ग्रीस, लॉर्ड बायरन, भारत और हम

मैं जब कॉलेज के द्वितीय वर्ष में था तब विज्ञान शाखा को भी दो भाषाओं का चयन अनिवार्य था. इंग्लिश के साथ-साथ और एक भाषा, मैंने मातृभाषा मराठी चुनी.

टेक्स्टबुक के तौर पर एक निबंध संग्रह था, नाम था मनोगते याने मन में उठे हुए विचार. लेखक थे विट्ठल दत्तात्रेय घाटे. मराठी के जाने माने लेखक, तत्व चिंतक और शिक्षाविद.

किताब कहाँ गई पता नहीं, लेकिन कुछ सालों पहले कुछ पढ़ते-पढ़ते एक निबंध याद आया. फिर जैसे जेहन में से झरना सा फूटा और कई सारे निबंध गाहे-बगाहे याद आने लगे. एक धुन सी लग गई उस किताब को पाने की लेकिन तब तक वो आउट ऑफ प्रिंट हो चुकी थी.

जहां भी पा सकूँ, दुकानें, फुटपाथ, सब कुछ छान मारे, लेकिन नकार ही मिला. अचानक एक लायब्रेरी में मिली. स्कैन कर के रख ली. आज एक बात से उस किताब में Lord Byron पर लिखा निबंध याद आया.

ग्रीस तुर्कों की गुलामी में था. ग्रीस की प्रजा स्वार्थी, आत्मकेंद्रित और आलसी थी. और यहाँ कवि मन के बायरन को ग्रीक संस्कृति से और उसकी विरासत से अपार प्रेम था.

बायरन विचलित हो उठा कि यह इतना सुंदर देश, इतनी समृद्ध संस्कृति इस्लाम की ज़ंजीरों में कैद है.

बायरन ग्रीस चला गया और अपनी पूरी जिंदगी और धन संपत्ति उसने ग्रीस को स्वतंत्र करने में समर्पित कर दी. मलेरिया से जल्द मर गया, जीते जी स्वतंत्र ग्रीस देख न पाया.

लेकिन ग्रीको ने उसकी बात दिल पर ली, उनके दिलों में चेतना जाग उठी जो चिंगारी से दावानल बन गई.

आज बायरन की The Isles Of Greece पढ़ता हूँ तो स्थिति हम से अलग नहीं है. लिंक दे रहा हूँ, जिन्हें रुचि है वे अवश्य पढ़ें. रचना ग्रीक संस्कृति के संदर्भों से ठसाठस भरी है, शायद सब उसका लुत्फ नहीं उठा पाएंगे.

http://www.bartleby.com/101/601.html

उस कविता की कुछ पंक्तियाँ ज़ेहन में बस गई हैं. शायद दिल से लिखी बात, दिल तक पहुँचती ही है. जैसे –

But all, except their sun, is set.
उनके सूरज को छोड़ दें तो बाकी सब कुछ अस्त हो चुका है.

या फिर

I dream’d that Greece might still be free;
For standing on the Persians’ grave,
I could not deem myself a slave.

फारस के सम्राटों ने ग्रीस से युद्ध लड़े थे जिसमें उनको मात खानी पड़ी थी. इसीलिए बायरन कहता है कि उनके सैनिकों की कब्रों पर खड़े हो कर मैं अपने आप को गुलाम मान नहीं सकता.

इन पंक्तियों के संदर्भ की जरूरत नहीं, यूं ही समझ में आती हैं –

Trust not for freedom to the Franks—
They have a king who buys and sells;
In native swords and native ranks
The only hope of courage dwells:
But Turkish force and Latin fraud
Would break your shield, however broad.

‘वा’ ‘क’ ‘ई’ का इस से और क्या वर्णन हो सकता है? आज उम्मीद है तो देशज अवचेतन से ही, इस देश की संतान जो इस देश की, इस संस्कृति की अभिमानी हैं, जो मानती हैं कि हम भारतीय हैं, दूसरे देश हमें केवल तब तक अपनाएँगे जब तक उनका स्वार्थ सधता है. क्यूँ हम भारतीय होने पर शर्मिंदा हों?

Thermopylae पता है या नहीं, मैं नहीं जानता लेकिन अंग्रेज़ी फिल्म ‘300’ तो आप ने देखी ही होगी. वो लड़ाई जहां हुई थी उस स्थान का नाम है Thermopylae! उन रणवीरों की याद में बायरन कहता है

Must we but weep o’er days more blest?
Must we but blush?—Our fathers bled.
Earth! render back from out thy breast
A remnant of our Spartan dead!
Of the three hundred grant but three,
To make a new Thermopylæ!

उन सुनहरे दिनों की याद में क्या हम बस रोएँगे?
पूर्वजों ने बहाया लहू क्या हम बस आँसू बहाएँगे ?
हे भूमि! लौटा दे अपनी कोख से
अवशेष मात्र हमारे मृत वीरों के
नहीं मांगते तीन सौ बस तीन ही तू दे हमें
दम है इतना कि बनेगी एक नयी थर्मोपिले!

अगर हमें भारतीय होने का गर्व होगा तो शायद एक दिन कुछ कर जाएँगे जिस से भारत को हम पर गर्व होगा. भारतीय होने की शर्म होगी तो मेरे ये शब्द गांठ बांध रखिए, कहीं भारत आप के वजह से शर्मिंदा न हो पाये. Since you cannot be anything but an Indian, be proud that you are an Indian and perhaps one day, you shall make India proud. If you are ashamed of being an Indian, mark well my words, you can only bring shame to India.

बायरन इंग्लैंड छोड़कर ग्रीस चला गया. हमें देश छोड़ने की जरूरत नहीं, वे सभी परिस्थितियां यहाँ भी वही हैं जो उस वक़्त के ग्रीस में थी. देखिये तो!

– गुलामी में धन्यता मानने वाले और किंकर्तव्यविमूढ़ भारतीय,

– पिंजरा लोहे का है तो सोने का बने तो भगवान का शुक्र मानने वाली मनोवृत्ति,

– महाराणा प्रताप को छोड़कर मानसिंह और पर्याय से मुगलों का साथ देनेवाले,

– शिवाजी महाराज को हराकर औरंगजेब को अपनी निष्ठा का प्रदर्शन करनेवाले

– या फिर आज भी कसाई इसाइयों के फेंके टुकड़ों के लिए लार टपकाते कुबुद्धिजीवी,

– और हर बात में खुद को कोसती, हम ऐसे ही हैं, हम नहीं सुधरेंगे कहने वाली प्रजा.

क्या नहीं है आज यहाँ जो उस वक़्त के ग्रीस में था?

लेकिन और भी एक चीज है जो ग्रीस में भी थी और जिसके लिए बायरन व्याकुल हो उठा था. सम्पन्न भूमि, सम्पन्न संस्कृति!

हम पर हमला करने वालों की भूमि से सम्पन्न भूमि और उनके दर्शन से कई गुना परिपूर्ण दर्शन! हम वे लोग है जिन्होंने हमेशा स्वतंत्र सोच रखी है, स्वतंत्र सोच दी है! और जिनकी सोच स्वतंत्र हैं वे गुलाम नहीं रह सकते!

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