आह अम्बानी-अडानी की सरकार, मिडल क्लास की दुश्मन सरकार

करीब ढाई साल पहले एक पोस्ट लिखी थी, अम्बानी के मुंबई में बने एंटिला बंगले/ अपार्टमेंट/ महल पर.

बड़े अम्बानी की साल की तनख्वाह 60-65 करोड़ है. जो उन्हें रिलायंस के सीईओ होने के नाते मिलती है. कुछ और कंपनी से भी हो सकता है ऐसी सैलरी मिलती हो.

खैर एंटिला 7000 करोड़ में बना महल है. और वो तनख्वाह से नहीं बन सकता. ये पैसा काला भी नहीं है. शुद्ध सफ़ेद धन जिसका पाई-पाई का हिसाब सरकार को दिया गया है.

ये पैसा आता है रिलायंस द्वारा उसके शेयरों पर दिए गए डिविडेंड से. अकेले अम्बानी 700-800 करोड़ हर साल डिविडेंड से पाते थे. टाटा, बिरला, बजाज, प्रेम जी इसी तरह सैकड़ो करोड़ डिविडेंड से पाते हैं.

दो साल पहले तक ये डिविडेंड टैक्स फ्री था. कंपनी 10% एट सोर्स काटकर सभी के हाथ में देती थी. अमीर गरीब सभी एक भाव.

अगर मैं दस लाख से ऊपर के टैक्स ब्रेकेट में हूँ और इंटरेस्ट से मेरी कमाई कुछ हजार है तो उस कुछ हजार पर सरकार 30% भाव से टैक्स लेती है .

बड़े उद्यमी इस डिविडेंड पर 10% कंपनी से कटवाते थे. और सैकड़ो करोड़ की इनकम टैक्स फ्री एन्जॉय करते थे.

दो साल पहले मोदी सरकार ने सालाना दस लाख से ज्यादा डिविडेंड पाने वालों पर दस प्रतिशत अतिरिक्त टैक्स लगा दिया.

बड़े सेठों की ऐसी ही कमाई का एक और जरिया शेयर सेल से था. 2004-05 में सरकार ने छोटे निवेशकों को शेयर बाजार में आकर्षित करने के लिए एक साल बाद बेचे गए शेयर से कैपिटल गेन टैक्स हटा दिया.

छोटे निवेशकों का पता नहीं. लेकिन बड़े लोगों, निवेशकों को इसका बहुत फायदा हुआ.

सन 2015 में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज ने एक रिपोर्ट मोदी सरकार को सौंपी जिसमें कहा गया था कि इस एक्जम्प्शन (छूट) की वजह से सरकार को सालाना 3.4 लाख करोड़ की आय का नुकसान हो रहा है. BSE ने एक टैक्स दुबारा लगाने की वकालत की.

अब पता नहीं ये 34000 करोड़ रूपये का टैक्स न लगाकर मध्यम वर्ग का भला हो रहा था या बड़े निवेशकों का.

खैर बात सिर्फ टैक्स से आय की ही नहीं था.

फर्जी, शैल कंपनियों के पेनी स्टॉक में पैसा लगाकर एक साल बाद बेचकर भ्रष्टाचार का एक बड़ा खेल चल रहा था.

विमुद्रीकरण के समय भी मैंने एक बात खास तौर पर कही थी. ये काला धन पकड़ने के लिए नहीं था.

अब देखा जाये तो रिश्वत की रकम बड़े प्रोजेक्ट्स में हजारों करोड़ में जाती है. ये पैसा नकद नहीं दिया जा सकता. कुछ करोड़ में मुसीबत हो जाती है तो फिर कुछ सैकड़ों करोड़ और कुछ हजार करोड़ कैसे नकद में दिए जायेंगे.

एक ही रास्ता बैंक बचता है. और बैंक में काला पैसा, रिश्वत का पैसा कौन लेता है.

उसके लिए ये शैल कम्पनियाँ काम आती हैं.

ऐसी एक कंपनी का शेयर पेनी या कहें तो कुछ पैसो में ख़रीदा जाता है. फिर एक साल बाद उस शेयर को मैनिपुलेट करवाया जाता है. कुछ रुपयों में बदलकर जब वो शेयर बेचा जाता है तब तक करोड़ों के वारे न्यारे हो चुके होते हैं.

और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन के जरिये पूरा पैसा टैक्स फ्री. शेयर बेचकर हुई आय सफ़ेद धन. चांदी ही चांदी.

दो साल से सरकार, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट, सेबी ऐसी कंपनियों की जाँच कर रहे हैं.

सेबी ने पिछले साल ऐसी 331 कम्पनियाँ पकड़ी थीं जिन्होंने 11000 ट्रांजेक्शन पांच लाख के ऊपर की रकम के किये थे.

मोदी जी अपने एक भाषण में CA लोगों को बताया था कि एक लाख ऐसी फर्जी कम्पनियाँ चिह्नित की गयी हैं.

इस साल बजट में सरकार ने लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स खत्म कर दिया.

मिडल क्लास के लिए एक छूट दी कि अगर शेयर बेची रकम से एक लाख से कम मुनाफा है तो वो टैक्स फ्री है. उसके ऊपर 10% टैक्स लगेगा.

लेकिन मिडल क्लास कहता है उस पर जुल्म हो रहा है. करप्शन पर रोक नहीं चाहिए, मेरे पेट का सवाल है. मोदी सरकार हम लोगों की दुश्मन है.

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