आवश्यकता है ऐसे ही जमीनी सच्चाई को समझ हिन्दूहित में काम करने वालों की

शाकाहार सर्वोत्तम है मैं मानता हूँ. लेकिन साथ ही यह भी मानता हूँ कि इस विश्व को शाकाहारी बनाना असंभव है.

दशकों से बल्कि सदियों से इस बात को समझाने के लिए अनगिनत संत-महात्मा प्रवचन देते रहे हैं लेकिन ब्रह्म-सत्य यह है कि मांसाहारियों की संख्या में उतरोत्तर वृद्धि ही हुई है.

हिन्दू समाज में भी मांसाहारियों की बहुत बड़ी संख्या सदैव से रही है और बाकायदा खटीक समाज मांस-विक्रेता समाज के रूप में हम लोगों में स्थापित है.

प्रवचनों से मांसाहारी हिन्दुओं पर कितना असर पड़ा यह तो कहा नहीं जा सकता लेकिन मांस विक्रय एक घृणित व्यवसाय के रूप में अवश्य स्थापित हो गया.

बेहद दुखद सत्य यह है कि बड़ी संख्या में खटीक समाज भी पवित्रता के और व्हाईट कॉलर जॉब के फेर में आकर इस करोड़ों अरबों रूपये के व्यवसाय को गँवा बैठा है जिसको मुस्लिम समुदाय ने अवसर मानकर लपक लिया है. बड़े ही बुझे मन से लिखना पड़ रहा है कि आज मांस विक्रय 99% मुसलामानों के हाथों में जा चुका है.

ऐसे में सुकून देने वाली बात यह है कि कुछ लोग हैं जो अतीत में की गई मूर्खता को दुरुस्त करने में अपनी पूरी शक्ति और बुद्धि लगाकर इस व्यवसाय पर एक छत्र राज कर रहे हैं. उन्हीं में से एक हैं इंदौर के नन्द किशोर पहाड़िया जी जिनकी मालवा मिल रोड पर भवानी झटका मटन शॉप है.

पहाड़िया जी के नौकर तक खटीक हिन्दू हैं, उन्हें अपने व्यवसाय से बहुत लगाव है. संचालक जी की यह दुकान पुश्तैनी है और करीब अस्सी साल पुरानी है. उन्होंने आस-पास के गाँवों में एक नायाब तंत्र स्थापित किया है बकरा बकरी पालकों का.

उन्हें हर तरह की सहायता कच्चे माल यानी बकरों के स्वास्थ्य का उच्च स्तरीय बंदोबस्त, उनका परिवहन देखने लायक है.

एक बात सबसे ज्यादा उल्लेखनीय यह है कि जहां इंदौर में मटन का मूल्य चार सौ पचास रुपये प्रति किलो है वहीं भवानी झटका मटन शौप का मूल्य पचास रुपये प्रति किलो कम है यानि चार सौ रुपये किलो है.

सभी जानते हैं मुस्लिम समुदाय किसी भी परिस्थिति में झटके का मटन नहीं खाता चाहे वो कितना ही साफ़, शुद्ध, ताज़ा और संक्रमण रहित हो यानि कम मूल्य में किसी के यहाँ मिलने वाले निम्न स्तरीय मटन से सस्ता और बेहद हाईजेनिक. इसलिए इसका लाभ मिलता है सिर्फ और सिर्फ मांसाहारी हिन्दुओं को.

दूर दूर तक कोई कसाई उनके सामने आज टिक नहीं पा रहा है कई तो दुकाने बंद करके दूसरे क्षेत्रों में पलायन कर गए क्योंकि मांस क्रेताओं (खरीदारों ) की संख्या मुसलमानों की बजाय हिन्दुओं की अधिक है. ठीक उसी तरह जिस तरह अजमेर में जियारत करने वालों की संख्या मुसलामानों से कई गुना अधिक हिन्दुओं की होती है.

दिल से सेल्यूट करता हूँ नन्दकिशोर पहाड़िया जी को जिन्होंने जमीनी सच्चाई को बहुत गहराई से समझा और गंभीरता से स्वहित एवं हिन्दूहित में काम किया साथ ही धन की बहुत बड़ी मात्रा को म्लेच्छों के हाथों में जाने से रोक लिया.

– अजीत भोंसले

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