जीवन से संवाद : जेब…. कतरन

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प्रश्न – आज मेरी बेटी ने आपके बारे में बड़ा गजब प्रश्न किया… मुझे देर तक हंसी आती रही, सच में बच्चे बड़े शरारती होते हैं…

अनुत्तरित – बेटी क्या कह रही थी ?

प्रश्न- बेटी ने मुझसे पूछा कि मैंने जो आपसे पिछले जन्म के बारे में पूछा था आपने उसका जवाब क्यों नहीं दिया? बड़े ध्यान से सुना उसने, तपाक से बड़े स्टाइल में कहा कि अपने पिछले जन्म का पता है उन्हें? उसकी उस मासूमियत पर मैं अभी भी मुस्कुरा रहा हूँ…

अनुत्तरित- बच्चों के मुंह से ईश्वर बोलता है…. बाकी लोगों का तो सच में पता नहीं मुझे… अपने पिछले जन्म का सच में पता है..

प्रश्न- इसलिए ही तो मुस्कुरा रहा हूँ कल से.. जरा बताइए कुछ?

अनुत्तरित- हर सवाल का जवाब नहीं होता..

प्रश्न- फिर सवाल होता ही क्यों है??

अनुत्तरित- ताकि जीवन से जिज्ञासा ख़त्म न हो जाए…

प्रश्न- मतलब आदमी को श्मशान भी प्रश्न के साथ ही जाना पड़ता है? क्योंकि कुछ न कुछ तो अनुत्तरित रह ही जायेगा न?

अनुत्तरित- जी तभी तो वो दोबारा जन्म लेता है अपने अधूरे प्रश्नों के जवाब की तलाश में ….

प्रश्न- इसका मतलब आदमी खाली हाथ आता है और जाता है ये ही सच हो सकता है, लेकिन न तो खाली दिमाग आता है और न ही खाली दिमाग जाता है, है न सच?

अनुत्तरित- फिर एक सवाल…

प्रश्न- मुझे लगता है कि जन्म और मृत्यु के समय जेब और हाथ ही खाली होते हैं, दिमाग नहीं… लेकिन जब मनुष्य दोबारा जन्म लेता है अनुत्तरित प्रश्नों के जवाब में, तो नए प्रश्न इतने हो जाते हैं कि पुराने प्रश्नों के उत्तर ढूँढना तो क्या, पुराने प्रश्न ही भूल जाता है.

अनुत्तरित- और बन जाती हैं पिछले जन्म की झलकियाँ जो बार बार सपनों में आकर आपको याद दिलाती है कि तुम कुछ और खोजने आए थे इस जन्म में और फिर नई उलझनों में उलझ गए… कब मुक्ति पाओगे इस जन्म चक्र से….

प्रश्न- जी, और हम इसी को महत्वपूर्ण मानकर लगे रहते हैं, उद्देश्य अधूरा रह जाता है… लेकिन वो सवाल अनुत्तरित है अभी, मनुष्य खाली दिमाग नहीं आता?

मैं सच में अनुत्तरित हूँ… क्या जवाब दूं… किस भाषा में जवाब दूं… ये तो कबीर की सांध्य भाषा के बस की ही बात है लेकिन कितने समझ पाएंगे ये भाषा और समझ भी जाएंगे तो क्यों विश्वास करेंगे मुझ पर … इसलिए अक्सर जवाब नहीं देती…. लेकिन दिखाई देती है मुझे सपनों के पार की कुछ झलकियाँ जब मैं, मैं होकर भी मैं नहीं थी…. फिर मैं कौन थी? .

क्या वही ‘शैफाली’, जिसका फोटो बब्बा अपनी जेब में लेकर घूमते थे… लेकिन सिर्फ नाम ही तो था.. मैं तो नहीं… फिर कौन थी या कौन हूँ… आती हूँ बाहर बब्बा की जेब कतरकर… थोड़ा ठहरो… कुछ समय और उनकी जेब में पड़े रहने दो मुझे… खनक लेने दो खोटे सिक्कों की तरह… जो अब बाज़ार में नहीं चलते… यहाँ अब सिर्फ करारे नोट चलते हैं करारी वास्तविकता की तरह… जहाँ आप नए सपने तो खरीद सकते हो लेकिन पुरानी हकीक़तें नहीं… उसे तो वहीं जीना होता है…

उन्हीं खोटे सिक्कों से एक टाइम मशीन खरीदी हैं मैंने. करारे नोट जब गलने लगते हैं तो बब्बा की जेब में छुप खनकती रहती हूँ… आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा है ये कि तब खोटे सिक्के भी चल जाया करते थे…

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