मोदीजी ने चाय बेची है तो हाँ मैंने भी पकौड़ा बेचा है

पुरानी कॉमेडी फिल्मों में आपको पड़ोसन और चुपके-चुपके के बाद कौन सी फिल्म याद आती है? मुझे तो याद आती है बॉम्बे टू गोआ, और बचपन में जब आप फिल्म देखते हैं तो आपको कहानी भले समझ ना आये लेकिन कुछ सीन आपके लिए इतने मज़ेदार होते हैं कि आपके दिमाग में हमेशा के लिए ‘अंकित’ हो जाते हैं.

उन्हीं में से बॉम्बे टू गोआ का एक सीन है जब एक मोटा सा लड़का पकौड़े के पीछे दीवाना होता है और बात बात पर पकौड़ा… पकौड़ा… चिल्लाता हुआ जहाँ पकौड़ा मिलता है वहां उसे खाने के लिए टूट पड़ता है.

आजकल सोशल मीडिया पर जो पकौड़ा पुराण चल रहा है तो मुझे वही मोटा सा बच्चा बहुत याद आ रहा है… हमारा सोशल मीडिया भी इतना ही पेटू होकर मोटा ताज़ा हो गया है… हर घटना पर टूट पड़ता है… और आजकल पकौड़ा-पकौड़ा चिल्ला रहा है…

ऊपर मैंने एक पंक्ति में ‘अंकित’ शब्द लिखा है उस पर विशेष तवज्जो चाहूंगी… एक तरफ एक हिन्दू नौजवान के क़त्ल की दुखदायी ख़बर और उसके बाद पकौड़ा-पकौड़ा करता हुआ सोशल मीडिया का हास्य व्यंग्य…. यहाँ कोई ताना नहीं मार रही… जीवन के पूर्ण रूप का साक्षात्कार करना हो तो यही सबसे महत्वपूर्ण पल होते हैं जब दुःख के गहनतम क्षणों से ही शुद्ध सात्विक हास्य उभरकर आता है…

जीवन के दो ध्रुव पर खड़ा मनुष्य और मनुष्य से निर्मित समाज इतनी शिद्दत और जूनून के साथ जिंदा ही इसलिए है कि उसकी जीजिविषा को इसी समाज से भरपूर पोषण और ऊर्जा मिलती है.

तो जैसा कि हर बार के किस्से के बाद ज़िक्र होता है मेरे व्यक्तिगत अनुभव का तो बात 2008 के पहले की इंदौर है यानी स्वामी ध्यान विनय के पास आने से पहले…

किस्से को आगे बढ़ाने से पहले याद दिला दूं मेरे जीवन की एक कहानी मैंने साझा की थी आप सभी से “मजदूर की मजदूरी” जिसको आप में से कई लोगों ने पढ़ी होगी… उसी कहानी को आगे बढ़ाते हुए बताना चाहूंगी कि जब दूधमुही बच्ची को घर छोड़ काम पर जाना पड़ा और कम्प्युटर वाले मालिक ने मुझे पैसा नहीं दिया और जब पांच साल तक घर में बिना नौकरी के बैठना पड़ा… तब हमने घर के बाजू में किश्तों में एक दुकान खरीदी थी.

मेरे बहुत मना करने के बाद भी एक रिश्तेदार को उसमें पार्टनर बनाया गया… उन्होंने दुकान में सारा सामान लगाया. और फिर हमने इंतज़ाम किया एक हलवाई का… दुकान थी छोटी मोटी घर के ज़रूरतों की चीज़ों की लेकिन उस दुकान का सबसे बड़ा आकर्षण था बेचे जाने वाले समोसे, कचौड़ी और पकौड़े…

उस दुकान के शुभारम्भ के लिए उस समय के महापौर श्री कैलाश विजयवर्गीय को हमने विशेष अतिथि के रूप में बुलाया था… आप सोचिये… कचौड़ी और पकौड़ी की दुकान के लिए इतनी बड़ी हस्ती आने के लिए तैयार हो गयी तो वो हमारा स्टेटस, संपर्क और किसी भी काम को छोटा न समझने का हमारा जज़्बा ही था.

