कैसे आप यह सुनिश्चित करेंगे कि 125 करोड़ भारतीयों का सम्मान हो?

इस प्रश्न पर विचार कीजिये. एक कांस्टेबल सड़क पर इशारा करता है, तो ट्रैफिक रूक जाता है. लेकिन यदि यही कार्य आप करे तो लोग आपको इग्नोर करके आगे बढ़ जाएंगे. ऐसा क्यों होता है? उस पुलिस वाले की अथॉरिटी का आधार आखिर क्या है?

इसी प्रकार से एक सरकारी शिक्षक आपके पास जनगणना के समय जानकारी मांगने या मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए आएगा. आप उसे यह कार्यवाही क्यों करने देते हैं? अगर आप किसी अनजान व्यक्ति से ऐसी व्यक्तिगत जानकारी मांगे, तो क्या आप को वह सूचना मिल जायेगी?

मेरा पूछने का मतलब यह है की ऐसी कौन सी ‘शक्ति’ या ‘अथॉरिटी’ उन अधिकारियों और कर्मचारियों में होती है जिसके कारण भारत के सभी नागरिक उनकी आज्ञा का पालन करते हैं? और ना करने पर दंड का प्रावधान है. आखिर उनकी ‘अथॉरिटी’ का स्रोत क्या है?

आप कहेंगे उनको यह अथॉरिटी सरकार से मिली है. लेकिन सरकार कौन है और कैसे वह ‘सरकार’ हो गई.

और फिर लोकतंत्र में किसी भी सरकार को सौ प्रतिशत मत कहीं नहीं मिलता. कुछ ना कुछ नागरिक उस सरकार के विरोध में हमेशा खड़े रहेंगे. तो आप उन नागरिकों को कैसे उस सरकार की सत्ता या अथॉरिटी मानने के लिए बाध्य कर सकते हैं?

आप कहेंगे कि हम 125 करोड़ भारतीय संप्रभु हैं; यानि कि लोकतंत्र में सत्ता या अथॉरिटी का निवेश हम में है; उस अथॉरिटी का स्रोत हम है.

कैसे भारत के 125 करोड़ नागरिकों की सम्प्रभुता – ‘वास्तविक इच्छा’ या real will (मेरे पिछले लेख में इसका उल्लेख है) – को पहचाना जाए और उसे लागू किया जाए?

पिछले तीन दिनों में मेरी तीन लेखों पर 500 से अधिक कमेंट आए. मेरे लिए उन टिप्पणियों का सार निकालना और उसका जवाब देना कठिन हो गया था. तो कैसे 125 करोड़ भारतीयों की आकांक्षाओं और अभिलाषाओं – संप्रभुता या सर्वोच्च शक्ति – का निचोड़ निकालकर उसको समझा जा सके और उसका पालन किया जा सके?

उत्तर यह है कि उस संप्रभुता या सर्वोच्च शक्ति का निवेश भारत गणतंत्र के राष्ट्रपति में है. उस उच्च ऑफिस में 125 करोड़ भारतीयों की गरिमा और संप्रभुता निहित है, प्रतिबिंबित है.

छोटे से छोटा कर्मचारी भी भारत के राष्ट्रपति के नाम पर उस अथॉरिटी का निर्वहन करता है. तभी आप और हम उसके आदेशों का पालन करते हैं.

इस का मतलब यह नहीं है कि आप रामलाल कांस्टेबल की बात मान रहे हैं. एक तरह से उसका अर्थ यह है कि आप भारत के राष्ट्रपति की सत्ता का सम्मान कर रहे हैं.

संविधान का 52 वा अनुच्छेद कहता है कि ‘भारत का एक राष्ट्रपति होगा’. पूरे संविधान में यह कहीं नहीं लिखा कि भारत का राष्ट्रपति नियुक्त होगा. जबकि उसी संविधान में लिखा है कि भारत के प्रधानमंत्री और उनके मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति करेंगे.

आखिरकार राष्ट्रपति की नियुक्ति क्यों नहीं होती. क्योंकि, क्या 125 के 125 करोड़ भारतीय अपने आप को नियुक्त कर सकते हैं?

इस लेख का उद्देश्य भारत के राष्ट्रपति के कर्तव्य और अधिकार के बारे में बतलाना नहीं है. यह तो सभी को पता है कि वह भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना के सर्वोच्च कमांडर है. उनके अनुमोदन बिना कोई भी कानून मान्य नहीं है.

भारत के राष्ट्रपति को वेतन नहीं मिलता, बल्कि emoluments – मानदेय – मिलता है जिसकी गरिमा वेतन से अधिक होती है.

अगर प्रधानमंत्री, मंत्रिमंडल, न्यायाधीशों और सारे कर्मचारियों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं तो क्या उनका मानदेय उन सभी से अधिक नहीं होना चाहिए?

भारत के राष्ट्रपति को अभी तक केवल डेढ़ लाख रुपए प्रति महीना मानदेय मिलता था, जबकि कैबिनेट सचिव का वेतन ढाई लाख था.

पिछले वर्ष की शुरुआत में ही सरकार ने यह समझ लिया था कि यह स्थिति उचित नहीं है. राष्ट्रपति के मानदेय को बढ़ाने की प्रक्रिया में कई महीने लग गए जो अब जाकर के लागू हुआ है.

अगर आप किसी कर्मचारी, यहां तक कि प्रधानमंत्री पर कोई आरोप लगाएंगे या उनकी आलोचना करेंगे तो वह पलट कर आपको जवाब दे सकते हैं, आप पर कार्यवाही कर सकते हैं.

न्यायाधीशों पर आरोप लगाएंगे तो आपको मानहानि के केस में जेल में बंद किया जा सकता है. लेकिन राष्ट्रपति की आलोचना करेंगे तो वह आपको जवाब नहीं देंगे, क्योंकि वह आलोचना 125 करोड़ भारतीय अपनी स्वयं की कर रहे हैं.

कैसे आप यह सुनिश्चित करेंगे कि 125 करोड़ भारतीयों का सम्मान हो? कैसे आप यह सुनिश्चित करेंगे कि जब कोई विदेशी राजनयिक या नेता भारत आए तो उसे 125 करोड़ भारतीयों की मान और मर्यादा का सम्मान करने का अवसर मिले? और बदले में उसे भी हम भारतीयों से सम्मान मिले.

तभी राष्ट्रपति के उच्च ऑफिस की भव्यता और गरिमा उस गणतंत्र के सम्मान को प्रदर्शित करती है. तभी राष्ट्रपति महोदय प्रोटोकॉल से बंधे होते हैं.

यही है गण का तंत्र या गण का राज्य. इस गणतंत्र की मर्यादा और सम्मान बनाए रखना हमारे ही हाथों में है.

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