आपकी समझ से कहीं ऊपर है राष्ट्रवाद, जिसे ‘वे’ तो समझते हैं पर आप नहीं

कुछ माह पहले दिल्ली में ITO के पास दीन दयाल उपाध्याय बिल्डिंग में एक कार्यक्रम का आयोजन शुरू हुआ – ‘जम्मू – कश्मीर स्टडी सर्किल’ के नाम से.

इसमें राष्ट्रवादी और अन्य लोगों से फेसबुक पर आह्वान किया आने को जिससे जम्मू कश्मीर की समस्या के साथ समाधान और अन्य बिंदुओं पर चर्चा हो.

कोई भी आ सकता है, जरूरी नहीं कि जो आए वो एक्सपर्ट हो लेकिन जानने – सीखने और समझने के लिए आ सकता है.

ये कार्यक्रम शनिवार या रविवार को शुरू हुआ जिससे लोग आ सकें. पता चला कि पहले सम्मलेन में कुछ 20 – 25 लोग आए थे.

इसके बाद दिन तय हुआ दूसरे सम्मलेन का… हमने भी जाने की सोची और दिल्ली आ गए. फेसबुक पर पोस्ट डाल दिया कि दिल्ली मिलो लोग इस पते पर…

बहुत लोगों ने कहा भैया आ रहे हैं, दद्दा आ रहे हैं, सर आ रहे हैं… मिलेंगे बात करेंगे और ये करेंगे, वो करेंगे… कुल मिलकर हमको ही 50 के ऊपर लोगों ने कन्फर्म किया आने का…

जब पहुंचे और कार्यक्रम शुरू हुआ तो कुल लोग थे शायद 10 या 12… याद नहीं… कोई भी नहीं आया…

खैर इस पर कोई आज तक शिकायत नहीं की और न ही अभी कर रहा हूँ. मैं खुद दूसरे शहर में हूँ और हर बार दिल्ली जाना संभव नहीं हो सकता… खुद के शहर में हो तो बात अलग…

बात 2010 की है… लखनऊ के गोमती नगर स्थित एक केंद्र पर कुछ लोगों का मज़मा लगा था… उस मजमे में बिनायक सेन, अरुंधति रॉय, से लेकर पत्रकार जगत, विश्वविद्यालयों, NGO कर्मी और छुटके बड़के वामपंथी जुटे थे.

इसमें भारत के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मज़ाक उड़ाने से लेकर माओवादी, कश्मीरी अलगाववादियों को समर्थन, बांग्लादेश से पलायित झुण्डों को भारत में बसाना… मतलब कि वो सारे काम जो भारत के विरुद्ध हैं उसके समर्थन का ही कार्यक्रम चला.

कुछ हलकी फुल्की बातों के बाद काफी लोगों को उधर हॉल से निकाल दिया गया और सिर्फ चुने हुए लोग बैठाए गए…

उसके बाद एक प्रेजेंटेशन चलाया गया जिसमें भारत पर 17 तरफ से हमले करने की योजना थी.

इसमें भारत के हिन्दू समाज को जाति में तोड़ना, अलगाववादी खालिस्तानी सिखों को समर्थन, हथियार बंद माओवादियों को और गोली-बारूद का इंतज़ाम करना, माओवाद को शहरों तक फैलाना, हिंदूवादी संगठनों को बदनाम करना, हिंदूवादी संगठनों से उनको चुनना जो आसानी से इनके एजेंडा के शिकार बन जाएं, पुलिस में वामपंथी सोच घुसाना – उसको और भ्रष्ट बनाना, रिटायर सैनिकों से सम्पर्क करके उनके द्वारा सेना में असंतोष फैलाना, 2022 या 2027 तक गुजरात से हिंदुत्व की जड़ों को उखाड़ देना, आदि की रूप रेखा तय की जा रही थी.

