गांधी, गोडसे और हम

मैंने जब से जीवन को समझा है और दशकों से अपने अंदर हो रहे परिवर्तनों को स्वीकार किया है तब से मेरे अंदर एक बात, अंगदीय पाँव जमा कर बैठ गयी है कि, किसी भी व्यक्ति को अपने कर्मो की अंतहीन यात्रा नहीं करनी चाहिये.

व्यक्ति को जीवन की गोधूलि बेला पर आकर थोड़ा विश्राम और चिंतन करना चाहिये. उसको वर्तमान की छाया विश्राम करते हुये, पीछे मुड़ कर, अपनी आस्थाओं, अपनी क्षमताओं और अपने निर्णयों का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए.

उसे, भरी दुपहर के चढ़े, तमतमाये सूर्य को ऊर्जा विहीन, क्षितिज में डूबते हुए देख कर, अपने जीवन के प्रारब्ध को भी समझ लेना चाहिये.

हमे यह मानना ही होगा कि हम चलायमान सृष्टि के एक पथिक है, जहां कुछ भी स्थायी नहीं है.

जो समाज कल था वो आज नहीं है, जो मान्यताएं कल थी वो आज नहीं है, जो आस्थायें कल थीं वो आज नहीं है, जो आकांक्षाएं कल थी वो आज नहीं है, जो प्रेरणा कल थी वो आज नहीं है, जो सत्य कल था वो आज नहीं है और जो आप कल थे वो आज नहीं है.

अब जो व्यक्ति इन सब को अस्वीकार करते हुये, स्वयं को ही सत्य मान कर कर्म करता है और उन कर्मो को भले ही सत्कर्मो के रूप में, महामंडित किया गया हो, वह व्यक्ति सिर्फ पूर्व में किये गये अपने सत्कर्मो पर ग्रहण लगाता है.

सिर्फ यही नहीं, बल्कि वह भावी पीढ़ी द्वारा परिणामों की कसौटी पर तौला जाता है और अपनी ऐतिहासिक भूलों के लिये, समाज व राष्ट्र के मुजरिम के रूप में, कटघरे में बंधा पाता है.

गांधी से अन्ना तक की जीवन यात्रा में मुझको इसी क्रूर सत्य के दर्शन हुये है. गांघी द्वारा, स्वयं के सत्य में कैद होकर, अपने राजनैतिक आवरण पर, महात्मत्व का आवरण चढ़ाना उनकी एक ऐसी ऐतिहासिक भूल थी, जिसने अहिंसा और शांति के साथ खुद भारत को छिन्न भिन्न कर दिया है.

गांधी का पुनर्मूल्यांकन और परिमार्जन, भारत बहुत पहले कर सकता था लेकिन आहत और आक्रोशित, राष्ट्रभक्त नाथूराम गोडसे जी द्वारा गांधी के वध ने वह अवसर छीन लिया.

हालांकि गांधी वध ने कांग्रेस और वामपंथियों को यह जरूर अवसर दे दिया कि वे कई दशकों तक आगे आने वाली पीढ़ियों से, गांधी द्वारा हुई अक्षम्य गलतियों को छुपा कर रख सके और वे लोग इसमें सफल भी रहे है.

गांधी के वध का सबसे दुखद परिणाम यह हुआ था कि बंटवारे व शरणार्थियों की दुर्दशा से बेहद आक्रोशित जनता से कांग्रेस को सहानभूति मिल गयी और गांधी वध ने नेहरू की कांग्रेसी सरकार को पुनर्जीवन दे दिया.

यदि उस वक्त के विभिन्न स्रोतों से आये संस्मरणों व समाचारों को पढ़ें तो यह स्पष्ट है कि बंटवारे की रक्तरंजित वास्तविकता से परिचय और शरणार्थियों के साथ आयी उनकी नारकीय यात्रा व भयानकता की गाथाओं से जनता में चंद महीने पुरानी कांग्रेस के विरुद्ध आक्रोश उबाल पर था.

शरणार्थियों की दुर्दशा भारत के कोने कोने में पहुंच रही थी और जनमानस उद्वेलित था. उसी वक्त ही जनता में यह बात बैठी जा रही थी कि सत्ता की लोलुपता में नेहरू और कांग्रेस ने भारत का बंटवारा कराया है.

लेकिन विधि का विधान कुछ और ही था. जब नेहरू, कांग्रेस और स्वयं गांधी की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता सबसे निम्न स्तर पर थी तब एक गांधी वध से सहानुभूति की इतनी विशाल सुनामी चली कि कई दशकों तक पुराने पाप, पुराने छल, पुराने सत्य भारतीय चेतना में ओझल रहे.

वर्तमान तो यही कह रहा है कि यदि नाथूराम गोडसे को गांधी वध करना था तो वह 15 अगस्त 1947 से पहले करना था क्योंकि बंटवारे तक आते आते, गांधी हार कर, सिर्फ नेहरू के एक छद्म हाथ बन कर रह गये थे.

यदि मारना था तो जिन्नाह या फिर नेहरू को मारना था क्योंकि भारत के बंटवारे के क्षितिज पर सिर्फ यही दो लोग खड़े थे.

मेरा अपना ख्याल है कि जिन्नाह तक शायद लोगो की सोच ही नहीं गयी होगी और नेहरू पर उनका आंकलन दूरदृष्टि से नहीं किया गया था.

अब हमें यह गलती नहीं दोहरानी है.

हम लोगों को आज अर्जुन की तरह सिर्फ जिन्नाह और नेहरू पर ध्यान केंद्रित करना है. हमें भारत में इन दोनों से पनपे सोच, विचार धारा और पल्लवित आत्म मुग्ध बुद्धिजीविता का ही वध करना है.

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