और जब कभी हलवाई नहीं आता था तो हम लोगों को ही उसके हिस्से का सारा काम करना पड़ता था… इस बीच अमेरिका में रहने वाले मेरे भाई का फोन आया, ताना मारते हुए पूछने लगे – “सुना है आजकल पकौड़ा बेच रही हो!”

मैंने एक ही जवाब दिया – “हाँ तो?? कम से कम अपना ज़मीर बेचकर पैसों के लालच में अपनी धरती छोड़कर विदेश में गुलामी तो नहीं कर रही ना….” फिर जीवन में दोबारा कभी उनका फोन नहीं आया…

ये बात अलग है कि जो मुझे पुर्वानुमान हो गया था कि पार्टनरशिप रिश्तेदारी में नहीं चलती, वो भी ऐसे रिश्तेदार जो उम्र में आपसे बड़े हैं और रिश्ता ऐसा कि लड़ना तो दूर अपना हक़ तक नहीं मांग सकते…

ऐसे में दुकान और उसकी सारी इनकम उन्होंने हथिया ली और हम फिर एक बार खाली हाथ नई नौकरी की तलाश में निकल पड़े… और फिर तब मैंने एक मीडिया हाउस में सह सम्पादक की नौकरी कर ली…

जीवन में इस मुकाम तक पहुँचने के लिए पापड़ ही नहीं बेलने पड़ते, पकौड़े भी तलने पड़ते हैं जनाब… तब जाकर कोई चाय वाला प्रधानमंत्री बन जाता है, और कोई संजीव कपूर और विकास खन्ना जैसे मशहूर शेफ के हाथों बने पकौड़े की रेसिपी छापने के लिए वेबसाइट का मालिक…

उसके आगे की कहानी भी बहुत संघर्षपूर्ण है, आज की तारीख तक जीवन में संघर्ष है… लेकिन हम संघर्षों से घबराने वालों में से नहीं है… बातें और भी हैं लेकिन फिलहाल बस इतना ही बताना था… काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता…

हम उन लोगों में से हैं जिन्हें गाय का गोबर उठाकर कंडे बनाने में शर्म आती है, लेकिन वही चीज़ जब विदेशी लोग सुन्दर पेकिंग के साथ अमेज़न पर बेचते हैं तो उसको खरीदते समय ख़याल नहीं आता कि उन्होंने भी जादू से नहीं बना लिए होंगे कंडे… गाय का गोबर तो उठाया ही होगा… और क्या पता गाय के गोबर के अलावा उसमें न जाने किस जानवर का मल मिला रहे हैं…

ये हम ही हैं जिन्होंने किसी ज़माने में अपने ही हाथों से खाट पर निवाड़ चढ़ाई थी लेकिन वही खाट जब विदेश में हज़ारों में बिकती है तो बड़े गर्व से कालर उठाते हैं, देखा हमारे देश का प्रोडक्ट विदेश में कितना महंगा मिलता है, लेकिन आज उन्हें अपने आँगन में वही खाट पिछड़ापन की निशानी लगती है…

तो सोशल मीडिया पर पकौड़ा पकौड़ा चिल्लाने वालों इतने भी पेटू मत बनो कि उस फिल्म के बच्चे की तरह पूरे समय आपके मुंह पर पट्टी बांधना पड़े…

स्क्रीन शॉट का खेल खेलना मुझे पसंद नहीं लेकिन बस आपके मुंह पर पट्टी बाँधने के लिए ही दे रही हूँ कि आज मोदीजी के साथ उनके हर काम में गर्व के साथ खड़ी ही इसलिए हो पाती हूँ कि यदि उन्होंने चाय बेची है तो हाँ मैंने भी पकौड़ा बेचा है… और इसे हम गर्व के साथ बताते हैं, शर्म के साथ नहीं.

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