इस बार उसने “कौन जात हो?” की बजाय “मिडिल-क्लास हो?” पूछा है

अमीर-गरीब, मालिक-मजदूर, बुर्जुआ-सर्वहारा के वर्ग संघर्ष के नैरेटिव की असफलता के बाद आए काला-गोरा, पुरुष-स्त्री, सवर्ण-दलित के वर्ग-संघर्ष के असंख्य समीकरण…

अभी अभी हम ब्राह्मण-राजपूत-बनिया के समीकरण से निकले भी नहीं हैं कि इस बजट के फेर में एक और जाल में उलझ गए हैं…

मध्यम वेतनभोगी वर्ग, व्यापारी, किसान, शहरी, देहाती की गणना में…

इस बजट का विश्लेषण हमसे इस चश्मे से किसने करवाया कि यह मध्यम-वर्ग के लिए अच्छा है या बुरा? हम किसके जाल में फँस रहे हैं?

मैंने बजट नहीं सुना. इसके मूल प्रावधानों से भी अपरिचित हूँ.

सच कहूँ तो व्यक्तिगत रूप से मैं इससे प्रभावित नहीं हुआ. पर इस पर प्रतिक्रियाएं बहुत सुनीं. वे प्रतिक्रियाएं भी सुनी सुनाई, दूसरों की प्रतिक्रियाओं की प्रतिध्वनि मात्र ही है.

बजट पता नहीं, किसके लिए अच्छा है और किसके लिए बुरा… जिसने इसे बनाया वह जाने कि उसने कौन सी बात किस मतलब से डाली है.

पर इसमें मुझे कोई शक नहीं है कि मोदी की सरकार मनमोहन की सरकार से लाख दर्जे बेहतर है. इस सरकार की वित्तीय नीयत पर मुझे कोई शक नहीं है.

पहली बार एक सरकार चली है जिस पर चार वर्षों में किसी भी रूप में किसी वित्तीय अनियमितता या बेईमानी का कोई छींटा नहीं पड़ा है… पाँच साल पहले आप इसकी कल्पना नहीं कर सकते थे.

सात साल पहले आप जंतर-मंतर पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध सर्कस में खड़े थे. तब एक ईमानदार सरकार आपका सपना भर था… आपकी अपेक्षाओं में इनकम-टैक्स की स्लैब में छूट शामिल नहीं थी.

आज अगर आपको एक ऐसी सरकार मिली है जो इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण के लिए गंभीर और प्रयासरत है, बिजली और सड़क देने के लिए तत्पर है, तो इसमें इनकम टैक्स के स्लैब पर इतना बवाल सामान्य और प्राकृतिक नहीं है… मीडिया का खड़ा किया ही लगता है…

इस विषय पर खुशी या निराशा तो हो सकती है, पर रोष-आक्रोश-विद्रोह के स्वर ये आपके नहीं हैं… आपके गले से वो टीवी स्क्रीन काली करने वाला पत्रकार बोल रहा है…और इस बार उसने “कौन जात हो?” नहीं पूछा है…”मिडिल-क्लास हो?” पूछा है…

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