सुप्रिया देवी : किरदार से निकल बादल की ओट में छुप गया एक तारा

मेरी स्मृति के पुराने घरों में आँगन के बाद एक कमरा हुआ करता था जिस पर लकड़ी की खपच्चियों की आड़ वाली दीवार होती थी. आढ़े-टेढ़े कुछ इस ढंग से वह लगी होती थीं कि आड़ भी बनी रहे, घर में रोशनी भी आती रहे और दूर से आता हुआ कोई व्यक्ति भी दिखाई दे सके.

इसके पीछे छिपे चेहरे की खूबसूरती भी देखी जा सकती थी और पलकों की झपक का अंदाज़ा भी लगाया जा सकता था. ऐसे ही एक घर की इस आड़ के पीछे खड़ी स्त्री का चित्र पुणे स्थित फ़िल्म और टेलीविज़न संस्थान के विज़डम ट्री के ठीक बाजू वाली दीवार पर उकेरा हुआ है. यह चित्र महान फ़िल्मकार ऋत्विक घटक की अद्भुत फ़िल्म ‘मेघे ढाका तारा’ का एक दृश्य है और वह स्त्री स्वयं बादलों के पीछे तारे (मेघे ढाका तारा) की तरह रहने वाली नीता (सुप्रिया देवी) है.

नीता की आँखों में उस आड़ के पीछे से भी जो ताप और अहसास झरते दिख रहे हैं, वह घटक का जादू है मगर नीता बनी सुप्रिया देवी आज जब ख़ुद एक मिथक बन गई हैं, तो उन्हें उनके जाने के बाद याद करने पर वही दृश्य बार-बार आँखों के सामने आ रहा है.

एक कलाकार का हासिल क्या है, इस सवाल का जवाब ढूँढने पर भी नहीं मिलता. ख़ुद के भीतर छिपी कितनी संभावनाओं और संतुष्टि के बीच वह एक सफ़र तय कर रहा है, इसका भी कोई ठीक आकलन नहीं हो सकता. पर अभिनेता के रूप में नीता जैसा किरदार, घटक जैसा निर्देशक और ‘मेघे ढाका तारा’ जैसे सिनेमा का हिस्सा बन पाना बहुत बड़े सपने का सच होना और कर्म का फल जाने जैसा है.

सुप्रिया देवी ने यूं तो दर्जनों फ़िल्में और किरदार किए पर ‘मेघे ढाका तारा’ वह चरम है जिस पर ठिठका जा सकता है. बीती 26 जनवरी को जब सुप्रिया ने इस दुनिया को अलविदा कह कर अपने किरदार को रुख़सत किया तब से ज़ेहन में वो बराबर चल रही हैं. यक़ीनन, कला के आस्वाद को महसूस करने वाला हर आम-ओ-ख़ास अपने भीतर इस तरह की संवेदनाओं को महसूस करता होगा. मन के तार भी पता नहीं कहाँ-कहाँ जुड़ते हैं पर हर बार ‘मेघे ढाका तारा’ देखकर प्रसिद्ध कवि आलोक धन्वा की एक कविता ‘अचानक तुम आ जाओ’ की पंक्तियाँ सीने में धड़कती हैं.

पंक्तियाँ कुछ यूं हैं, – घनी आबादी का देश मेरा / कितनी औरतें लौटती हैं शाम होते ही अपने-अपने घर / कई बार सचमुच लगता है तुम उनमें ही कहीं आ रही हो / वही दुबली देह / बारीक चारख़ाने की सूती साड़ी / कन्धे से झूलता झालर वाला झोला / और पैरों में चप्पलें’ . ‘मेघे ढाका तारा’ बहुत दूर तक जाती है. इस देश के अवचेतन में भी, हर गाँव, गली, मुहल्ले, कस्बे तक. अपनी पूरी ताकत के साथ नस-नस में घुसी हुई.

ये और बात है कि अब हर गाँव, मुहल्ला एक भरा-पूरा अलग देश लगता है. समय के साथ चलते-चलते, अपनी टूटी चप्पल को हाथ में उठाकर देखते, घर में बिखरी ज़िंदगी को देख भीतर कुढ़ते पर बाहर हँसते हुए और आँखों में समंदर लेकर चलते हुए उदासी को गहना बनाते हुए सुप्रिया देवी इतिहास और समय का हिस्सा बन जाती हैं. उनकी आँखों में और शरीर में जो किरदार उतरा है वह अपने ज़र्रे-ज़र्रे में मिसाल है.

यूट्यूब पर एक सीरीज़ है ‘फ़िल्म दैट हैस चेंज्ड माय लाइफ़’ नाम से. वहाँ फ़िल्मकारों के अपने-अपने अनुभव हैं. फ़िल्मकार अमोल गुप्ते का एक इंटरव्यू है और उसमें ‘मेघे ढाका तारा’ का ज़िक्र है. एक फ़िल्म और उसमें अदाकारी का प्रभाव कितना ज़्यादा हो सकता है यह अमोल के उस इंटरव्यू से महसूस किया जा सकता है.

