हाँ, अब कुछ भी नहीं करती मैं

एक ऋषि खड़ा था एक पेड़ के नीचे
हर आने जाने वाला पूछता
क्या कर रहे हो
वह कहता
खड़ा हूँ
हाँ, मगर क्या कर रहे हो
फिर जवाब आता
खड़ा हूँ

मैं भी खड़ी हूँ छः दशक के इस पार
सब तो कर लिया
पढ़ाई लिखाई, शादी वादी , बच्चे शच्चे
घर बार , प्यार व्यार , लड़ाई मार कुटाई
अब बस खड़ी हूँ
इस उम्र में पहले लोग चले जाते थे वानप्रस्थ
मैं घर बैठे, घूमते फिरते, खाते पीते
शॉपिंग-वापिंग करते
वानप्रस्थ ही हूँ

हाँ, साठ के इस पार
अब मैं कुछ नहीं करती
करती तो पहले भी क्या थी
हो रहा था
अब देख रही हूँ
कहीं भी खड़ी हो, कभी भी खड़ी हो
देखती हूँ उड़ते जाते बादल
उड़ते जाते परिंदे
एक एक पत्ता गिरता पेड़ से
ख़ाली ख़ाली पेड़
तो कभी भरे पूरे पेड़
धीरे धीरे भरती हूँ चाय की चुस्कियाँ
कोई भी जल्दी नहीं है
कहीं भी जाना नहीं है
शीशे के आगे खड़े हो निहारती हूँ ख़ुद को
जी करे तो सज धज जाती हूँ
लिप्स्टिक वीपस्टिक, बिंदी विंदी, चूड़ी शूड़ी सब
नहीं तो देखती हूँ कहाँ कहाँ पड़ी है
झुर्रियाँ वुर्रियाँ, कोवे के पंजे शँजे
ख़ुद को हर हाल में अच्छी लगती हूँ मैं

ज़िंदगी का सब से ख़ूबसूरत मौसम है यह
कुछ करना ही नहीं है
कभी कभी सोच लेती हूँ समेट दूँ सब
क्या पता कब चलना हो
फिर सोचती हूँ
कब कोई पूरा पूरा सब कुछ समेट पाया है
रह ही जाता है कुछ न कुछ आधा-अधूरा
तो जब मर्ज़ी चले जाओ
साथ ले कर आए थे क्या कुछ
जो समेटना बाक़ी है अब
यही बना यहीं वाले देख लेंगे सब

तो बस, मैं फिर कुछ नहीं करती
खड़ी हूँ
खिड़की में
खिड़की इस पार और उस पार के बीच
इस पल में
इत्मिनान से
मुस्कुराती
न इंतज़ार, न उम्मीद
न ख़्वाब न चाहत
सिर्फ़ प्रेम

ख़ुश बुश हूँ
क्यों न होऊँ वोऊं
छः दशक लगे यहाँ तक आते आते…

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