“लोग क्या कहेंगे” वाले ढकोसलों से बाहर आओ, दुनिया बहुत हसीन है

जब अमेरिका नया नया आया था, तो दो महीने तक UBER टैक्सी में चला. रोज़ नए नए ड्राइवर लोग मिलते, अच्छे परिवारों से.

UBER में अगर आप पांच-छह घंटे टैक्सी चला लें तो कम से कम 150-200 डॉलर आराम से कमा सकते हैं.

सबसे मज़े की बात ये है कि यहाँ के लोगों को बात करने का बहुत शौक है, वे अपने बारे में भी बहुत कुछ बताते हैं और आपके बारे में भी खूब सारा पूछते हैं.

इनमें से कई सारे अच्छी नौकरियां करते हुए पार्ट टाइम उबर में ड्राइवर हैं, कोई अपना परिवार पाल रहा है, कोई अपने ग्रेजुएशन से ब्रेक लेकर अगले सेमेस्टर की फीस इकट्ठी कर रहा है.

एक बार एक उम्र में मेरे बराबर का व्यक्ति मिला, बेटी को डिज़्नीलैंड जाने की ख्वाहिश है, उसके लिए सिर्फ फ्राइडे नाइट को टैक्सी चलाता है.

एक बार एक 45-50 साल की महिला ड्राइवर मिली, पूरा परिवार टैक्सी से पालती है.

उससे बात हो ही रही थी कि उसी दौरान उसकी बेटी का फोन आया, कहा कि नानी का बीपी हाई हो गया है. कार से ही उसने कौन सी गोली देनी है बेटी को बताया, इमरजेंसी हो तो क्या करना है, उसे खाना खाने को कहा और फिर हमसे बात करने लगी.

अमेरिका के वर्क कल्चर की अपनी कमियां हैं पर एक बात सराहनीय है कि यहाँ लोग किसी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझते, उनकी सोच के ऊपर “लोग क्या सोचेंगे” वाले ढकोसले भी ज्यादा हावी नहीं हैं.

एक फोटो सोशल मीडिया पर चल रहा है. कुछ एमबीए वाले चपड़गंजू ग्रेजुएशन गाउन पहनकर पकौड़े बनाते हुए सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं. जैसे पकौड़े बनाकर बेचना पाप हो, जैसे पकौड़े बेचने वाले इंसान नहीं होते.

MBA हो भाई, master in “business” administration, व्यापार करने की ही तो शिक्षा पाकर निकले हो, नौकरी भाड़ में जाने दो, मुद्रा बैंक से लोन लो, कोई गारंटी नहीं, लगाओ रेलवे स्टेशन के सामने पकौड़े की दुकान.

जिनकी है पकौड़े की दुकान, उनकी कमाई सुनोगे तो नौकरी की सोचोगे भी नहीं कभी! पर पहले अपनी “नौकर” बन जाने की मानसिक गुलामी से तो बाहर निकलो, फिर “लोग क्या कहेंगे” वाले ढकोसलों से बाहर आओ. दुनिया बहुत हसीन है.

बाकि तुमने MBA और BE करते हुए कितने झंडे गाड़े हैं वो इंटरव्यू लेते वक्त पता चलता रहता है मुझे, उस पर किसी और दिन लिखूंगा.

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