प्रेम जैसा छलिया शब्द कोई नहीं!

जब तुम उसकी उपलब्धि की तरफ आँखें मूंदकर
खड़े होकर उपेक्षा से कंधे उचका देते हो,
तब टूटे हुए क्षणों में वह प्रेम के टुकड़े बीनती है!

छितरे हुए आत्मविश्वास पर वह फिर चढ़ा लेती है,
मुलम्मा चिड़चिड़ाहट का!

बहुत संभव है उसकी छवि बन जाती है,
कड़वी, अपने में रहने वाली और घमंडी औरत की,
परिवार से नफरत करने वाली औरत की,
परिवार तोड़ने वाली औरत की!

मगर उसके किसी कोने में प्रेम सूखता नहीं,
वह उस प्रेम को अपने जूनून को सौंपकर,
फिर से राख से बनाती है अपना व्यक्तित्व!

तुम नहीं जानते,
उपेक्षा से उसकी उपलब्धि को दी गयी मुस्कान,
उसे नहीं तोड़ती!

वह उसे बदलती है किले में,
उसकी शक्तियों के दुर्ग में!
उसकी अस्मिता की परिभाषा में!

मगर प्रेम की टूटन या टूटन का प्रेम,
वह मापती है!
उपेक्षा और खुद से प्रेम के बीच में,
वह खुद के प्रेम को चुनती है!

तुम्हारे होंठ जब कहते हैं
“मैं नहीं जानता कि तुमने किया क्या है?”
तब वह उन की गोलाई मापकर
उन चुम्बनों को वाष्प बना देती है,
जिनकी आद्रता तो अभी तक उसके ह्रदय में है,
मगर उपेक्षा नहीं!

वाष्प बनकर प्रेम की उपेक्षा को वह उड़ा देती है,
बस अपने अस्तित्व के दुर्ग में
कहीं छिपाए होती है वह उसे इस आस में
शायद सागर जितनी गहरी उपेक्षा कहीं तो कम होगी!
और मन ही मन बुदबुदाती है,
“प्रेम जैसा छलिया शब्द कोई नहीं!”

– सोनाली मिश्र

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