जवाब ज़रूरी है : भाग-2 : धारा 370

भारतीय राजनीति के अब तक के 70 वर्षीय इतिहास में केवल भाजपा एकमात्र ऐसी पार्टी है जो पहले दिन से ही धारा 370 का खुलकर विरोध करती रही है.

उस समय भाजपा का नाम जनसंघ और चुनाव चिन्ह दीपक हुआ करता था. इसके ठीक विपरीत हर पार्टी इस धारा 370 का खुलकर समर्थन और इसको हटाए जाने का प्रचण्ड विरोध करती है.

इस विरोध का कारण बताने की ज़रूरत नहीं क्योंकि मेरा मानना है कि वह कारण आप सब भलीभांति जानते होंगे.

लेकिन इसके बावजूद अकेली भाजपा (तत्कालीन जनसंघ) द्वारा धारा 370 के विरोध का वह पहला निर्णायक सुपरिणाम आज़ादी के 6 साल बाद ही पूरे देश को मिल गया था जिसको आज हम सब भोग रहे हैं. जिसका लाभ उठा रहे हैं.

बात को विस्तार से समझाता हूं…

[जवाब ज़रूरी है : भाग-1 : राम मन्दिर]

याद रखिये कि आज भी हमसे आपसे हर भारतीय से माता वैष्णोदेवी के दर्शन के लिए, बर्फानी बाबा अमरनाथ के दर्शन के लिए, कश्मीर में पर्यटन के लिए कश्मीर सरकार का परमिट मांगा जाता.

हमको आपको उसी तरह उस परमिट का इंतजार करना पड़ता जिस प्रकार कैलाश मानसरोवर के लिए आज चीन के परमिट का इंतिज़ार करना पड़ता है कि आखिर मेरा नंबर कब आयेगा… कब आयेगा मेरा नंबर…

यह कोई कल्पना की उड़ान नहीं है. मनगढ़ंत कहानी भी नहीं है.

1947 में देश को मिली आज़ादी के 6 साल बाद भी, 1953 तक यही स्थिति थी. जम्मू-कश्मीर में प्रवेश के लिए हमको परमिट लेना पड़ता था.

यह व्यवस्था ब्रिटिश शासकों ने नहीं बनाई थी. उनके शासनकाल में तो कोई भी व्यक्ति जम्मू-कश्मीर में उसी तरह बेधड़क आ जा सकता था जिस तरह देश के अन्य भागों में.

आज़ादी मिलने के बाद जम्मू कश्मीर में किसी भारतीय के प्रवेश पर परमिट प्रतिबन्ध की व्यवस्था जवाहर लाल नेहरू ने लागू की थी.

[ऐसा पहली बार नहीं हो रहा]

यह तुगलकी व्यवस्था 1953 में तब खत्म हुई जब जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इसके खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका और बिना परमिट के जम्मू कश्मीर में प्रवेश किया.

परिणामस्वरूप जम्मू कश्मीर की शेख अब्दुल्ला सरकार ने पहले उनको गिरफ्तार किया, फिर जेल में उनका कत्ल कर दिया था.

शेख अब्दुल्ला सरकार द्वारा किये गए उस कत्ल में नेहरू सरकार की मिलीभगत के आरोपों की आग से देश उस समय सुलग उठा था.

अतः डॉ श्यामप्रसाद मुखर्जी के उसी बलिदान से थर्रायी घबरायी तत्कालीन नेहरू सरकार को परमिट व्यवस्था को तत्काल खत्म करना पड़ा था.

यह परमिट व्यवस्था उसी धारा 370 का सबसे घातक प्रावधान था जिसके खिलाफ जंग आज भी जारी है.

यहां एक उल्लेख ज़रूरी है कि डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी के कत्ल के आरोप को नकार कर नेहरू ने उनकी मौत को बीमारी के कारण हुई मौत कह कर कश्मीर की तत्कालीन शेख अब्दुल्ला सरकार और अपनी केन्द्र सरकार को क्लीनचिट दे दी थी.

संयोग से उस समय डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी की माताश्री जीवित थीं. नेहरू द्वारा दी गयी उस क्लीनचिट के जवाब में उन्होंने कहा था कि…

“नेहरू, सरकार भी तुम्हारी है, जांच एजेंसी और अदालत भी तुम्हारी है. लेकिन याद रखना कि एक अदालत ऊपर भी है. मेरा, मेरे बेटे का और तुम्हारा फैसला अब उसी अदालत में होगा.”

अब यह आप पर है कि इसे मात्र संयोग कहिए या उस एक आहत दुःखी मां के हृदय से निकला श्राप मानिये कि… डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी की माताश्री द्वारा दिये गए उस श्राप को 64 वर्ष हो गए. इस 64 वर्ष की अवधि में नेहरू परिवार का एक भी सदस्य अपनी पूरी उम्र नहीं जिया तथा अकाल मौत ही मरा है. दामाद फ़िरोज़ गांधी भी 48 वर्ष की आयु में ही मर गया था.

अब बात फिर वही कि 370 के खिलाफ लड़ाई में पार्टी के संस्थापक शीर्षस्थ नेता ने अपने प्राण तक बलिदान कर दिए. परमिट व्यवस्था खत्म कराई. उसके बावजूद यूपी या केन्द्र में जनसंघ कभी बहुमत के आसपस तो छोड़िए, 100 सीटों की संख्या तक को पार नहीं कर सका था.

अतः भाजपा RSS धारा 370 के समर्थक है ऐसा सोचने की भयंकर मूर्खता कम से कम मैं तो नहीं कर सकता. लेकिन साथ ही साथ सच यह भी है कि भाजपा और RSS भी भलीभांति यह समझ चुके हैं कि धारा 370 के लिए सबकुछ दांव पर नहीं लगाया जा सकता.

इसके लिए अचूक अवसर पर उसकी गिद्ध दृष्टि गड़ी हुई है. यकीन रखिये कि वह अवसर अभी आया नहीं है और जिस दिन आएगा उस दिन भाजपा से कोई चूक नहीं होगी.

अख़लाक़, जुनैद, वेमुला की मौत तथा चंद गुम्मे फेंक कर तोड़े गए चर्चों की खिड़कियों के शीशों पर हफ़्तों तक ठप्प रखी गयी राज्यसभा और कांग्रेस कम्युनिस्ट के नेतृत्व में राज्यसभा में होते रहा नंगनाच सबूत है कि अवसर अभी आया नहीं है. लेकिन वह अवसर बहुत निकट अवश्य आ गया है.

अगले लेख में बात समान नागरिक संहिता की.

क्रमश:…

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