मैं भी हिन्दू हूँ और अपने पुरखों के पाप का अपराधी भी

मैं चाह कर भी अच्छी बात नहीं लिख पा रहा हूँ क्योंकि आज नफरत सी हो उठी है नौकरी पेशा हिन्दुओं से (मैं भी वही हूँ, इसलिये खूब इनको जानता हूँ), क्योंकि यही मध्यम वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं.

भारत के परिप्रेक्ष्य में यह मध्यम वर्ग बड़ा नाम कर रहा है क्योंकि बाज़ार की पर्चेसिंग पावर उठाने वाला यह वर्ग है लेकिन सबसे भ्रष्ट भी यही है.

इसमें इस वर्ग की उतनी गलती नहीं है जितनी उस मानसिकता और उसके तन्त्र द्वारा बनाई गई व्यवस्था की है, जिसने इन्हें सिर्फ लेना ही सिखाया है, देना नहीं. इन्हें सिर्फ मांगना सिखाया है, देना नहीं.

ज्यादातर सामर्थ्य का भारतीय ईमानदार तो है लेकिन गुलामी के डीएनए के कारण चोर भी है. 1000 वर्ष की गुलामी ने उसे चोर बन कर अपने अस्तित्व को बचाये रखने की सिद्धि प्रदान कर दी है.

1947 से पहले बने लोग, चाहे वे 1857 से बने या बनाये गये राजा, महाराजा, राव, चौधरी, नवाब, राजबहादुर, दरोगा, तहसीलदार या आईसीएस हों वे सब न भारत के थे और न भारतीयों के थे, वे सब गुलाम नस्ल के अपने हाकिमो के थे.

वे सब अपनी आत्मा को बेच चुके लोग थे, जिन्हें भारत की 1947 की स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में उन्हें प्रतिस्थापित किया और इन लोगों को भारत की जनता का आदर्श बनाया.

इसी चोरी से की गई प्रतिस्थापना ने भारत के तंत्र को चलाया और इसी कारण भारत की जनता 70 वर्ष के बाद भी चोरी करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझती है.

आज तो यह स्थिति हो चुकी है वह अपने को सफल तभी मानता है जब वह दूसरे को चोर बना कर अपनी चोरी को सुविधा या ईमानदार बना लेता है.

मैंने अभी दिसम्बर में दशकों के पुराने बैक वेजेस पर लाखों से ऊपर का इनकम टैक्स कटवाया है, बेहद तकलीफ हुई है लेकिन मुझे उसके साथ यह भी मालूम है कि मेरा यह पैसा राष्ट्र के काम मे ही जायेगा.

यह न बहामा, न मॉरीशस, न स्विट्ज़रलैंड जायेगा, यह गांव, गरीब और सामान्य लोगों की ज़िंदगी संवारने में जायेगा. मुझे यह भी मालूम है कि यह पैसा भारत के अस्तित्व की रक्षा के लिये खर्च होगा.

मुझे कहना बहुत है लेकिन फायदा कोई नहीं है, क्योंकि हमें मिलना 2019 में है, कुरुक्षेत्र तैयार है. मैंने अपना पाला पहले से ही तय कर रखा है और वह है राष्ट्र प्रथम.

क्योंकि शिव सेना, करणी सेना, ब्राह्मण होने के अहंकारी, यादवों के सिपहसलार, आंबेडकर को बेचने वाले बहुजनी, द्रविड़ और क्षेत्रीय राजनीति करने वाले, सभी के लिये न हिन्दू है और न भारत है.

मेरे लिये हमेशा से मुसलमान या ईसाई कोई मतलब नहीं रखते हैं क्योंकि दासता, भिक्षा, अहंकार और स्वार्थ से लिप्त हिन्दू ही ने भारत के साथ, हिन्दू नस्ल को 1000 सालों से गुलाम बनाय रखा है.

मैं भी हिन्दू हूँ और मैं अपने पुरखों के पाप का अपराधी भी हूँ लेकिन मेरा प्रायश्चित न सिर्फ भारत के प्रति तन, मन और धन से निष्ठा है बल्कि हर उस हिन्दू के प्रति प्रतिघात है जो स्वार्थ और अधिकार की लालसा में डूब कर, भारत, हिंदुत्व और कर्तव्य को नेपथ्य में डाल, खुद के अस्तित्व को प्रथम समझता है.

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