जनता के मूल्यों और प्रथाओं को बदलने के लिए प्रतिबद्ध हैं प्रधानमंत्री

बजट से संबंधित मेरे लेख पर कई प्रतिक्रियाएं आई. मित्रों ने मध्यमवर्ग को आयकर में कोई राहत ना मिलने पर रोष जताया है.

साथ ही कुछ एक ने तो यह प्रश्न भी किया कि किसानों को उनकी लागत से डेढ़ गुना ज्यादा भरपाई की गारंटी के कारण मध्यम वर्ग के लिए अनाज महंगा हो जाएगा.

अभी तक मैं मीडिया और सोशल मीडिया दोनों पर यह देखता आया हूं कि लोग हमेशा किसानों के हित के बारे में बात करते थे. इस बात पर चिंता व्यक्त करते थे कि गांवों का विकास कैसे हो? कैसे समाज के गरीब वर्ग को प्रगति करने का अवसर दिया जाए?

अब लगता है कि वह सारी की सारी चिंता महज एक स्लोगन थी.

यद्यपि पिछले वर्ष के बजट में ढाई से पांच लाख वालों की इनकम पर टैक्स 10% से घटाकर 5% कर दिया गया है तब भी लोगों में बहुत नाराज़गी है.

अगर किसानों और गरीबों की भलाई को लेकर आपकी संवेदना और प्रोत्साहन महज एक दिखावा था, तो कहीं ऐसा तो नहीं है कि कांग्रेसियों को भी पता था कि आप केवल अपना विकास चाहते हैं, समाज के पिछड़े वर्गों का नहीं.

और आपकी इसी भावनाओं को समझते हुए ना केवल उन्होंने किसानों और गरीबों को लॉलीपॉप दिया, बल्कि मध्यम वर्ग के हाथ में झुनझुना पकड़ा दिया.

एक बार सोचिए ऐसा कैसे हो सकता है कि गरीब, गरीब ही रह जाए और मध्यम वर्ग को छोटे-मोटे फायदे मिलते जाएं?

राजनीति शास्त्र में ऐसा माना जाता है कि राज्य (राष्ट्र) की उत्पत्ति और उसकी वैधता का आधार प्रत्येक व्यक्ति के मध्य social contract या सामाजिक अनुबंध है.

सभी व्यक्तियों ने अपनी स्वयं की और सम्पति की सुरक्षा, एवं अपने मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए आपस में अपनी स्वेच्छा या वास्तविक इच्छा से यह करार किया कि हर व्यक्ति एक दूसरे के अधिकारों का हनन नहीं करेगा, एक-दूसरे की जान नहीं लेगा और इस करार को लागू करने ले लिए वह अपने कुछ अधिकारों का त्याग कर देगा.

इसी कॉन्ट्रैक्ट ने संविधान का रूप लिया. और यह कोई बाज़ारू या लेन-देन का कॉन्ट्रैक्ट नहीं है; बल्कि इस कॉन्ट्रैक्ट का आधार नैतिक है.

प्रसिद्ध फ़्रांसिसी विचारक जाँ जाक रूसो का मानना था कि लोगों को अक्सर अपनी “वास्तविक इच्छा” पता नहीं होती और कहा कि एक यथोचित समाज तब तक नहीं बन सकता जब तक एक महान नेता जनता के मूल्यों और प्रथाओं को बदलने के लिए तैयार नहीं होता.

इसी बात से ही तो छुटभैये नेता डरते है. उनका डर अपने अरबों के काले धन को खोने का नहीं है. उन्हें भय तो इस बात का है कि प्रधानमंत्री ने हर व्यक्ति को अपनी “वास्तविक इच्छा” या real will का प्रयोग करने को प्रोत्साहित किया.

प्रधानमंत्री ने हमें अपनी और राष्ट्र के मूल्यों और प्रथाओ को बदलने के लिए प्रोत्साहित किया. अब हमारे राष्ट्र की नींव एक ऐसे सामाजिक अनुबंध पर रखी जाएगी, जो नैतिक होगा क्योंकि उसमें हम सब की पहली बार सौ प्रतिशत भागीदारी होगी.

और इस नए राष्ट्र की नींव में कोई भी गरीब नहीं होगा. सभी के सर पर छत होगी. उस छत के नीचे टॉयलेट होगा. उस घर में 24 घंटे बिजली आएगी. हर गांव, क़स्बा, शहर, राजधानी सड़क, संचार और वित्तीय व्यवस्था के द्वारा जुड़ा होगा.

सभी को आवश्यकता के अनुसार सब्सिडी मिलेगी. उद्यम लगाने के लिए अवसर मिलेंगे. और इसी से ही एक प्रगतिशील समाज की स्थापना होगी.

यही हम भारतीयों की “वास्तविक इच्छा” या real will है.

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