उसे देखकर हर बार आँसू निकलते हैं. यानि केवल फ़िल्म के बारे में बात करते, सोचते हुए ही. फ़िल्म का क्या असर होता है यह देखने पर पता चलता है. सच है, कलाओं का यही असर होता है कि वो व्यक्ति से निकलकर समष्टि तक पहुँच जाती हैं. यह कथा और उसकी किरदार नीता वाक़ई एक किंवदंती ही बन गई. आप भुलाए नहीं भूल सकते उस असर को. याद करने पर वह असर और भी नया लगता है.

अमोल को फूट-फूटकर रोते देखना ख़ुद को रोते देखना है. क्योंकि भले ही लगभग साठ साल हो गए हों फ़िल्म को, सच्चाई आज भी यही है और हमारे आसपास बिखरी पड़ी है. कई स्त्रियाँ एक नीता की ही तरह जीवन जी रही हैं. शायद कई पुरुष भी. मतलब एक तरह का किरदार हमारे पास पिछले कई समयों से चलता चला आ रहा है, त्रास दे रहा है, झकझोर रहा है पर हम समय के साथ भागते चले जा रहे. ना मालूम कहाँ और किसे पाने? किसकी तलाश में?

जिस किसी ने भी ‘मेघे ढाका तारा’ देखी है उसे वही अनुभव महसूस होगा. डर के साथ संजीदगी का. सुप्रिया देवी ने किस तरह नीता का वह किरदार निभाया होगा, इसे सोचना मुश्किल है. एक पूरा जीवन उस किरदार में दिखता है. नीता अपने भाई, बहन, पिता, प्रेमी और ज़िंदगी के छल से छलती चली आ रही. तब तक हँसते हुए वह बर्दाश्त कर रही है जब तक कि शरीर जवाब नहीं दे देता.

अद्भुत प्रभाव वाले सुंदर दृश्यों के साथ ज़िंदगी बेतरतीब रूप से नीता के साथ बुरा बर्ताव कर रही. सबको जोड़ कर रखने की अपनी आदत के चलते नीता ख़ुद को तोड़ चुकी है. इतना कि सहारे का मतलब ही वह भूल गई. जिस दिन उसके कंधे पर उसका भाई अपना हाथ रखता है तब उसे जीने की चाह होती है.

फ़िल्म का अंतिम दृश्य जब नीता कह रही ‘दादा, आमि बाँचते चेयेछिलाम’ (दादा, मैं जीना चाहती थी) वह तब कह रही जब उसे लग रहा कि किसी से कहा जा सकता है. सुप्रिया देवी के हिस्से जो नीता आई वह बेचैन करती है. रुलाती है. घटक तो अपने भीतर अजीबियत को जी ही रहे थे और उसे रच ही रहे थे पर सुप्रिया ने कहाँ से वह ताक़त अर्जित की होगी, इसका जवाब अब हम केवल उनके किरदार से ही अब खोज सकते हैं.

ज़रूर घटक उन्हें अपने साथ ‘कोमल गांधार’ तक भी लाते हैं जहां दो नाट्य दलों के निर्देशकों के बीच की टकराहट में फिर वही विभाजन, शरणार्थी, उनकी ज़िंदगी की जद्दोजहद और भीतरी असमंजस के बीच अनुसूया बनी सुप्रिया फ़ैसले कर रही प्रेम, साथ और जीवन के चुनाव का.

घटक की अन्य फ़िल्मों की अपेक्षा यहाँ उम्मीद है. बंगाल की समृद्ध सिनेमा परंपरा में भी उत्तम कुमार के साथ फ़िल्मों और हिन्दी की कई फ़िल्मों में भी सुप्रिया नज़र आई. किशोर कुमार की फ़िल्म ‘दूर गगन की छाँव’ में मीरा के रूप में भी वे आँखों से कह रहीं. उनकी आँखों में बंगाल की पूरी परंपरा समाई है.

बंगाल के लोग उन्हें पाकशास्त्र में दक्ष रहते टेलीविज़न पर खाना पकाने के गुर सिखाते भी देख चुके. बात मगर घूम-फिरकर ‘मेघे ढाका तारा’ पर ही लेकर आ रही. नीता आँखों से ओझल नहीं हो पा रही. सुप्रिया देवी को याद करना दरअसल अपने बीते समय और खंडहर हो चुके अतीत को सहेजना है. सब कुछ बीत चुका, अच्छा सिनेमा बन चुका, उसे बनाने वाले जा चुके और जाते जा रहे.

पर सिनेमा अब भी बचा हुआ है. उनके जाने के बाद और भी अपना लग रहा. उसका प्रभाव रह-रहकर मजबूर कर रहा कि भीतर कुछ टटोला जाए. डूबा जाये. हालांकि, बदल कुछ नहीं रहा. शायद न भी बदले. पर केवल इसलिए कला में ज़िंदगी को ढूँढने की और सहजने की कोशिशें रुक नहीं सकतीं.

अलविदा सुप्रिया… अब आप ‘मेघे ढाका तारा’ को जी चुकीं. सच कर सकीं घटक के सपने को. बादल की ओट से झांक कर देखिये लोग याद कर रहे हैं आपको और करते रहेंगे. अब आप किरदार से निकलकर उसे जीवित कर चुकी हैं. अभिनय की यात्रा शायद अब शुरू होती है जब हम यहाँ से लौटते हुए पीछे-पीछे चलते हुए उस फ़िल्म तक पहुंचेंगे. शायद कुछ समझ सकेंगे !

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