जिनके कारण हमारे बीच ये नपुंसकता भरी, उन सपनों को बदलने की आवश्यकता

गांधी, अगर नेहरू की जगह हिन्दू सावरकर या सुभाष को समर्थन देते तो पाकिस्तान तो बन जाता लेकिन स्वतन्त्रता के साथ निश्चित रूप से सांप्रदायिक दंगे और हिंसा से छुटकारा भी मिल जाता.

लेकिन यहाँ भी हमारे पूर्वजों का एक दोष उल्लेखनीय है. गांधी ने Pakistan over my dead body कहा इस पर हिंदुओं ने अंधविश्वास किया. यह उनकी सब से बड़ी भूल रही कि बंटवारा तो हो रहा ही था लेकिन गांधी उसे रोकने में असफल रहे.

मुसलमानों ने उनकी बात को क्या इज्जत दी, यह तो दुनिया देख ही रही थी. ना ही गांधी ने अनशन पर बैठने की धमकी मुसलमानों को दी क्योंकि उनको पता था क्या होगा. हिन्दू तभी गांधी को कूड़ेदान में फेंक देते तो अच्छा होता.

पाकिस्तान तो बन ही जाता लेकिन अनवरत सांप्रदायिक हिंसा से छुटकारा मिल जाता. मुफ्तमांग के मुफ्तियों की कोई औकात नहीं होती.

अस्तु, जो नहीं हुआ सो नहीं हुआ.

लेकिन हम ठहरे पुनर्जन्म वाले. आज भी हमारे बीच हमारे वही पूर्वज मौजूद हैं जो नेताओं के कहने पर अंधविश्वास करते हैं. जब तक यह प्रवृत्ति रहेगी, जिन्ना का जिन्न बार-बार पैदा होते रहेगा.

ओवैसी बैरिस्टर बना है इसका अर्थ समझिए, क्योंकि स्वतंत्र भारत में बैरिस्टर बनना कोई विशेष फायदे की बात नहीं. यह विरासत में मिली अलगाववादी नेतृत्व के साथ वही tokens जोड़कर अपने समुदाय को संगठित करने की उसकी कवायद है. खुद को जिन्ना-2 दिखा रहे हैं.

अस्तु, अपने बीच अपने पूर्वजों के पुनर्जन्म की बात करें तो आज हम भी अपने नेताओं पर अंधविश्वास कर रहे हैं या हमें उन पर अंधविश्वास करने कहा जा रहा है.

यहाँ मुझे एक ही बात कहनी है, और वो नेतृत्व बदलने की नहीं लेकिन खुद को सक्षम करने की है. तब हमारे पूर्वजों ने खुद को सक्षम नहीं किया इसलिए उन्हें झेलना पड़ा. भोले होने का रोना काम नहीं आयेगा.

विधर्मी समाज सदा सक्षम रहने में मानता है इसीलिए उनके नेताओं में मगरूरी दिखती है.

यह मगरूरी दिखाना भी हमारा मनोधैर्य तोड़ने का एक तरीका है. लेकिन अगर हम सक्षम रहें तो उनमें तमीज अपने आप दिखने लगेगी, वे हमेशा निरीक्षण करते रहते हैं,

यह भी उनके युद्धधर्मिता का एक अविभाज्य अंग है. तमीज सिखाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. बदतमीज मगरूरी और तमीजभरी ज़हीनियत ये दोनों लिबास उनके पास हमेशा तैयार रहते हैं, वे मौके के हिसाब से उन्हें पहनते रहते हैं.

सोशल मीडिया में नेताओं के नाम हमेशा उद्धत तरीके से तीखे सवाल पूछकर क्या हासिल होता है?

केवल नेताओं के भक्तों को निरुत्तर या शर्मिंदा करने के अलावा कोई उपलब्धि? कुल माहौल बिगाड़ने के अलावा और कुछ होता है?

क्या आप के पास सिर्फ पूछने को सवाल है, सुझाने को उपाय कुछ नहीं? व्यवहार्य समाधान पर सोचने में कोई ऊर्जा क्यों नहीं लगाते?

इनके पास सुझाव भी हैं तो सरकार के लिए हैं. बाकी उन सुझावों की व्यवहारिकता पर कुछ कहना केवल कड़वाहट पैदा करना होगा इसलिए रहने देते हैं.

“कौन करेगा?” यह प्रश्न ऐसे पूछा जाता है कि वही उत्तर है – किसी और को ढूंढिए, यह मैं नहीं करूंगा और न ही इसमें कोई सहायता करूंगा.

साफ कहिए आप को कुछ नहीं करना, बेकार के प्रतिप्रश्न से बचिए. वैसे, जिसे कुछ करना होता है वो सीधा यही पूछता है – बताइये, आप के हिसाब से मैं कहाँ काम आ सकता हूँ?

और ऐसे भी लोग होते हैं जो अपनी कार्यपद्धति के बारे में बताते हैं, कि हम ये कर रहे हैं, जिसके ये परिणाम हैं, आप बताएं इससे और हम कुछ कर सकने की क्षमता रखते हैं तो कर सकें.

यहाँ स्पष्ट किए देता हूँ, मैं अंधभक्ति का कत्तई समर्थन नहीं करता, इसलिए कृपया “याने आप के कहने का अर्थ ये हुआ” वाला हथकंडा मत आजमाइए.

जो लिखा है, साफ लिखा है. हमें अपने सपने बदलने की आवश्यकता है, जिनके कारण हमारे बीच ये नपुंसकता भरी है. इस पर भी आगे लिखना है, साथ बने रहिए.

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