामना करने के लिए जातिवाद मैदान में उतारते हैं तो आश्चर्यजनक कुछ भी नहीं!

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