देव : खुद से प्यार करनेवाला इंसान

अभिनेता देव आनंद को खुद से बहुत प्यार था. इस हद तक कि उन्हें किसी फिल्म में खुद को मरते दिखाया जाना बिल्कुल भी पसंद नहीं था.

उनकी कोशिश तो यहां तक रहती थी कि खुद को कभी किसी फिल्म में बीमार, असहाय, गरीब और लाचार नहीं दिखाये.

वो हर फिल्म में उंची कॉलर वाली शर्ट और तरह तरह की टोपियां पहन कर नायक होने का उत्सव मनाते रहे.

जीवन के प्रति उनका ये उनका असीम अनुराग ही था कि जिस दौर में हीरो निर्माता से ज़िद कर के फिल्म के क्लाइमैक्स में अपने मरने के सीन लिखवाया करते थे, देव आनंद चेहरे पर मुस्कान लिये हर फिल्म मे हैप्पी एंडिग के साथ मिला करते थे.

शायद उनके पूरे करियर में गाइड ही एकमात्र ऐसी फिल्म है जिसमें देव आनंद मरते हैं और मरते भी इस धज के साथ हैं कि मक़तल खुद उठकर जश्न में शामिल हो जाये.

गाइड, आर के नारायण के उपन्यास ‘द गाइड’ पर बनी थी और मूल उपन्यास में नायक राजू गाइड एक गुमनाम मौत मरता है जबकि फ़िल्म में राजू गाइड के मरने पर अकाल से तड़प रहे गांव में बारिश होती है और नायक एक प्रसिद्धि वाली मौत मरता है.

सिनेमा सदा से महानता के दंश से श्रापित है. सिनेमा सदा से लार्जर दैन लाइफ ही है.

गाइड को लेकर एक तथ्य यह भी है कि बावजूद इसके कि गंभीर सिनेमा को पसंद करने वालों को देव आनंद कभी रास नहीं आये, गाइड जैसी गूढ़ स्क्रिप्ट में देव आनंद अपनी पूरी रुमानियत के साथ तिलिस्म रचते हुए नजर आते है.

ये फिल्म एक किवंदती है कि अगर निर्देशक विजय आनन्द जैसा गुणी हो तो तथ्य और तर्क मिटाये जा सकते हैं.

क्या गाइड से देव आनंद को हटाकर भी देखा जा सकता है या फिर देव आनंद के पूरे फिल्मी करियर को गाइड से परे रखकर देखा जा सकता है?

देव आनंद की बाकी सभी फिल्मों पर एक अकेली गाइड भारी पड़ती है. इस फिल्म में भी उनका मैनेरिज्म, डायलॉग्स का बिना चबाए लगातार बोलना, बेचैन गर्दन और आंखों का झटकना कायम है, पर गाइड के राजू गाइड के कैरेक्टर को इन सब से फायदा ही मिला.

गाइड हिन्दी और इंग्लिश दोनों भाषाओं में बनी. इसी फिल्म ने देव आनंद को अभिनेता के रूप में नई पहचान दी, फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाया. ऑस्कर तक फिल्म दिखाई गई.

समीक्षकों ने इससे पहले उनके लिए इतने कसीदे नहीं गढ़े. देव आनन्द नई ऊंचाई पर थे. इसी ऊंचाई पर उन्होंने निर्णय लिया कि अब वो बतौर निर्देशक भी फिल्में बनाएंगे.

विजय आनन्द का अभिनेता और देव आनन्द का निर्देशक के रूप में आना ट्रेजेडी ही साबित हुआ.

यहां से निर्देशन का जो उन्होंने ट्रैक पकड़ा उस पर अंत तक दौड़ते रहे. बच्चों सा उत्साह लिए हर छोटे-छोटे सतही विचार पर फिल्म बना डाली.

हर समय शूटिंग में या फिर तकनीकी पक्ष में खुद को व्यस्त रखा. ये उत्साह ही ऊर्जा में तब्दील हो रहा था.

उनकी सहृदयता और सिनेमा के लिए खुद को खर्च करने का जुनून ही था कि अस्सी के दशक के बाद की उनकी हर घटिया फिल्म को निर्माता भी मिल जाते और काम करने के लिए बड़े कलाकार भी.

वो अंत तक कहते रहे कि वो दिल से अभी तक जवान हैं और बुजुर्गों सी गंभीरता कभी उनके पास नहीं आई.

उनके दो बहुत नज़दीकी दोस्तों ने आत्महत्या की थी. इन घटनाओं के बाद वो इस बात से और ज्यादा मज़बूत हो गए थे कि उन्हें जीवन का जश्न मनाना है, मातम नहीं.

आज देव आनंद को उनकी लाइफ के साथ रुमानियत और सिनेमा के लिए अप्रतिम प्यार के लिए याद किया जा सकता है. अभिनेता स्वरूप के लिए शायद गाइड ही याद रहे.

सुना ये भी है कि देव आनंद की अंतिम इच्छा के मुताबिक उनकी मौत की, उनके अंतिम संस्कार की कोई तस्वीर बाहर नहीं आई. विदेश में ही उनका अंतिम क्रियाकर्म हुआ. इस हद तक भला कौन कोई अपनी छवि से प्यार कर सकता है!

देवदास का ज़िक्र चला तो शोक के उत्सव का विलोम जिजीविषा से परिपूर्ण देव आनंद ही नज़र आए. एक ऐसा आदमी जो हमेशा कहा कहता था, यार मरने की बात मत करो, जीने की सोचो.

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