यहाँ से काफी जानकारी निकल कर आ रही थी लेकिन हमारे संपर्क सूत्र को किसी ने पहचान लिया और अपना काम खराब हो गया… वो वहां से बाहर कर दिए गए… कुछ फोटो लेकिन अपने हाथ लग चुके थे इस सम्मलेन के…

इस सम्मलेन और इसमें हो रही बातों को कुछ अधिकारीयों को बताया गया… इस पर इंटेलिजेंस की कार्यवाही हुई और इस सम्मलेन के काफी डॉक्यूमेंट कार्यवाही के लिए रखे गए…

सेशन कोर्ट से कुछ वामपंथी नेताओं की जमानत रद्द हुई लेकिन सर्वोच्च न्यालालय से जमानत मिल गई. जमानत देने वाले गायखोर मार्कंडेय काटजू साहब ही थे… वो बात अलग…

पकड़े जाने और भंडाफोड़ होने के डर से ये सम्मलेन बंद नहीं हुए. यही सम्मलेन, नागपुर, बेगूसराय, पटना, देहरादून, चण्डीगढ़, रायपुर, भुबनेश्वर, श्रीनगर, जयपुर आदि में भी हुए.

उन्होंने किसी सरकार का इंतज़ार नहीं किया और न ही अपने एजेंडा से भटके… उन्होंने अपने ग्रुप में कोई भी ऐसा मुँह नहीं देखा जो मसीहा बनके आएगा और उनके मन की हर बात कर डालेगा…

इन सम्मेलनों में सम्मिलित होने वाले लोगों की जानकारी आती रही है मुझे… वो सब थे जो इधर लखनऊ में थे और कुछ लोकल भी, कुछ चेहरे नए और अजीब भी दीखते हैं…

इनके हर सम्मलेन की जनसँख्या 150 से ऊपर रही और उसमें से 25-50 सीक्रेट मीटिंग वाले हमेशा ही रहे… उन 25-50 पर उनकी तरफ का कोई प्रश्नचिह्न नहीं खड़ा करता इसलिए सोशल मीडिया पर कोहराम मचाए राष्ट्रवादियों की कल्पना से भी परे हैं वो नाम… मेरे सामने तो हैं वो नाम और पहचानता हूँ लेकिन नहीं बोलूँगा…

अब आप अपने राष्ट्रवादी बुलावों पर आने वालों की जनसँख्या देख डालिए… राष्ट्रवादियों में कुछ स्वयंभू प्रखर राष्ट्रवादी हैं जो न्योता चाहते हैं और अगर आम तरह से संदेश देकर बुलाया जाए तो उनको ये मंजूर नहीं… उनको सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों की तरफ से चरणचम्पु करते हुए करबद्ध निवेदन चाहिए… नहीं तो उसके बाद वो वो शुचिता के ठेले पर सवार होकर नेहरू जी के NAM पर कायम हो जाने का दिखावा करते हुए बदबू फैलाने लगेंगे… खैर उनकी वो जाने…

अब कई लोग कहते हैं कि यह सब करने के वामपंथियों को पैसे मिलते हैं… जिसके लिए वो आते हैं… कई लोग बोलते हैं कि राष्ट्रवादी भी सम्मलेन आदि करना चाहते हैं लेकिन उसकी खर्ची और मेहनताना भी मिलना चाहिए… सरकार अपनी है तो समर्थन भी मिलना चहिये…

राष्ट्रवाद सस्ता नहीं होता… उसका कोई मोल भी नहीं होता… सरकार न वामपंथियों के सम्मलेन स्पांसर करती है और न ही राष्ट्रवादियों के… दम है तो आप जाइए अपने स्रोत उपजाइये… नहीं कर सकते तो फिर अपने अपने फेसबुक वॉल पर गंध फैलाइये…

आपकी समझ से कहीं ऊपर है राष्ट्रवाद, जिसकी समझ इन वामपंथियों, टुकड़े-टुकड़े गैंग और जेहादियों को तो है… इसलिए वो 2010 में 2027 तक का कार्यक्रम तय कर सकते हैं… आप नहीं समझ सके इसलिए आप असंतुष्ट, अव्यवहारिक और आपके अपने ही समूह के अपयश के सूत्रधार हैं…

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